अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
आयुष्कायीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
२३
शस्त्रादिसाधनः कृच्छ्रः सङ्कृते च ततो गदः।
कष्टसाध्य रोग के लक्षण—कुच्छ्र शब्द का अर्थ है—कष्ट। कष्टसाध्य वे रोग होते हैं जिनमें शस्त्र, धार, अग्नि (दाह) कर्म तथा विष आदि के प्रयोग किये जाते हैं। जिन रोगों में ऊपर कहे गये सुखसाध्य के लक्षण संकर (मिले-जुले) हों अर्थात् पूर्णरूप से विद्यमान न हों।
शेषत्वादायुपो याप्यः पथ्याभ्यासाद्विपर्यये ॥ ३२ ॥
याप्य रोग के लक्षण—उम रोग को 'याप्य' कहते हैं जिसमें पूर्वोक्त सुखसाध्य के लक्षणों से विपरीत लक्षण हों, किन्तु आयु के शेष (बचे) रहने के कारण तथा पथ्य (हितकर) आहार-विहार तथा औषध (यथायोग्य चिकित्सा) के अभ्यास (लगातार सेवन) करने के कारण रोगी बल-फिर सक रहा हो ॥ ३२ ॥
वक्तव्य—'याप्य' चिकित्सा की वह स्थिति है जिसे चिकित्सक पूर्ण रूप से स्वस्थ कर देना चाहता है, किन्तु ऐसा कर नहीं सकता और यह चिकित्सा तब तक चल सकती है जब तक रोगी की आयु शेष है। इसके सम्बन्ध में विशेष विवरण देखें—'दत्त्वाऽल्य'-'हितैः'। (अ.सं.सू. २।३१-३२) अर्थात् जो रोग उचित चिकित्सा करने तथा पथ्य सेवन करते रहने से कुछ शान्त रहता है, उसे 'याप्य' कहते हैं। व्याकरणशास्त्र में 'याप्य' का अर्थ कुत्सित या निन्दिता है। देखें—याप्ये पाशष् (अ. ५।३।४७)।
अनुपक्रम एव स्यात्पित्तोऽत्यन्तविपर्यये। औत्सुक्यमोहारतिकृद् दृष्टिरष्टोऽक्षताशनः ॥ ३३ ॥
प्रत्याख्येय रोग के लक्षण—उम रोग को 'अनुपक्रम' भी कहते हैं जो सुखसाध्य लक्षणों से अत्यन्त विपरीत हो और जो औत्सुक्य, मोह तथा अरति (बेचैनी) लक्षणों वाला हो, जिसमें अरिष्ट लक्षण दिखलायी दे रहे हों एवं जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का नाश हो गया हो ॥ ३३ ॥
वक्तव्य—उक्त ३३वें श्लोक में कहे गये सभी लक्षण असौम्य रोग के हैं। आप भी लक्षणों पर ध्यान दें। 'औत्सुक्य' भाव को आप रोगी में इस प्रकार देखेंगे—अधिक प्रसन्न होना या उठ-उठ कर दौड़ना आदि या मोह, बेहोशी, प्रलप (अंट-संट बकना) आदि। 'अरति' (बेचैनी), हाथ-पाँव का पटकना या सिर को घुमाते रहना। 'दृष्टिरष्टः'—जिसमें अरिष्ट (मृत्युकारक) लक्षण दिखलायी दे रहे हों। आयुर्वेद में 'रिष्ट' तथा अरिष्ट दोनों शब्द समानार्थक हैं। 'अक्षनाशनः'—अक्ष का अर्थ है ज्ञानेन्द्रियाँ, इनकी क्रियाशक्ति का जिस रोगी में नाश हो गया हो अर्थात् जो संज्ञाशून्य हो गया हो। उत्तम चिकित्सक घर के लोगों से उसके रोग की विषम (असाध्य) स्थिति को बतला कर उसकी चिकित्सा न करे। देखें—च.सू. १०।८। इस अध्याय में श्लोक ९ से २२ तक का अवश्य अवलोकन करें। देखें—इस विषय में महर्षि चरक ने अपने शब्दों में किस प्रकार कहा है?
त्यजेदार्ता भिषग्भूपैर्द्विष्टं तेषां द्विष्टं द्विषम्। हीनोपकरणं व्यग्रमविधेयं गतायुषम् ॥ ३४ ॥
चण्डं शोकातुरं भीरुं कृतघ्नं वैद्यमानिनम्।
त्याज्य रोगों—चिकित्सक को चाहिए कि निम्नलिखित प्रकार के रोगियों की चिकित्सा न करे—१. जिससे राजा या महान् जन्य द्रष्ट करता हो और जो स्वयं अपना द्रष्टी हो, २. जो राजाओं (श्रीमानों) से द्रष्ट करता हो, ३. वैद्य से द्रष्ट करता हो, ४. जिसके पास चिकित्सा के उपयोगी साधन न हों, ५. जो व्यग्र हो अर्थात् जो चिकित्सा कराने में सक्रिय न हो, इधर-उधर भटकता रहता हो, ६. जो रोगी चिकित्सक की आज्ञा के अनुसार चलना स्वीकार न करता हो, ७. जो गतायु हो (इसका ज्ञान ज्योतिषी आदि से किया जा सकता है) अर्थात् जो अब अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा, ८. जो अत्यन्त क्रोधी हो, ९. शोकातुर अर्थात् जो पुत्र-स्त्री-धन आदि के नाश से दुःखी हो, १०. जो भीरु (डरपोक) हो अर्थात् जो पञ्चकर्म आदि क्रियाओं से डरता हो, ११. कृतघ्न अर्थात् जो दूसरों द्वारा किये उपकार को न मानता हो और १२. जो वैद्यमानी हो अर्थात् जिसमें वैद्य का ज्ञान न हो, फिर भी अपने को वैद्य समझता हो ॥ ३४ ॥
२४
अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—इन त्याज्य रोगियों के लिए सरकारी अस्पताल बने हैं, अतः व्यक्तिगत चिकित्सक इन झंझतों में न पड़ें; यह शास्त्रीय उद्बोधन है। इनसे अपयश तो मिल सकता है किन्तु धर्म, अर्थ, यश की प्राप्ति नहीं हो सकती। महर्षि बरक ने भी प्रकारान्तर से इनकी चिकित्सा करने का निषेध किया है। देखें—ज.सि. २।४-६। इसी के आगे ७वें पद्य में कहा है—‘एभ्योऽन्ये समुपक्रम्या नराः सर्वैरुपक्रमैः’। वाभट ने अ.सं.सू. २।३४ में कहा है—पहले रोग की परीक्षा कर ले, तभी चिकित्सा करना प्रारम्भ करे।
तन्त्रस्यास्य परं चातो वक्ष्यतेऽध्यायसङ्ग्रहः ॥ ३५ ॥
अध्यायसंग्रह-वर्णन—अब यहाँ से सम्पूर्ण अष्टांगहृदयतन्त्र के अध्यायों के संग्रह का वर्णन किया जा रहा है ॥ ३५ ॥
बक्तव्य—यह क्रम संहिता के स्त्रियताओं का अथवा तन्त्रकारों का अन्यत्र भी देखा जाता है। ‘अतः परं’ इसके बाद तथा ‘अस्मात् ऊर्ध्व’ इसके आगे। इस प्रकार का संकेत तन्त्रकार अपने ग्रन्थ, संहिता या तन्त्र में किया करते हैं।
आयुष्कामदिनत्वीहरोपानुत्पादनद्रवाः । अन्नजानानन्नसंस्मात्राद्रव्यरसाश्रयाः ॥ ३६ ॥
दोषादिज्ञानतद्वेदतन्त्रचिकित्साद्वयुपक्रमः । शुद्ध्यादिस्नेहनस्वेदकास्थापनपावनम् ॥ ३७ ॥
धूम्रगण्डूषद्वृत्केतुत्पित्यन्त्रकशस्त्रकम् । शिराविधिः शल्यविधिः शस्त्रक्षाराश्रिकर्मिकौ ॥ ३८ ॥
सूत्रस्थानमिमेऽध्यायस्त्रिंशत्—
सूत्रस्थान के अध्याय—सूत्रस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. आयुष्कामीय, २. दिनचर्या, ३. ऋतुचर्या, ४. रोगानुत्पादनीय, ५. द्रवद्रव्यविज्ञानीय, ६. अन्नस्वरूपविज्ञानीय, ७. अन्नरक्षाध्याय, ८. मात्रा-शिलीय, ९. द्रव्यादिविज्ञानीय, १०. रसभेदीय, ११. दोषादिविज्ञानीय, १२. दोषभेदीय, १३. दोषोपक्रमणीय, १४. द्विविधोपक्रमणीय, १५. शोधनादिगणसंग्रह, १६. स्नेहविधि, १७. स्वेदविधि, १८. वमन-विरेचनविधि, १९. वस्तिविधि, २०. नस्यविधि, २१. धूम्रपानविधि, २२. गण्डूषादि विधि, २३. आश्वतोत्तनाञ्जनविधि, २४. तर्पण-पुष्टपाकविधि, २५. यन्त्रविधि, २६. शस्त्रविधि, २७. सिराव्यधविधि, २८. शल्यारहरणविधि, २९. शस्त्रकर्मविधि तथा ३०. क्षाराश्रिकर्मविधि। ये अध्याय सूत्रस्थान में हैं ॥ ३६-३८ ॥
—शारीरमुच्यते । गर्भविक्रान्तितद्व्यापदङ्गमर्मविभागिकम् ॥ ३९ ॥
विकृतिर्दूतजं षष्ठं—
शारीरस्थान के अध्याय—शारीरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. गर्भविक्रान्ति, २. गर्भव्यापद, ३. अङ्गविभाग, ४. मर्मविभागीय, ५. विकृतिविज्ञानीय तथा ६. दूतादिविज्ञानीय। ये अध्याय शारीरस्थान में हैं ॥ ३९ ॥
—निदानं सार्वरोगिकम् । ज्वरासुकृत्वासयश्मादिमदाघशोऽतिसारिणाम् ॥ ४० ॥
मूत्राघातप्रमेहाणां विद्रध्याचुदरस्य च । पाण्डुकुष्ठानिलार्तानां वाताघ्नस्य च षोडश ॥ ४१ ॥
निदानस्थान के अध्याय—निदानस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. सर्वरोगनिदान, २. ज्वरनिदान, ३. रक्तपित्तकासननिदान, ४. श्वासहिकानिदान, ५. राजयश्मानिदान, ६. मदात्ययनिदान, ७. अशोनिदान, ८. अतिसारग्रहणीरोगनिदान, ९. मूत्राघातनिदान, १०. प्रमेहननिदान, ११. विद्रधिबृद्धि-गुल्म-निदान, १२. उदररोगनिदान, १३. पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदान, १४. कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदान, १५. वातव्याधि-निदान तथा १६. वातशोणितनिदान। ये अध्याय निदानस्थान में हैं ॥ ४०-४१ ॥
चिकित्सितं ज्वरे रक्ते कासे श्वासे च यक्षमणि । वमो मदात्ययेऽश्वः सु, विशि द्वौ, द्वौ च मूर्त्रिते ॥ विद्रधी गुल्मजठराण्डुशोफविसर्पिषु । कुष्ठश्वित्रानिलव्याघिवाताग्नेषु चिकित्सितम् ॥ ४३ ॥
द्वारविशतिरिमेऽध्यायाः—
आयुष्कार्याध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
२५
चिकित्सितस्थान के अध्याय—चिकित्सितस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. ज्वर, २. रक्तपित्त, ३. कास, ४. श्वासहिका, ५. राजयश्मादि, ६. छर्द्विद्वद्गोतुष्णा, ७. मदात्ययादि, ८. अर्शसां चिकित्सित, ९. अतिसार, १०. ग्रहणीरोग, ११. मूत्राघात, १२. प्रमेह, १३. विद्विघ्नद्विष्ट, १४. गुल्म, १५. उदर, १६. पाण्डुरोग, १७. श्वयशु, १८. विसर्प, १९. कुष्ठ, २०. शिवबक्रिमि, २१. वातव्याधि तथा २२. वातशोणित। ये अध्याय चिकित्सितस्थान में हैं। ४२-४३ ॥
—कल्पसिद्धिरतः परम्। कल्पो वमेविरैकस्य तत्सिद्धिर्बस्तिकल्पना ॥ ४४ ॥
सिद्धिर्बस्थापदां षष्ठो द्व्यकल्पः—
कल्प-सिद्धिस्थान के अध्याय—कल्प-सिद्धिस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. वमनकल्प, २. विरेचनकल्प, ३. वमनविरेचनसिद्धि, ४. बस्तिकल्प, ५. बस्तिव्याप्तिसिद्धि तथा ६. भेषजकल्प। ये अध्याय कल्प-सिद्धिस्थान में हैं। ४४ ॥
—अत उत्तरम्। बालोपचारे तद्व्याधौ तद्वग्ने, द्वौ च भूतगे ॥ ४५ ॥
उन्मादेऽथ स्मृतिभ्रंशे, द्वौ द्वौ वर्त्तसु सन्धिषु। दूकमोलिङ्गनाशेषु त्रयो, द्वौ द्वौ च सर्वगे ॥ ४६ ॥
कर्णनासामुखशिरोब्रणै, भङ्गे भगन्दरे। ग्रन्थ्यादौ शुद्धरोगेषु गुह्यारोगे पुण्यद्वयम् ॥ ४७ ॥
विषे भुजङ्गे कीटेषु मूषकेषु रसायने। चत्वारिशोऽनपत्यानामध्यायो बीजपोषणः ॥ ४८ ॥
उत्तरस्थान के अध्याय—उत्तरस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है—१. बालोपचरणीय, २. बालामयप्रतिषेध, ३. बालग्रहप्रतिषेध, ४. भूतविज्ञानीय, ५. भूतप्रतिषेध, ६. उन्मादप्रतिषेध, ७. अपस्मार-(स्मृतिभंश)प्रतिषेध, ८. वर्त्तसुगविज्ञानीय, ९. वर्त्तसुगप्रतिषेध, १०. सन्धिस्तितासितरोगविज्ञानीय, ११. सन्धिस्तितासितरोगप्रतिषेध, १२. दृष्टिरोगविज्ञानीय, १३. तिमिरप्रतिषेध, १४. लिङ्गनाशप्रतिषेध, १५. सर्वाशिरोगविज्ञानीय, १६. सर्वाकिरोगप्रतिषेध, १७. कर्णरोगविज्ञानीय, १८. कर्णरोगप्रतिषेध, १९. नासा-रोगविज्ञानीय, २०. नासारोगप्रतिषेध, २१. मुखरोगविज्ञानीय, २२. मुखरोगप्रतिषेध, २३. शिरोरोगविज्ञानीय, २४. शिरोरोगप्रतिषेध, २५. ब्रणविज्ञानीय, २६. सद्योब्रणप्रतिषेध, २७. भङ्गप्रतिषेध, २८. भगन्दरप्रतिषेध, २९. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लोपद-अपची-नाडीविज्ञानीय, ३०. ग्रन्थि-अर्बुद-श्लोपद-अपची-नाडी-प्रतिषेध, ३१. शुद्धरोगविज्ञानीय, ३२. शुद्धरोगप्रतिषेध, ३३. गुह्यारोगविज्ञानीय, ३४. गुह्यारोगप्रतिषेध, ३५. विषप्रतिषेध, ३६. सर्पविषप्रतिषेध, ३७. कीटलूताद्विप्रतिषेध, ३८. मूषिकलार्कविषप्रतिषेध, ३९. रसायनाध्याय तथा ४०. वाजीकरणध्याय। ये अध्याय उत्तरस्थान में हैं। ४५-४८ ॥
इत्यध्यायशतं विशं षड्भिः स्थानैरुदीरितम् ॥
इति श्रीबैष्णवपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने आयुष्कामीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अष्टांगहृदय के छः स्थान—इस प्रकार सम्पूर्ण अष्टांगहृदय के १२० अध्यायों की नाम-गणना उक्त (१. सूत्र, २. शरीर, ३. निदान, ४. चिकित्सित, ५. कल्प-सिद्धि तथा ६. उत्तर नामक) छः स्थानों में कर दी गयी है। ४८ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
‘निर्मला’ हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान में
आयुष्कामीय नामक पहला अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातो दिनचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से दिनचर्या नामक अध्याय का वर्णन करेंगे, इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था ॥ १ ॥
उपक्रम —दिनचर्या शब्द से रात्रिचर्या, ऋतुचर्या आदि का भी ग्रहण कर लिया जाता है। दिनचर्या शब्द में इतने अर्थ छिपे हैं—'दिने-दिने चर्या, दिनस्य चर्या किं वा दिनानां चर्या = दिनचर्या'। इस प्रकार परिभाषित करने पर उक्त सभी अर्थों का इसमें समावेश हो जाता है। इस अध्याय में उन आचरणों की चर्चा की जायेगी जो नर-नारी के लिए दोनों लोकों में हितकर होती है। हमारा यह आयुर्वेद इस लोक और परलोक को मानता है। आपको इसके अनेक प्रमाण मिलेंगे, अस्तु। विशेष देखें—इसी अध्याय के ४८वें पद्य को।
निरुक्ति —गति तथा भक्षण अर्थ में प्रयुक्त चरू धातु से यत् + टापू प्रत्यय करने पर चर्या शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है—आहार-विहार तथा आचरण विधि।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. ५, ७, ८; सु.चि. २४ तथा अ.सं.सू. ३ में देखें।
ब्राह्मो मूर्हते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।
ब्राह्मामूर्हते में जागना —स्वस्थ (नीरोग) स्त्री-पुरुष को अपनी आयु (मुखायु-हितायु) की रक्षा करने के लिए प्रातःकाल ब्राह्मामूर्हते में उठना चाहिए।
वक्तव्य —ब्राह्मामूर्हते—रात के पिछले पहर की दो घड़ी या दो दण्ड। श्रीअरुणदत्त ब्राह्मामूर्हते की व्याख्या करते हुए कहते हैं—'रात्रेश्वतुर्दशो मूर्हते ब्राह्मो मूर्हतेः', किन्तु 'मूर्हतेचिन्तामणि' के विवाह-प्रकरण में दिये गये ५३वें पद्य में दिया गया रात्रि का १४वां मूर्हते 'त्वाष्ट्र' है, जिसका स्वामी चित्रा नामक नक्षत्र है। हाँ, आठवें मूर्हते का नाम 'ब्रह्मा' है, जो प्रसंगोचित नहीं है। इसके अगे वे कहते हैं—'ब्रह्म—ज्ञानं तदर्थमध्यनाद्यापि ब्रह्म, तस्य योग्यो मूर्हते ब्राह्मः'। यह व्याख्या युक्तियुक्त प्रतीत होती है। अन्यत्र कहा गया है—'रात्रेस्तु पश्चिमो यामो मूर्हते ब्राह्म उच्यते'। यह नियम केवल स्वस्थ पुरुष के लिए है। सूर्योदय से पहले रात्रि के अन्तिम पहर की चार घड़ियों को 'ब्राह्मामूर्हते' माना गया है। सुश्रुत ने केवल 'उत्थायोत्थाय सततं' (सु.चि. २४३) में प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर, इतना ही कहा है।
शरीरचिन्तां निर्वर्त्य कृतशौचविधितस्ततः ॥ १ ॥
अर्कन्यग्रोधविदरकरञ्जककुभादिजम् । प्रातर्भुक्त्वा च मृद्वग्रं कपायकटुतिक्तकम् ॥ २ ॥ कनीन्यग्रसमस्थौल्यं प्रगुणं द्वादशाङ्गुलम् । भक्षयेद्भुतपवनं दन्तमांसात्म्यबाधयन् ॥ ३ ॥
दतवन का विधान —उठते ही शरीर की चिन्ता से निवृत्त होकर अर्थात् मैं उठने योग्य हूँ या नहीं—ऐसा विचार करके यदि वह अपने को दिनचर्या करने योग्य समझे तब वह शौचविधि (मल-मूत्र त्याग कर मल-मूत्र स्थानों को मिट्टी, जल आदि से शुद्ध करने के बाद अर्क, बरगद, बैर या बबूल, करञ्ज (डिठोरी), ककुभ (अर्जुन) आदि वृक्षों में से किसी की पतली शाखा को लेकर दतवन (दातौन) करे।
दिनचर्चाध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
२७
दतवन करने के दो समय होते हैं—१. प्रातःकाल और २. भोजन कर लेने के बाद। इससे मूष की मलिनता दूर होती है और भोजन करने के बाद दांतों या मसूड़ों में फंसे हुए अन्नकण आदि निकल जाते हैं।
दतवन करने की विधि —दतवन के अगले भाग को दांतों से चबाकर अथवा कूटकर मुलायम कर लेना चाहिए, नहीं तो उसकी रगड़ मसूड़ों में लग सकती है। इस (दतवन) का रस कठौला (खैर या बबूल का जैसा) या कटु (तेजबल या तिमूर का जैसा) अथवा तिक्त (नीम का जैसा) होना चाहिए। इसकी मोटाई कनीनिका (सबसे छोटी पांचवीं अंगुली) के समान तथा लम्बाई बारह अंगुल होनी चाहिए। इस प्रकार की दतवन को लेकर दांतों पर इस प्रकार घिमें जिससे मसूड़ों पर खरोश न लगे और दांत स्वच्छ हो जायें ॥१-३॥
बक्तव्य —वामभट ने 'अर्क' (मदार) की दतवन करने का विधान किया है, तथापि दूध सहित इसकी शाखा को मुख में न डाले, अन्यथा मुख पक जायेगा, घाव हो जायेगे। अतः इसकी बाहरी लंबा को छीलकर तथा पानी से धोकर ही इसका दतवन के लिए प्रयोग करें। आजकल अनेक चूर्णों तथा मञ्जनों का दांत साफ करने के लिए प्रयोग होने लगा है। इसका प्रयोग अंगुली या ब्रश से किया जाता है, अतः ब्रश का मुलायम होना अति आवश्यक है। दूसरी ओर 'कोलोट' आदि ट्यूपेस्टों का प्रयोग चल पड़ा है। जहाँ उचित गुण वाली दतवन सुलभ नहीं है वहाँ मुलभ विकल्पों का प्रयोग कर लेना चाहिए। ध्यान रहे—दांत जिससे साफ हों, मसूड़ों को हानि न पहुँचे उसका उपयोग करें। इसका प्रयोग करने से मुखरोग नहीं होते और मुख साफ बना रहता है।
शुश्रुत ने चि.२४४-१२ में जो मधुर रस वाली दतवन का विधान किया है, उसका तात्पर्य है—मुखपाक (सर्वसर) या मुखदाह आदि पित्तज विकारों में इसका प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त ऐसे अवसरों पर फिटकर का चूर्ण डालकर तैलगण्डूष भी अत्यन्त हितकर होता है।
जिह्वानिलेखन —इस प्रसंग में दतवन कर लेने के बाद जीभी का प्रयोग भी कर लेना चाहिए। इसका वर्णन चरक, शुश्रुत, वामभट (अष्टांगसंग्रह) ने किया है, किन्तु अष्टांगहृदय में नहीं हुआ है। इसकी हम सुश्रुतोक्त विधि कह रहे हैं—जीभ को साफ करने (उसमें जमे हुए मैल को खुरचने) के लिए सोने, चाँदी या लकड़ी की जीभी बनवा लेनी चाहिए। आजकल बाजार में ताँबा या स्टील की भी जीभी मिलती है। दतवन करने वाले उसी को दांतों से चिर कर जीभी बना लेते हैं। वास्तव में यह जीभी 'वाक्षी' (वृक्ष से सम्बन्धित) है। इस विषय को च.सू. ५।७४-७५ में देखें।
नाद्यादजीर्णवमयुधसासकासज्वरादिति। तुष्णास्पपाकहृन्नेत्रशिरःकर्णामयी च तत्॥४॥
दतवन का निषेध —अजीर्ण होने पर, छिद्रिरोग में, श्वासरोग में, कासरोग में, ज्वररोग में, अर्दित (मुख का लकवा) रोग में, तुधारोग में, मुखपाकरोग में, हृदयरोग में, नेत्ररोग में, शिरोरोग में तथा कर्णरोग में दतवन न करें ॥४॥
बक्तव्य —दतवन करने की क्रिया को आयुर्वेदशास्त्र में दो नामों से कहा गया है—१. दन्तपवन और २. दन्तधवन। इनमें 'पवन' का अर्थ है—पवित्र करना और 'धवन' का अर्थ है—धोना या साफ करना। अष्टांगसंग्रह-सू. ३।२०-२२ में निषिद्ध दतवनों का परिगणन इस प्रकार विस्तार से किया है—१. ल्मिओडा, २. रौठा, ३. बहेडा, ४. धव, ५. करौर, ६. बबूल, ७. सम्भालू, ८. महजन, ९. लोध, १०. तैन्तू, ११. कचनार, १२. शमी, १३. पीलू, १४. पीपल, १५. इंगुदी (हिगोट), १६. गुगल, १७. फरहद, १८. इमली, १९. मोच, २०. सफेद शाल्मली, २१. सेमल तथा २२. शप (सनई) की दतवन न करें। इनके अतिरिक्त जिन वृक्षों का रस मीठा, खट्टा अथवा नमकीन हो उनकी भी दतवन न करें। जो दतवन सूखी, खोखली, दुर्गन्धयुक्त तथा लसीली हो उसका भी निषेध किया है और पलाश तथा विजयसार की दतवन एवं खड़ाऊं का परित्याग करें।
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अष्टाङ्गहृदये
सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्षोस्ततो भजेत्।
अञ्जन-प्रयोग—मुखशुद्धि करने के बाद प्रतिदिन सौवीर अञ्जन को आँखों में लगाना चाहिए। यह आँखों के लिए हितकर होता है।
बक्तव्य—सुवीर (सिन्धु) देश में प्राप्त होने वाला यह अञ्जन (काला सुरमा) आँखों के लिए हितकर होता है। इसका विशेष विवेचन देखें—अ.सं.सू. २२।७-८। स्वस्थ आँखों में प्रतिदिन लगाने वाले अञ्जन को प्रत्यञ्जन कहते हैं। श्रीभावमिश्र ने इस सौवीराञ्जन को 'सफेद सुरमा' स्वीकार किया है। यह काला सुरमा से अधिक सौम्य होता है। इन दोनों सुरमों का प्रयोग नेत्रप्रसादन के लिए किया जाता है। सुश्रुत ने भी इस अञ्जन की प्रशंसा की है। देखें—सु.चि. २४।८-१९।
वक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषात् श्लेष्मतो भयम्॥५॥
योजयेत्सप्तरात्रेऽस्मात् प्रावणार्थं रसाञ्जनम्।
रसाञ्जन-प्रयोगविधि—प्रावण अञ्जन का प्रयोग चक्षु (आँख) तेजोमय अर्थात् अग्निगुण-प्रधान अवयव है। उसे (चक्षु को) विशेष करके शीतगुण-प्रधान कफ का भय रहता है। अतएव आँख से कफदोष को निकालने के लिए सप्ताह में एक बार रसाञ्जन का प्रयोग अवश्य करना चाहिए॥५॥
बक्तव्य—उक्त रसाञ्जन के साप्ताहिक प्रयोग से आँखों में से संचित कफदोष निकल जाता है, अतः कफदोषजनित कोई भी नेत्ररोग नहीं हो पाता। विशेष करके काच (मोतियाबिन्द) रोग का भय नहीं रहता है। सुश्रुत ने 'काच' रोग को 'नीलिका' तथा 'लिंगनाश' भी कहा है। देखें—सु.उ. ७।१८। 'काच' को सफेद मोतिया और 'नीलिका' को नीला या काला मोतिया भी कहते हैं। यह कफदोष आँख में संचित होते-होते मोती जैसा दिखलायी देता है, तब इसे मोतियाबिन्द कहते हैं। आपरेशन करके निकालने के बाद यह आकार में मसूर की दाल जैसा होता है। चरक ने उक्त प्रावणांजन का प्रयोग प्रतिदिन या पाँचवें अथवा आठवें दिन करने की सलाह दी है। चरक ने अंजन-प्रयोग का समय रात्रि में बतलाया है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को छोड़कर प्रातःकाल रसाञ्जन का प्रयोग किया जायेगा तब प्रतिदिन लगाये जाने वाले अंजन को रात में लगाना चाहिए, यह चरक के वचन का अभिप्राय है। इसी प्रसंग में मनु ने कहा है—'मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम्। पूर्वाहि एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम्'॥ (मनु० ४।५२) यहाँ 'मैत्रं' का अर्थ है—सूर्य की आराधना, उपासना या पूजा। इसलिए रसवत अथवा किसी प्रावण अंजन का प्रयोग सदा करता रहे।
ततो नावनगणद्वृषधूमताम्बूलभागभवेत्॥६॥
नस्य आदि सेवन-निर्देश—अंजनप्रयोग करने के बाद नस्य (सुंधनी), गणद्वृष (कुल्ली, देखें—बृहत् हिन्दी-कोश), धूम्रपान तथा ताम्बूल का सेवन करें॥६॥
बक्तव्य—उक्त नस्य आदि की विस्तृत सेवनविधियाँ क्रमशः इस प्रकार अष्टांगहृदय में दी गयी हैं। देखें—१. नस्यसेवनविधि अ.हृ.सू. २०।१-२। धूम्रपानविधि वहीं २१ तथा ३. गणद्वृषादि विधि वहीं २२। ताम्बूलभक्षण की विस्तृत विधि अ.सं.सू. ३।३६-३८ देखें।
ताम्बूल-सेवनविधि—भोजन के प्रति इच्छा अधिक हो, मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित रहे, ऐसी इच्छा रखने वाले को धुला-धुलाकर पान खाना चाहिए। इसे भोजन की भाँति मुख में रखकर तत्काल निगलना नहीं चाहिए। पान के मसाले—जावियाँ, जायफल, लौंग, कपूर, पिपरमेण्ट, कंकोल (शीतल चीनी), कटुक (लताकस्तूरी के बीज) तथा इसमें सुपारी के भिगाये हुए टुकड़े भी रखें। इस प्रकार सेवन करने से पान हृदय को प्रिय लगता है और यह शक्तिवर्धक होता है। इसका सेवन सौकर उठने के बाद स्नान एवं भोजन करने के बाद तथा वमन करने के पश्चात् करना चाहिए। एक बार में अधिक-से-अधिक दो बीड़ा पान लें, जिसमें चूना, कल्या लगा हो और सुपारी के टुकड़े पड़े हों।
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विशिष्ट अवसर—राजसम्मान, विद्वत्सम्मान, रतिकाल, युद्ध आदि में जाते समय इसके सेवन का विशेष महत्त्व है। अन्य अवसर भी अनेक हैं, उन्हें लोकव्यवहार से समझें।
सेवनविधि—पान के जड़ की डण्डी और आगे का भाग काट देना चाहिए, तभी उसमें कृता-कल्याण सुगंधी आदि मसाले डालकर मुख में लें। इसकी पहली पीक को थूककर फिर इसका रसपान करते रहें। सुर्ती आदि आधुनिक मसाले हानिकर होते हैं, इनसे दंत कमजोर हो जाते हैं और इनसे मुख का अल्सर होता देखा गया है। देखिए 'भावप्रकाश'—'दिनचर्या-प्रकरण'।
ताम्बूलं क्षतपित्तस्रद्धश्लोकुपितचक्षुषाम्। विषमूर्च्छाभदार्तानामपथ्यं शोषिणामपि ॥७॥
ताम्बूलसेवन-निषेध—ऊपर छठे पद्य में ताम्बूल का सेवन सभी को करना चाहिए, ऐसा निर्देश करने के बाद अब यहाँ इसका सेवन किनको नहीं करना चाहिए, इस विषय का निर्देश किया जा रहा है—क्षत तथा उरःक्षत से पीड़ित, पित्तविकार, रक्तविकार (रक्तपित्त) से पीड़ित, हृद्द शरीर वाले, नेत्ररोगी, विषविकार से पीड़ित, मूर्च्छा एवं भदाल्य आदि रोगों से पीड़ित तथा शोषरोगी को ताम्बूल का सेवन नहीं करना चाहिए ॥७॥
वक्तव्य—ताम्बूलसेवन का निषेध जिन रोगियों के लिए किया गया है, उसमें कारण हैं—ताम्बूलपत्र के वे गुण-धर्म होते हैं—तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रुचिकारक, कषाय, सर, तित्तक, क्षारीय गुणयुक्त, चरपरा तथा लघु। यह कामवासना, रक्तधातु तथा पित्तधातु को बढ़ाता है। इसका अधिक सेवन करना एक प्रकार का दुर्घसन है। इसे भूले पेट में तथा शौच के अन्त में कदापि सेवन न करें।
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं, स जराश्रमवातहा। दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदादर्घकृत् ॥८॥
अभ्यङ्गसेवन-विधान—प्रतिदिन अभ्यंग (मालिश) करना या कराना चाहिए, क्योंकि वह जरा (बुढ़ापा), श्रम (थकावट) तथा वातज विकारों को नष्ट करता है, दृष्टि को स्वच्छ करता है, शरीर को पुष्ट करता है, आयु को बढ़ाता है, गहरी नींद लाता है, त्वचा के सौन्दर्य को स्थिर बनाये रखता है और मांसपेशियों को दृढ़ एवं सुडील (गठीली) बनाता है ॥८॥
वक्तव्य—अभ्यंग = मालिश, उबटन, फोहा रखना, कान में तेल डालना तथा लेप लगाना, इसे अलंकरण भी कहा गया है। इसका विस्तृत क्षेत्र इस प्रकार है—दंतों या आँखों पर तेल लगाना, स्नेहमिश्रित काजल लगाना, स्नेहमय लेप या महहम लगाना आदि। उक्त विषय के लिए देखें—सु.सू. २१।१० तथा सु.चि. २४।३०-३७। साथ ही उक्त श्लोकों पर आचार्य डल्हन द्वारा लिखी गयी टीका को भी देखें। अभ्यंग के लिए घी से आठ गुना अधिक तेल लाभदायक होता है, अवसर-विशेष पर घी आदि अन्य स्नेहों द्वारा भी मालिश की जाती है।
सुश्रुत-चि. २४।३० श्लोक पर की गयी आचार्य डल्हन की टीका में अभ्यंग के सम्बन्ध में ये तीन पद्य मिलते हैं—'रोमान्तेष्वनुदेहस्य स्थित्वा मात्राशतत्रयम्। ततः प्रविशति स्नेहश्चतुर्भिर्गच्छति त्वचाम् ॥ रक्तं गच्छति मात्राणां शतैः पञ्चभिरेव तु। षड्भिर्मांसं प्रपद्येत मेदः मत्तभिरेव च ॥ शतैरष्टाभिरेस्थीनि मज्जानं नवभिर्ब्रजैतु। तत्रास्याञ्च शमयेद्वोगान् वातपित्तकफात्मकान् ॥ अर्थात् प्राचीन विद्वानों का अनुमान है और अभ्यंगप्रिय पहलवानों का अनुभव है कि अभ्यंग द्वारा प्रयोग किया गया तेल ३०० मात्रा समय तक वह रोमकूपों में रहता है; फिर ४०० मात्रा समय तक त्वचा में, फिर ५०० मात्रा समय तक रक्त में, फिर ६०० मात्रा समय तक मांस में, ७०० मात्रा समय तक मेदस् में, ८०० मात्रा समय तक अस्थि में और ९०० मात्रा समय तक मज्जा में व्याप्त होकर उन-उन धातुओं में उत्पन्न वातज, पित्तज तथा कफज रोगों को शान्त कर देता है। उक्त डल्हन कृत टीका से मालिश के सम्बन्ध में उद्धृत श्लोकों में व्याकरण की दृष्टि ये प्रयोग महत्त्वपूर्ण हैं। देखें—त्वचाम्, रक्तं, मांसं, मेदः, अस्थीनि तथा मज्जानं। आप ध्यान दें—'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया' (अ. २।३।५) सूत्र के नियमानुसार 'त्वचाम्' आदि प्रयोग बतला
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रहे हैं कि मालिश ऐसी होनी चाहिए कि मसलते-मसलते उस तेल का अत्यन्त संयोग उन-उन घातुओं तक हो जाय, तभी मालिश का पूरा-पूरा लाभ मिलता है।
यहाँ जो ३०० तथा ५०० आदि मात्रा शब्द का प्रयोग किया है, इस मात्रा नामक काल की अवधि का प्रमाण है—हृस्व स्वर अ, इ या उ आदि किसी एक को उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उतने मात्र समय को कालविभागज्ञों ने 'मात्रा' कहा है। ध्यान दें—मात्रा हृस्व, दीर्घ तथा प्लुत भेद से तीन प्रकार की होती है। यहाँ केवल हृस्व स्वर वाली मात्रा से तात्पर्य है। अश्र्यंग का रहस्य पहलवान लोग जानते हैं, वे बड़े चाव से मालिश करते तथा कराते हैं और उसका लाभ भी उठाते हैं। अश्र्यंग कराने वाले को चर्मरोग कभी नहीं होते हैं।
शिरःश्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्।
अश्र्यंग के प्रमुख स्थान—अश्र्यंग सम्पूर्ण शरीर में करना चाहिए, यह आठवें पद्य में कह दिया है। अब अश्र्यंग के विशेष स्थलों का निर्देश किया जा रहा है। यथा—सिर, कानों तथा पैरों के तलुओं में विशेष रूप से अश्र्यंग करना चाहिए।
वक्तव्य—यहाँ 'शीलयेत्' क्रिया का अर्थ है—'अश्र्यसेत्' अर्थात् बार-बार इसका अभ्यास करे। इस निर्देश की गुणवत्ता वाग्भट ने अष्टांगसंग्रह-सू. ३।५१-६० में इस प्रकार बतलाई है—'सिर पर तेलमालिश करते रहने से वह केशों का हित करता है अर्थात् उन्हें बढ़ाता है, मुखायम तथा चिकना बनाये रखता है। इससे शिरः कपालस्थियों और इन्द्रियों ( आंख, कान, नाक ) का तर्पण होता रहता है। कान के छेद में गुनगुना तेल डालते रहने से हनुमन्धियों ( गण्ड, कर्ण, श्रव, वर्त्म, नेत्र तथा हनु से सम्बन्धित ११ अस्थियों ) का, मन्त्राओं ( गरदन के अलग-बगल में दिखलायी देने वाली दोनों ओर की धमनियों ) का, सिर तथा कानों का शुल शान्त हो जाता है। पैरों पर अश्र्यंग करते रहने से पाँवों में स्थिरता आती है, निद्रा आती है और दृष्टि प्रसन्न रहती है। पैरों का मुन पड़ जाना, श्रम, स्तम्भ ( जकड़न ), सिकुड़न, विवाई फटना—ये कष्ट दूर हो जाते हैं।
वज्योऽभ्यङ्गः कफप्रस्तकृतसंशुद्धजोर्णिभिः ॥९॥
अश्र्यंग का निषेध—प्रतिशय आदि कफज विकारों से पीड़ित रोगी, जिन्होंने शरीरशुद्धि के लिए वमन-विरचन आदि किया हो तथा जो जोर्णरोग से ग्रस्त हों, वे अश्र्यंग का प्रयोग न करें ॥९॥
वक्तव्य—शास्त्रीय विचार विधि-निषेधमय होते हैं, क्योंकि उनके निर्देश सभी अवस्थाओं के लिए दिये जाते हैं, अतएव वे सर्वांगीण होते हैं। इस प्रकरण में सबसे पहले प्रतिदिन अश्र्यंग करने का सामान्य निर्देश दिया था, यह निषेधात्मक निर्देश विशेष परिस्थिति के लिए है। सुश्रुत का अनुसरण करने वाले आचार्य हेमाद्रि ने कहा है—'कृतसंशुद्धस्तदहरेव निषिद्धः'। अर्थात् जिसने वमन आदि का जिस दिन प्रयोग किया हो उस दिन अश्र्यंग न करे। इसी विषय को स्पष्ट रूप से सुश्रुत ने चिकित्सास्थान २।४।३५-३७ में कहा है।
लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मैदसः क्षयः। विभक्तघनपात्रत्वं व्यायामादुपजायते ॥१०॥
व्यायाम का विधान—व्यायाम करने से कार्य करने की शक्ति बढ़ती है, जठराग्नि या पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है, मेदम् ( स्थूलता ) का क्षय होता है अर्थात् मोटापा घटता है, अंग-प्रत्यंग ( मांसपेशियों ) स्पष्ट दिखलायी देते हैं और वे ठोस हो जाते हैं ॥१०॥
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है—'शरीरायामजनकं कर्म व्यायाम उच्यते'। ( अ.सं. ३।६२ ) अर्थात् जिससे शरीर में थकावट पैदा हो, उसे 'व्यायाम' कहते हैं। इस परिभाषा से सभी शारीरिक परिश्रम व्यायाम कहे जा सकते हैं, किन्तु भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में व्यायाम की परिभाषा इस प्रकार है—'शरीरचेष्टा या चेष्टा स्वीयार्थं बलवर्द्धिनी। देहव्यायामसङ्ख्याता मात्रया तां समाचरेत्' ॥ ( च.सू. ७।३१ ) अर्थात् जो भी शरीर की चेष्टा ( कर्म ) अपने मन को अच्छी लगे, जो शरीर को स्थिरता
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प्रदान करती हो और बल को बढ़ाती हो, उसे 'व्यायाम' कहते हैं। उसे मात्रा के अनुसार करना चाहिए। यह व्यायाम की परिभाषा सर्वोत्तम है।
संसार में व्यायाम के अनेक प्रकार देखे जाते हैं, वे भी विभिन्न दृष्टियों से व्यायाम ही हैं। यथा—दण्ड, बैठक, शीर्षासन, कुश्ती, तैरना, हाकी, क्रिकेट आदि। इसी प्रसंग में आगे कहा जायेगा कि किनको व्यायाम नहीं करना चाहिए। पहलवान बनने की इच्छा हो तो उत्तम (पौष्टिक) खान-पान की व्यवस्था होनी चाहिए। जो प्रत्येक नर-नारी घरेलू कार्य करते हैं उनसे भी थकावट आती ही है, किन्तु वास्तव में इनकी गणना व्यायाम के रूप में नहीं होती। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक श्रम अति आवश्यक है।
वातपित्तामयी बालो वृद्धोऽजीर्णी च तं त्यजेत्।
व्यायाम का निषेध —वातज तथा पित्तज रोगों से पीड़ित रोगी, बालक, वृद्ध तथा अजीर्णरोग से पीड़ित मनुष्य 'व्यायाम' न करें।
बक्तव्य —यहाँ बालक तथा वृद्ध के लिए व्यायाम करने का निषेध किया है, अतः इनकी आयुसीमा का निर्देश करते हुए वारम्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं—'बालः आपोऽशवर्षात्', 'वृद्धः सप्ततैरुद्ध्वम्' अर्थात् सोलह वर्ष तक की अवस्था वाला बालक कहा जाता है और सत्तर वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला वृद्ध होता है।
अर्धशक्त्या निषेव्यस्तु बलिभिः स्निग्धभोजिभिः ॥ ११ ॥
शीतकाले वसन्ते च, मन्दमेव ततोऽव्यदा।
अर्धशक्ति तथा काल-निर्देश —बलवान् तथा स्निग्ध (घी-तेल आदि से बने हुए तथा बादाम, काजू आदि) पदार्थों को खाने वाले मनुष्य शीतकाल (हेमन्त-शिशिर ऋतु) में एवं वसन्त ऋतु में आधी शक्ति भर व्यायाम करें, इससे अन्य ऋतुओं में और भी कम व्यायाम करें ॥ ११ ॥
बक्तव्य —अर्धशक्ति का परिचय—व्यायाम करते-करते हृदयस्थान में स्थित वायु जब मुख की ओर आने लगे अर्थात् जब व्यायाम करने वाला हाँफता हुआ मुख से साँस लेने लगे तो यह बलाघर्ष या अर्धशक्ति का लक्षण है। इस स्थिति में यह सोच लेना चाहिए कि इस समय आधा बल समाप्त हो चुका है। देखें—सु.चि. २४४७। और लक्षण भी देखें—काँखों में, माथे पर, नासिका के ऊपर, हाथों-पैरों तथा सभी मधियों में पसीना आने लगे और मुख सूखने लगे तब समझना चाहिए कि आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है। उस समय व्यायाम करना छोड़ दें। स्वयं बैठकर अपने शरीर के अवयवों को मसलें। सर्दी के दिनों में अर्धशक्ति पर्यन्त व्यायाम करने की शास्त्र की आज्ञा है, उसके बाद और भी कम व्यायाम करना चाहिए, यही 'मन्दमेव' शब्द का अभिप्राय है।
तं कृत्वाऽनुसुखं देहं मर्दयेच्छ समन्ततः ॥ १२ ॥
शरीरमर्दन-निर्देश —व्यायाम के बाद का कर्म—व्यायाम कर लेने के बाद सम्पूर्ण शरीर का अनुलोम सुखद मर्दन कर्म चारों ओर से करना चाहिए अथवा क्रमशः सभी अंगों को मसलना चाहिए ॥ १२ ॥
बक्तव्य —सुश्रुत के टीकाकार जैज्जट का कथन है कि मर्दन (मसलना) यह क्रिया भी व्यायाम का ही एक अंग है। यह मर्दन कर्म भी ऐसा न हो जो शरीर को कष्टकारक हो, अतएव महर्षि वारम्भट ने इसका एक विशेषण 'अनुसुखं' दिया है अर्थात् जो सुख के अनुकूल हो।
तृष्णा क्षयः प्रतमको रक्तपित्तं श्रमः क्लमः। अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिविश्व जायते ॥
अतिव्यायाम से हानि —अधिक व्यायाम करने से प्यास का लगना, क्षय (राजयक्ष्मा), प्रतमक श्वास, रक्तपित्त, श्रम (थकावट), क्लम (मानसिक दुर्बलता या मुस्ती), कास, ज्वर तथा छर्दि (वमन) आदि रोग हो जाते हैं अथवा हो सकते हैं ॥ १३ ॥
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वक्तव्य —प्रायः देखा गया है कि जो बहुत दिनों तक व्यायाम करते रहे, बाद में जिन्होंने एकाएक व्यायाम करना छोड़ दिया, उन्हें वृद्धावस्था में आमवात, ऊहस्तम्भ, अर्शरोग ( बवासीर ) अथवा अण्डवृद्धि ( पोता का बढ़ जाना ) आदि रोग हो जाते हैं।
व्यायामजागराध्वस्तीहास्यभाष्यादि साहसम् । गजं सिंहं इवाकर्पन् भजन्नति विनश्यति ॥ १४ ॥
व्यायाम आदि का निषेध —व्यायाम, जागरण, मार्गगमन, मैथुन, हैसना, बोलना ( जोर-जोर से चिल्लाना ) तथा साहसिक कार्य का अधिक सेवन करने से शक्ति युक्त मनुष्य का भी उस प्रकार विनाश हो जाता है जैसे सिंह अपने द्वारा मारे हुए हाथी को खींचकर ले जाने का दुःसाहस करता है, तो वह स्वयं मर जाता है ॥ १४ ॥
वक्तव्य —व्यायाम आदि का युक्तियुक्त सेवन सुखद होता है, किन्तु इनका अधिक सेवन न करे, यही ग्रन्थकार का अभिप्राय है। इसीलिए शक्तिमान् सिंह भी यदि अपने द्वारा मारे गये हाथी को खींचकर ले जाना चाहेगा तो वह भी मर जायेगा। यह एक दुःसाहस का उदाहरण है। जागरण ( रात में अधिक जागना ), अधिक मार्ग चलना, जो कभी नहीं चलता उसके लिए थोड़ा चलना भी बहुत है, इस प्रकार विचार कर लें। ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं। दुःसाहस का अधिक प्रयोग करने से उरःक्षत हो जाता है।
अधिक व्यायाम करने से 'क्षय' हो जाता है, यह ऊपर कहा गया है। तन्त्रकार की एक अपनी शैली होती है, वह है—सूत्र तथा व्याख्यान शैली। क्षय या राज्यक्षमा के सम्बन्ध में महर्षि पुनर्वसु के उद्गार—'राज्यक्षमा रोगसमूहानाम्' तथा 'अयथाबलमारम्भः प्राणोपरोधिनाम्' । ( च.सू. २५।४० ) उक्त १४ वें श्लोक का आधार है—'व्यायाम'... 'मात्रया' ( च.सू. ७।३४ )।
उद्भूतं कफहरं मेदसः प्रविलायनम् । स्थिरीकरणमङ्गानां त्वचप्रसादकरं परम् ॥ १५ ॥
उबटन के गुण —व्यायाम के बाद उबटन करना चाहिए, इससे कफ का नाश होता है। यह मेदोघातु को पिघला कर उसे मुखा देता है, अंगों को स्थिर ( मजबूत ) करता है और त्वचा को कान्तियुक्त करता है ॥ १५ ॥
वक्तव्य —जो या चना का आटा अथवा सरसों को पीसकर उसमें तेल तथा हल्दी मिलाकर शरीर पर मसलने को उद्भूतन, उत्सादन या उबटन कहा जाता है। इस विधि से रोमकूपों में जमी हुई मैल भलीभाँति निकल जाती है। इससे त्वचा चिकनी तथा कोमल हो जाती है। इसका प्रयोग छोटे बच्चों के शरीर पर भी किया जाता है। इसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। परन्तु इस वैज्ञानिक युग में ये सात्विक सुख कहीं सुलभ है ?
दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमूर्जाबलप्रदम् । कण्डूमलश्रमस्वेदतन्नातुइदाहपाभजित् ॥ १६ ॥
स्नान के गुण —स्नान करने से जठराग्नि प्रदीप्त होता है, यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) है, आयु को बढ़ाता है, उत्साहशक्ति तथा बल को बढ़ाता है; कण्डू ( खुजली ), मल ( त्वचा का मैल ), थकावट, पसीना, ऊँचाई, प्यास, दाह ( जलन ) तथा पाप ( रोग ) का नाश करता है ॥ १६ ॥
वक्तव्य —स्नान करने से ऊपर जिन लाभों का वर्णन किया है, उनका यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है। स्नान वृष्य है, देखें—अ.हू.उ. ४०।३५। स्नान कर लेने से मन प्रसन्न होता है, अतः यह वृष्य है।
उष्णाम्बुनाऽधःकायस्य परिषेको बलावहः । तेनैव तूतमाङ्गुस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥ १७ ॥
उष्ण-शीत जलप्रयोग —उष्ण ( गरम ) जल से अधःकाय ( गरदन से नीचे के शरीर ) का परिषेक ( स्नान ) बल को बढ़ाता है। यदि उसी ( गरम जल ) से सिर को घोया जाय अर्थात् गरम पानी से शिरःस्नान किया जाय तो इससे बालों तथा आँखों की शक्ति घटती है ॥ १७ ॥
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स्नानमर्दितनेत्रास्यकर्णरोगातिसारिषु। आध्यानपीनसाजोर्णभुक्तवत्सु च गृहितम्॥१८॥
स्नान का निवेश— अर्दित ( मुखप्रदेश का लकवा ), नेत्ररोग, मुखरोग, कर्णरोग, अतिसार, आध्यान ( अफरा ), पीनस, अजीर्ण रोगों में तथा भोजन करने के तत्काल बाद स्नान करना हानिकारक होता है॥१८॥
वक्तव्य— स्नान करने के बाद बालों को मुँह अंगोछा से पोछकर उनमें तेल लगाकर कंघी कर लें और स्वच्छ वस्त्रों को धारण करें। दिनचर्या के अनेक कृत्यों का उल्लेख इसमें नहीं हो पाया है, उन्हें आप चरक-सुश्रुत से संग्रह कर लें। अ.सं.अ. ३ में दिनचर्या से सम्बन्धित अन्य अनेक विषय दिये गये हैं, आप उन्हें भी देखें।
जोर्णं हितं मितं चाद्यान्न वेगनीरयेद्वलात्। न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्नजित्वा साध्यमामयम्॥
भोजन आदि कर्तव्य— स्नान कर लेने के बाद तथा पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात् जो हितकर भोजन हो उसे मात्रा के अनुसार खाये; मूत्र, पुरीष के वेगों को बलपूर्वक न उभाईं। यदि मल-मूत्र का वेग मालूम पड़े तो उन्हें दबाकर अन्य कर्मों में न लग जाय। साथ ही यदि किसी प्रकार का साध्यरोग हो तो उसकी चिकित्सा किये बिना भी किसी दूसरे कार्य में नहीं लग जाना चाहिए॥१९॥
वक्तव्य— स्मृतियों में कथित दिनचर्या से आयुर्वेदीय दिनचर्या सर्वथा भिन्न है और होनी भी चाहिए, क्योंकि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। स्मृतिनिर्दिष्ट चर्या मनु. ४।१२-१३ में आप ही देखिए—कहाँ स्नान के बाद सन्ध्या और कहीं सीधे भोजन, वह भी जब पहले का पच गया हो। हितं मितं— हितकारक वह भोजन है जिसमें धारण तथा पोषण करने की शक्ति हो। देखें—'डुधाद्धारपोषणयोः' धातु से त्त प्रत्यय जोड़कर बना हुआ शब्द—धा + त्त + हित। इसके बाद ऋतु, देश, काल का विचार करके जो साल्प्य हो, उसे हित कहते हैं। मितं—नपा-तुला, परिमित या थोड़ा। 'न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्—'इस विषय का विशेष व्याख्यान आप चरकसंहिता सू.अ. ७ में विस्तारपूर्वक देखें। अथवा अ.हृ.सू. अध्याय ४ का अवलोकन करें। 'नजित्वा साध्यमामयम्—'यह वाग्भट का उपदेश विशेष करके आशुकारी रोगों के लिए है। अन्यथा प्रमेह तथा अर्श ( बवासार ) आदि अनेक रोग ऐसे हैं, जिनमें रोगी चिकित्सा के साथ अन्य कार्यों को भी करता ही रहता है। यदि साध्य एवं आशुकारी रोगों की उपेक्षा कर रोगी अन्य कार्य करने लगता है, तो वह रोग असाध्य हो सकता है। भोजनविधि का वर्णन अ.सं.सू. ३।७६-८० तक को भी देख लें। यह भोजनविधि का आर्य स्वरूप है।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः। सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत्॥२०॥
सुख का साधन धर्म— सभी प्राणी चाहते हैं कि हमें सुख मिले, अतएव उनकी प्रवृत्तियाँ ( कार्य करने की लगन ) सुख पाने के लिए होती है और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं होती। अतः सभी को धर्म-कार्य करने में तत्पर रहना चाहिए॥२०॥
वक्तव्य— धर्म शब्द को लेकर धार्मिक नेताओं तथा राजनीतिक नेताओं ने बड़ा हंगामा चलाया है, अस्तु। वास्तव में प्राणिमात्र का यह धर्म है कि वह अपनी तथा अपने उपकारक पदार्थों की रक्षा करे। इसमें किसी को किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। इसी प्रकार की व्युत्पत्ति हमारे शास्त्रचिन्तकों ने धर्म शब्द की की है। देखें—'प्रियते लोकः अनेन इति धर्मः' अथवा 'धरति लोकम् असौ इति धर्मः'। आज वास्तविक धर्म का आचरण न करने के कारण देश में जो दुर्बलथा फैली है, इसको कोई नहीं देख रहा है। मनु आदि धर्माचार्यों ने धर्म का आचरण करने की सभी को आज्ञा दी है तथा सभी के अलग-अलग धर्मों का उपदेश दिया है। संक्षेप में इन स्थलों का अवलोकन करें। मनु. २।१२, २।११२. ४।२३८, २४१, २४२; ६।९२, ८।१५ तथा १७। उक्त उद्धरणों के अतिरिक्त महामानव मनु ने 'धर्म' शब्द की एक परिभाषा और भी दी है—'सत्तेर्केणाऽनुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतः'। ( मनुः १।२।०६ ) अर्थात् जो तर्कबुद्धि से अनुसन्धान ( विचार ) करता है, वही धर्म को समझता है, यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है—'अतर्क्यं वै
३ अ० हू०
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धर्मः' अर्थात् धर्म के विषय में तर्क न करे। क्योंकि शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं— १. प्रभुसम्मित, २. मुहूर्तसम्मित तथा ३. कान्तासम्मित। ये वेद आदि धर्मशास्त्र 'प्रभुसम्मित शास्त्र' के अन्तर्गत आते हैं, अतः ये अतर्क्य हैं; राजशासन के समान कठोर होते हैं।
सारांशः —जो सत्कर्म अपनी तथा दूसरों को धारण करता है, उसका नाम 'धर्म' है। उसी को कोषकारों ने पुण्य, श्रेयस्, मुक्त तथा वृष पर्यायों से कहा है। शुभ कर्म को 'धर्म' और अशुभ कर्म को 'अधर्म' या पाप कहा है। ऐसे कर्म या कर्मों से स्वास्थ्य-लाभ होता है और मनःसन्तोष प्राप्त होता है। यही कारण है कि आयुर्वेद में विधि-निषेधक्रम से धर्म की शिक्षा दी जाती है। आयुर्वेद में कहा गया सम्पूर्ण सद्बुत धर्म का आकर है। इसी को सदाचार कहा गया है और सत् आचार को ही चरक ने 'आचाररसायन' कहा है। अन्य आयुर्वेदीय रसायन व्ययसाध्य हैं, किन्तु 'आचाररसायन' संयमसाध्य है।
भक्त्या कल्याणमित्राणि सेवेतेतरदूरगः।
मित्र-अमित्र सेवन-विचार —अच्छे मित्रों ( शुभचिन्तक, अच्छी सलाह देने वालों ) का श्रद्धा-भक्ति से सेवन करे। इनसे विपरीत चरित्र वालों से दूर रहे अर्थात् सावधान रहे, क्योंकि इनका सेवन करने से हानि हो सकती है।
हिंसास्तेयात्यथाकामं पैशुन्यं परुषानुते ॥ २१ ॥
सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्निपर्ययम्। पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैत्यजेत् ॥ २२ ॥
पापकर्मों का त्याग —नीचे लिखे गये दस प्रकार के पापकर्मों का मन, वचन तथा कर्म से सदैव परित्याग करे— १. हिंसा ( मार-पीट या किसी के मन को दुःखाना आदि ), २. स्तेय ( चोरी, लूट ), ३. अन्ध्याकाम ( अनुचित हंग से सुखभोग करना; जैसे—अगम्यागमन आदि )—इन शारीरिक दुष्कर्मों का शरीर से परित्याग करे। ४. पिशुनता ( ज़ुगुलखोरी ), ५. परुषवाक्य ( कठोर या अप्रियवचन ), ६. अनूत ( झूठी बात ) तथा ७. सम्भिन्न आलाप ( कभी कुछ और कभी कुछ कहना, जिसे दोगलापन कहते हैं )—वाणी सम्बन्धी इन पापकर्मों का वाणी द्वारा परित्याग करे अर्थात् ऐसी बातें न कहे। ८. व्यापाद ( किसी को मार डालने या मरवा डालने की योजना ), ९. अभिध्या ( दूसरे की सम्पत्ति को हड़प जाने की इच्छा करना ) तथा १०. दृग्निपर्यय ( शास्त्र के निर्देशों के विपरीत सोचना, नास्तिकता, आप्त वाक्यों के विरुद्ध सोचना आदि )—इन मानसिक पापों का मन से परित्याग करे ॥ २१-२२ ॥
अवृत्तिव्याधिशोकार्तननुवर्तते शक्तिः।
अनुकूल व्यवहार-निर्देश —जिनकी कोई आजीविका नहीं है, जो रोग तथा शोक से पीड़ित हैं, उनके साथ अपनी शारीरिक तथा आर्थिक शक्ति के अनुरूप उचित व्यवहार करे अर्थात् आजीविकाहीनों को आर्थिक सहायता, रोगियों को चिकित्सा आदि की सहायता तथा शोकपीड़ितों को उचित आश्वासन देकर उनके अनुकूल व्यवहार करे।
आत्मवत्सलं पश्येदपि कीटपिपौलिकम् ॥ २३ ॥
समदृष्टि का निर्देश —सभी प्राणियों को अपने समान समझें, भले ही कीड़े-मकोड़े, चींटियाँ ही क्यों न हों अर्थात् किसी को क्षुद्र ( छोटा या नीच ) न समझें। उन्हें कष्ट न पहुँचायें, उन पर दया करें ॥ २३ ॥
अर्चयेहेवगोविप्रवृद्धवैद्यनृपातिथीन् ।
सम्मान करने का निर्देश —देवता, गाय, ब्राह्मण, वृद्ध, वैद्य, नृप तथा अतिथि—इनकी पूजा करे अर्थात् इन्हें उचित सम्मान दें तथा इनका सत्कार करे।
वक्तव्य —यहाँ वृद्ध शब्द से माता-पिता तथा गुरुजनों का समावेश भी कर लेना चाहिए।
विमुखात्रार्थिनः कुर्यान्नावमन्येत नाक्षिपेत् ॥ २४ ॥
दितन्त्राध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
३५
याचकों की सम्मान-विधि—अर्थियों ( याचकों ) को अपनी शक्ति के अनुसार कुछ देना चाहिए। उन्हें निराश नहीं लौटाना चाहिए, उनका अपमान न करे और न उन्हें झिड़कना ही चाहिए॥ २४॥
उपकारप्रधानः स्यादपकारपरैऽप्यहो ।
उपकार का निर्देश—सदा सबका उपकार करना चाहिए, भले ही अपकार करने के लिए तैयार शत्रु ही सामने क्यों न हो, उसके प्रति भी उपकार करना चाहिए।
वक्तव्य—सामान्य दृष्टिकोण है कि शत्रु के साथ अपकार ही करना चाहिए, किन्तु यहाँ तन्त्रकार का कथन उसके विपरीत है। उसका समर्थन इस प्रकार किया जा रहा है—जैसे वात आदि दोष रोगकारक होते हैं और जब वे सम अवस्था में होते हैं तो वे 'शरीरधारणात् धातवः' कहे जाते हैं, अतएव वे दोष भी हितकारक कहे जाते हैं।
सम्पद्विपत्स्वेकमना, हेतावीर्घ्यस्फले न तु॥ २५॥
समभाव का निर्देश—सम्पत्ति ( सुख ) में तथा विपत्ति ( दुःख ) में समान भाव से रहे। किम कारण से सम्पत्ति मिली है और किस कारण से विपत्ति मिली है, इसका पता करे। जिस कारण से विपत्ति मिली है उस कारण से द्वेष करना चाहिए, न कि विपत्ति से द्वेष करे॥ २५॥
वक्तव्य—यह सम्पत्ति एवं विपत्ति अपने-पराये सब पर आती है। दूसरे की सम्पत्ति को देखकर जलना नहीं चाहिए और दूसरे की विपत्ति को देखकर प्रसन्न नहीं होना चाहिए; अपितु यदि आप सम्पन्न होना चाहते हैं, तो उस कारण का पता लगाइए और वैसा प्रयत्न कीजिए, जिससे आप भी सम्पन्न हो सकें, जलते रहने से कोई लाभ नहीं होता।
काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम्।
मधुरभाषण-निर्देश—समय पर बोलें, हितकर बात कहें, थोड़ा ( युक्तियुक्त ) बोलें, ऐसी बात कहें जो अविस्वादि ( जिसका कोई विरोध न करे अर्थात् सत्य ) हो तथा पेशल ( मौठा वचन ) कहें।
पूर्वाभिभाषी, सुमुखः सुशीलः कर्णामृदुः॥ २६॥
नैकः सुखी, न सर्वत्र विश्रब्धो, न च शङ्कितः।
भाषण-विधि—पहले बोलें ( यह प्रतीक्षा न करे कि जब वह बोलेगा तब मैं बोलेगा ) अर्थात् मित्र के मिलते ही उसके बोलने से पहले मैं बोलेगा, यह भाव मन में होना चाहिए और कुशल प्रश्न करने लगे। प्रसन्नचित्त, सभ्य व्यवहार करने वाला, दयालु, सरल स्वाभाव वाला, अकेला सुखी न रहे अर्थात् अपने बन्धु-बान्धव-इष्टमित्रों सहित सुखों का उपभोग करे। सबके साथ विश्वास न करे और सबके साथ अविश्वास भी न करे॥ २६॥
न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्विपुम्॥ २७॥
प्रकाशयेत्तापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः।
विचारों को गुप्त रखें—न अपने को किसी का शत्रु और न दूसरे को अपना शत्रु बतलाये। किसी ने अपना अपमान किया हो, उसका तथा अपने स्वामी, राजा आदि की अपने प्रति स्नेहहीनता का ही वर्णन किसी से न करे॥ २७॥
जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति॥ २८॥
तं तथैवानुवर्तत परराधनपण्डितः।
परच्छन्दानुवर्तन—दूसरे के मन का अभिप्राय समझकर जो व्यक्ति जिस प्रकार सन्तुष्ट होता हो, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, उसे 'परराधनपण्डित' कहते हैं॥ २८॥
३६
अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—पञ्चतन्त्र में इसी आशय का एक पद्य इस प्रकार आया है—‘लुब्धमर्थेन गृहीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्ख छन्दानुरोधेन यथार्थत्वेन पण्डितः॥’ (सूक्ति) अर्थात् लोभी को पैसा देकर, क्रोधी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को जैसा वह कहता है वैसा ही मानकर और यथार्थ बात को कहकर पण्डित को प्रसन्न करना चाहिए। यह लोकव्यवहार है।
न पीडयेदित्तिद्याणि न चैतान्यति लालयेत्॥ २९॥
इन्द्रिय-व्यवहारविधि—आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को रूप, शब्द आदि अपने-अपने विषयों का उपभोग करने से न रोके, परन्तु उन-उन विषयों में उन्हें अत्यन्त लोलुप्य भी न होने दें॥ २९॥
त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत् च विरोधयत्।
त्रिवर्ग-विरोध का निषेध—ऐसा कोई कार्य न करे जिससे त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) की प्राप्ति न हो अथवा त्रिवर्ग का विरोध होता हो।
अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमास्म॥ ३०॥
सभी धर्मों का आचरण—सभी प्रकार के धर्मों में मध्यम मार्ग से चले, किसी धर्म का घोर समर्थक या घोर विरोधी न बने। यहाँ धर्म शब्द में आयुर्वेदोक्त सदाचार मार्ग में मध्यममार्ग पर चले॥ ३०॥
नीचरोमनखश्चर्मुर्निर्मलाङ्घ्रिमलायनः। स्नानशीलः सुसूरभिः सुवेण्डुन्तुलणोज्ज्वलः॥ ३१॥
शरीरशुद्धि के प्रकार—रोम (लौम), नख तथा श्मश्रु (दाढ़ी-मोछ) इन्हें अधिक न बढ़ाये, इन्हें काटते या कटवाते रहें। पैरों को स्वच्छ रखें, गुद आदि मलमार्गों को भी साफ रखना चाहिए। प्रतिदिन स्नान करें, सुगन्धित पदार्थों (इत्र आदि) का सेवन करें, सुन्दर वस्त्र धारण करें, उद्भूत वेश न बनाये अर्थात् सम्भ्य पुरुषों के आचरणों का अनुकरण करें॥ ३१॥
धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः।
रत्न आदि का धारण—रत्न, सिद्ध मन्त्र तथा औषधद्रव्यों को धारण करना चाहिए।
बक्तव्य—रत्न—हीरा, माणिक्य, पुखराज, नीलम आदि। सिद्धमन्त्र—बला, अतिबला, अपराजिता आदि। महौषधि—सहदेवी आदि। इनको वैद्य तथा दैवज्ञ आदि के निर्देशानुसार बाँह तथा गला आदि में धारण करना चाहिए।
सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदुकु॥ ३२॥
छाता आदि धारण—छाता लगाकर चले, जूता पहन कर चले तथा चार हाथ आगे तक के मार्ग को देखते हुए चले॥ ३२॥
निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान्।
दण्ड आदि धारण—रात में यदि कोई आवश्यक कार्य आ जाय तो हाथ में लाठी लेकर चले, सिर में पगड़ी बाँध लें या टोपी पहन लें और किसी को साथ में सहायता के लिए ले लें।
बक्तव्य—ऐसे उपदेश या तो शास्त्र देते हैं अथवा माता-पिता, शुभचिन्तक। पञ्चतन्त्र में भी एक ऐसी कथा आयी है; यथा—‘अपि का पुरुषो मार्गं द्वितीयः क्षेमकारकः’। अर्थात् कैसा भी आदमी हो उसे साथ ले लेना चाहिए, वह कल्याण करता ही है।
चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ ३३॥
नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवो न च।
गमन-निर्देश—चैत्य (देवता का स्थान, बौद्ध या जैन मन्दिर, समाधि) पर न चढ़े, ध्वजा के डण्डा पर न चढ़े, निन्दित कर्म करने वाले पुरुष की छाया का स्पर्श भी न करे, भस्म (राख) तथा तुष (भूसी) के ढेर पर और अपवित्र स्थान पर न चढ़े और बालू एवं ठेले के ढेर पर चढ़कर न चले॥ ३३॥
दिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
३७
नदीं तरेन्न बाहुभ्यां, नाधिरुक्तधमभिन्नजेत् ॥ ३४ ॥ सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेदुष्प्यानवत् ।
निषिद्ध कार्य—वेगवाली नदी या घहराती हुई नदी को बाँहों से तैरकर पार न करे। अधिरुक्तध (आग के ढेर अथवा ज्वालामुखी) के समीप न जावे। दूषित सवारी पर जैसे कोई नहीं चढ़ता उसी प्रकार सन्दिग्ध नौका (जिसके डूब जाने का भय हो) उसमें न चढ़े और जिस वृक्ष का टूट कर गिर जाने का सन्देह हो उस पर भी न चढ़े ॥ ३४ ॥
नासंतवृतमुखः कुर्यात्सुतिहास्यविजुम्भणम् ॥ ३५ ॥
छीक आदि करने की विधि—मुख को ढके बिना न छीके, न हँसे और न जँभाई ले (यह शिष्टाचार है) ॥ ३५ ॥
नासिकां न विकुण्णीयात्राकस्माद्विलिखेद्वुवम् । नाङ्गैश्चेष्टेत विगुणं, नासीतोक्तटकश्चिरम् ॥
आंगिक चेष्टाओं का निषेध—अकारण नासिका के छिद्रों को अँगुली से न खोदे। अकारण भूमि को अँगुलियों से न खोदे (यह लक्षण विषदाता का कहा गया है)। टोंगों, बाँहों आदि से विकृत चेष्टाएँ न करें; जैसे—मुख बिचकाना, आँखें मटकाना आदि तथा उल्टक आसन से पाँवों के बल न बैठे ॥ ३६ ॥
बक्तव्य—सुश्रुत ने भी इस प्रकार के भावों का निषेध किया है। देखें—सु.चि. २४।९५।
देहवाक्येतसां चेष्टाः प्राक् श्रमाद्विनिवर्तयेत् । नोर्थ्वजानुश्चिरं तिष्ठेत्—
शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा—शरीर, मन तथा वाणी की चेष्टाओं (इनके कार्यों) को थकान होने से पहले ही रोक देना चाहिए (इस विषय को वाग्भट ने सद्वृत्त में दिया है, चरक ने इसे व्यायाम के लक्षणों में कहा है) और चिरकाल तक जाँचों को ऊपर की ओर उठाकर लेटा न रहे।
—नक्तं सेवेत न द्रुमम् ॥ ३७ ॥
तथा चत्वरचैत्यान्तश्चतुष्पथसुरालयान् । सूनाट्वीशून्यगृहशमशानानि दिवाऽपि न ॥ ३८ ॥
अन्य सदाचार—रात्रि में वृक्ष के नीचे न रहे तथा चत्वर (तिमुहानी), चैत्य के समीप या भीतर, चतुष्पथ (चौराहा या चौमुहानी) पर, देवमन्दिर या मद्यशाला में, सूना (कसाईघर अथवा फाँसी देने के) स्थान पर, घोर वन में, सुनसान घर में तथा शमशान में दिन में भी न रहे ॥ ३७-३८ ॥
बक्तव्य—'रात में पेड़ के नीचे न रहे'—इस वाक्य के समर्थन में श्री अरुणदत्त कहते हैं—'उस वृक्ष के आश्रय में रहने वाले कीड़ों के मल-मूत्र गिरने से रक्षा होगी। आज का विज्ञान कहता है कि रात्रि में वृक्ष 'कार्बन-डाई-आक्साइड' गैस को छोड़ते हैं, अतः उनसे दूर रहना चाहिए। क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।
उक्त ३८वें श्लोक में 'चत्वर' तथा 'चतुष्पथ' दो एकार्थवाचक शब्दों का समावेश हुआ है, अतः इसकी संगति बैठाने के लिए विद्वान् टीकाकारों ने 'चत्वर' का अर्थ 'तिमुहानी' किया है। उसका आधार यह है—'चत्वरं स्यात् पथां श्लेषं' इति हैमः। अर्थात् मार्गों का संगम एकाधिक का हो ही सकता है। फिर भी हमारे विचार से यहाँ 'चत्वर' का अर्थ—स्थण्डिल या आँगन तिमुहानी से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। इसी तथ्य को श्री अरुणदत्त ने भी स्वीकार करते हुए कहा है—'अन्ये ल्वाहूः—यत्र प्रदेशे नगरनिवासिनो ग्राम्या वा समेत्य नानाविधाः कथाः कुर्वन्ति, स चत्वर उच्यते'। सुरालयान्—'सुर + आलयान्' = देवगृह या मन्दिर। 'सुरा + आलयान्' = मद्यशाला या मधुशाला। ये दो अर्थ उक्त विग्रहों के आधार पर किये गये हैं।
सर्वथेश्वेत नादित्यं, न भारं शिरसा वहेत् । नेश्वेत प्रततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च ॥ ३९ ॥
३८
अष्टाङ्गहृदये
अन्य सदाचार—सूर्य को एकटक होकर देखता न रहे, सिर पर बोझ रखकर न ले जाये; मूधम, बमकीले, अपवित्र तथा अप्रिय पदार्थों को लगातार देखना न रहे ॥ ३९ ॥
वक्तव्य—सूर्य को कब न देखे, इस सम्बन्ध में मनुस्मृति का वचन देखें—'उदय तथा अस्त होते हुए, ग्रहणकाल में, जल में प्रतिबिम्बित, आकाश के मध्य में स्थित सूर्य को न देखें। ( मनु. ४३७ )
मद्यविक्रयसन्धानदानानानि नाचरेत्।
मद्य-विक्रय आदि का निषेध—मद्य का विक्रय न करे, मद्य का सन्धान ( निर्माण ) भी न करे और उसका लेन-देन ( व्यापार ) भी न करे तथा उसे पीना भी नहीं चाहिए; केवल 'औषधार्थे सुरां भिबेत्'।
पुरोवातातपरजस्तुधारपरुषानिलान् ॥४०॥
अनुजः क्षवयुद्धारकासस्वप्नास्रमैयुनम्। कूलच्छायां नृपदिष्टं व्यालदंष्ट्रिविपाणिनः ॥४१॥
हीनानार्थातिनिपुणसेवां विग्रहमुत्तमैः। सन्ध्यास्वभ्यवहारस्त्रीस्वप्नाध्ययनचिन्तनम् ॥४२॥
शत्रुसत्रगणार्कीर्णगणिकापणिकाशनम्। गात्रवक्त्रनखैर्वाद्यं हस्तकेशावधूतनम् ॥४३॥
तोयाग्निपूज्यमध्येन यानं धूमं शवाश्रयम्। मद्यातिसर्कितं विश्वम्भस्वातन्त्र्ये स्त्रीषु च त्यजेत् ॥
अन्य निषिद्ध कर्म—पूर्व दिशा की ओर से बहने वाली वायु का, सामने से आने वाली वायु का, क्षुप का, घुल्लि का, तुषार ( ओस तथा बर्फ ) का तथा झोंके से चलने वाली वायु ( आँधी ) का सेवन न करे। जब शरीर की स्थिति सीधी न हो ऐसी अवस्था में न झोंके, न डकार ले, न खाँसे, न सोये, न खाना खाये और न मैयुन करे। कूल ( नदी का किनारा ) की छाया में न बैठे, राजा के शत्रु का साथ न करे। सर्प से, दीतों से काटने वाले कुत्ता आदि प्राणियों से दूर रहे। सींग से मारने वाले साँड़, भैंसा आदि प्राणियों से सदा दूर रहे। नीच, अनार्य ( अधम या कमौना ), अतिनिपुण ( दुष्ट, शैतान ) व्यक्तियों की सेवा ( नौकरी ) न करे। उत्तम ( अपने से बलवान् अथवा सदाचार युक्त ) पुरुषों से झगड़ा ( वैर ) न करे।
सन्ध्याकाल में भोजन, स्त्रीसहवास, सोना, अध्ययन आदि किसी विषय का विचार न करे। यह समय भगवद्भजन करने का होता है। शत्रु का, यज्ञ का, गण ( समुदाय या समाज ) का, आर्कीर्ण ( इधर-उधर बिखरा हुआ ), गणिक ( वेश्याओं ) का तथा पणिक ( दुकान, होटल आदि ) का भोजन न करे। ( ब.सू. ८।२० के अनुसार आर्कीर्ण का अर्थ—बहुजनार्कीर्ण है।) गात्र ( काँख, ताली आदि ) से, मुख से तथा नाखूनों से बाजा बजाने की नकल न करें। हाथों को हिलाना एवं बालों का अवधूतन ( कम्पन ) न करे। ( प्रायः हाथों तथा केशों का कम्पन यह लक्षण उन्मादरोगियों में देखा जाता है। चेतन अवस्था में ये कृत्य शिष्टाचार के विरुद्ध हैं। )
जल, अग्नि तथा पूज्यजनों के बीच में से होकर इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। ( इस विषय को चाणक्य ने इस प्रकार कहा है—'विप्रयोर्विप्रवहद्योश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः। अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य तृषभस्य च' ॥—चाणक्यनीति ) श्मशान में चिता के धुँआ से दूर रहे, मद्य ( मादक पदार्थों के सेवन ) का अभ्यासी न बने। स्त्रियों का विश्वास न करे और इन्हें स्वतन्त्रता प्रदान न करे, क्योंकि 'प्रायः साहसिकाः स्त्रियः' ॥ ४०-४४ ॥
वक्तव्य—ऊपर कहा गया सद्वृत्त सत्पुरुषों तथा कुलांगनाओं के आचरण का लेखा-जोखा है। प्रतिदिन के आचरण में उक्त उपदेशों का समावेश अवश्य कर लेना चाहिए। सद्वृत्त में कहे गये विषयों के लिए ब.सू. ५ तथा ८ को और मु.चि. २४ को देखें। यहाँ कहा गया सम्पूर्ण वृत्त सदुत्तम है। इनका व्यावहारिक प्रयोग मनुष्य को सदाचारी एवं सज्जन बनाता है, जिससे समाज उसका आदर करता है और परलोक में उसे शुभ गति प्राप्त होती है।
आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः। अनुकुर्यात्तमेवातो लौकिकेऽर्थे परीक्षकः ॥४५॥
दिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
३९
अन्य सदुपदेश—सभी प्रकार के सांसारिक व्यवहारों को सीखने के लिए बुद्धिमान् मानव का सम्पूर्ण संसार ही आचार्य (गुरु) है, फिर भी सांसारिक अर्थ (स्वार्थ तथा परार्थ) की परीक्षा (क्या करने में हित है और क्या करने में अहित है, इस प्रकार का विचार) करने वाला मनुष्य संसार का अनुकरण करे ॥ ४५ ॥
वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने उक्त विषय में अत्यन्त स्पष्ट निर्देश इस प्रकार दिया है—‘कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमताम् आचार्यः, शत्रुश्च अबुद्धिमताम्’ (च.वि. ८।१४) अर्थात् समझदार नर-नारियों के लिए सम्पूर्ण संसार आचार्य (गुरु या उपदेशक) है, क्योंकि वे उससे अच्छी बातें सीखते हैं और नासमझ लोग उससे बुरी बातें सीखते हैं, अतः संसार को उनका शत्रु कहा गया है।
आद्रसन्तानता त्यागः कायवाकृचेतसां दमः। स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सद्गतम् ॥ ४६ ॥
सदाचार-सूत्र—सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना, शरीर, मन तथा वाणी पर नियन्त्रण रखना अर्थात् इन्हें स्वतन्त्र न छोड़ना तथा दूसरों के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना (उन्हें भी अपने ही जैसा समझना) यह सूत्र रूप में पूर्ण सदाचार माना गया है ॥ ४६ ॥
नक्तंदानानि मे यान्ति कथम्भृतस्य सम्प्रति। दुःखभाङ्गन भवत्येवं नित्यं सन्नहितस्मृतिः ॥ ४७ ॥
विचार-पद्धति—आजकल मेरे रात-दिन कैसे बीत रहे हैं, मैं कैसा होता जा रहा हूँ? इस प्रकार का प्रतिदिन ध्यानपूर्वक विचार करने वाला पुरुष कभी दुःखी नहीं होता है ॥ ४७ ॥
वक्तव्य—महर्षि चाणक्य ने भी इसी प्रकार सोचने के लिए मनुष्य को बाध्य किया है—‘कः कालः कानि मित्राणि को देशः को व्यायामी। कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहूर्मुहुः’ ॥ (चाणक्यनीति) इस प्रकार विचार करने वाला पुरुष अज्ञानवश हुई अपनी भूलों को सुधार सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह कभी दुःखी नहीं होता।
इत्याचारः समासेन, यं प्राप्नोति समाचरन्।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं यशो लोकांश्च शाश्वतान् ॥ ४८ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुनुश्रीमद्राष्ट्रविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने दिनचर्या नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
सदवृत्त का उपसंहार—इस प्रकार संक्षेप से आचार (सदाचार अथवा सदवृत्त = सज्जों का कर्तव्य) कह दिया गया है। जिसका अपने जीवन में आचरण करता हुआ पुरुष (नर-नारी) दीर्घायु, आरोग्य (उत्तम स्वास्थ्य), ऐश्वर्य (धन-सम्पत्ति), सुयश तथा स्वर्ग आदि सनातन लोकों को प्राप्त करता है ॥ ४८ ॥
वक्तव्य—इस अध्याय में मनुष्यों के हित के लिए सदाचार का संक्षेप से वर्णन किया गया है। यही मनुष्यों का प्रथम अथवा परम धर्म है। इसके सम्बन्ध में मनु ने कहा है। देखें—मनु. १।१०८-११०। इस सदाचार रूपी धर्म से धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है, इससे सुख मिलता है और इसी से रोगों का नाश होता है। लोक में व्याप्त अन्य धर्मों से सदाचार नामक धर्म सर्वोत्तम है। इसका सेवन करने से मानव-जीवन मङ्गल हो जाता है और इसका आचरण न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है। अतः सभी को सदाचार का सेवन करना चाहिए।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
दिनचर्या नामक दूसरा अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
अथात ऋतुचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब यहाँ से हम ऋतुचर्या नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा कि इसके सम्बन्ध में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम— चर्या शब्द का व्याख्यान हमने 'दिनचर्या' प्रकरण में कर दिया था। अब यहाँ 'ऋतु' = दो-दो मास के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष को छः भागों में जो बाँटा गया है उनमें किस प्रकार का आहार-विहार होना चाहिए, इस अध्याय में उस विषय का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत— च.सू. ६; च.वि. ८; सु.सू. ६; सु.वि. २४ तथा सु.उ. ६४ एवं अ.सं. ४ में देखें।
मासेन्द्रिसृष्ट्यार्माघाद्यैः क्रमात् षड्वतवः स्मृताः । शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाः शरद्विमाः ॥
शिशिराद्यास्त्रिभिस्तेस्तु विद्यादयनमृत्तरम् । आदानं च, तदादत्ते नृणां प्रतिदिनं बलम् ॥ २ ॥
छः ऋतुषु— माघ आदि दो-दो महिनों से क्रमशः छः ऋतुएँ होती हैं। यथा— १. माघ-फाल्गुनः शिशिर ऋतु, २. चैत्र-वैशाख : वसन्त ऋतु, ३. ज्येष्ठ-आषाढ़ : ग्रीष्म ऋतु, ४. श्रावण-भाद्रपद : वर्षा ऋतु, ५. आश्विन-कार्तिक : शरद ऋतु और ६. मार्गशीर्ष-पौष : हेमन्त ऋतु।
उत्तरायण तथा आदानकाल— शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म नामक तीन ऋतुओं में होने वाले छः मासों का नाम 'उत्तरायण' है; इसी का दूसरा नाम है—'आदानकाल'। क्योंकि इन दिनों में यह काल अपनी प्रकृति से प्रतिदिन प्राणियों के बल को लेता रहता है अर्थात् उनके बल का अपहरण करता रहता है ॥ १-२ ॥
वक्तव्य— तन्त्रकारों की व्याख्यान-सरणियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, तथापि निष्कर्ष प्रायः समान होते हैं। यहाँ छः ऋतुओं तथा उत्तरायण की चर्या की गयी है। यह भारत वर्ष 'भार्यवान्' देश है, यह ऋतु आदि की विविधता यहाँ के निवासियों का ही सौभाग्य है, अन्यत्र ऐसा नहीं है। इसके लिए आप विश्व के भूगोल का अध्ययन करें, अस्तु।
सम्पूर्ण वर्ष में १२ मास, ६ ऋतुएँ और २ अयन होते हैं। यह कालविभाग सौरमासों के अनुसार कहा गया है। ज्योतिष के अनुसार वर्षभर में चान्द्रमासों की भी सत्ता स्वीकार की गयी है। तदनुसार प्रति तीसरे वर्ष १ मास बढ़ जाता है, क्योंकि चान्द्रमास २७ या २८ दिन का होता है, किन्तु ऋतु-विभाजन सौरमासों के अनुसार ही होता है। उक्त चान्द्रमास को समझने के लिए आप देखें—'तैश्चतुर्भिर्होरात्रिश्च, पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः। पक्षद्वयं मासः। स शुक्लान्तः'। (अ.सं.सू. ४।४) अर्थात् ४ पहर का दिन और ४ पहर की रात्रि होती है, जिसे मिलाकर १ दिन होता है। १५ दिनों का एक पक्ष होता है, यह कृष्ण तथा शुक्ल भेद से माना गया है। २ पक्षों का एक मास होता है, शुक्लपक्ष की 'पूर्णिमा' के दिन इस मास की पूर्ति होती है।
सूर्यसिद्धान्त के मध्याधिकार श्लोक १२-१३ के अनुसार मास (महीना) दो प्रकार का होता है— १. चान्द्र (ऐन्द्र) मास—इसकी गणना प्रतिपदा से अमावास्या तक १५ दिन का कृष्णपक्ष और पुनः प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन का शुक्लपक्ष, दोनों को मिलाकर एक मास। २. सौरमास—इसकी गणना मेष (वैशाख),
कृतुचर्याध्यायः ३ ]
सूत्रस्थानम्
४१
वृष ( ज्येष्ठ ) आदि राशियों के अनुसार होती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न राशियों पर सूर्य के संक्रमण को मेघसंक्रान्ति आदि कहते हैं।
सुश्रुत का दृष्टिकोण— ‘इह तु...’प्रावृद्धि’। (सु.सू. ६।१०) अर्थात् यहाँ वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृद् ये छः ऋतुएँ वात आदि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं। उक्त छः ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो-दो मासों को लेकर इस प्रकार मानी गयी हैं—१. वर्षा—भाद्रपद-आश्विन, २. शरद—कार्तिक-मार्गशीर्ष, ३. हेमन्त—पौष-माघ, ४. वसन्त—फाल्गुन-चैत्र, ५. ग्रीष्म—वैशाख-ज्येष्ठ तथा ६. प्रावृद्—आषाढ़-श्रावण। महर्षि सुश्रुत शल्यशास्त्र के आचार्य थे, अतएव उन्होंने वात, पित्त एवं कफ दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशम को दृष्टि में रखकर इस प्रकार ऋतुक्रम को व्यवस्थित किया है। कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता में ‘प्रावृद्’ नामक ऋतु को स्वीकार न करके अपने क्रम से ‘शिषिर’ ऋतु को माना है। देखें—च.सू. ६।४। फिर भी चरक ने संशोधन-चिकित्सा को ध्यान में रखकर ‘प्रावृद्’ ऋतु की सत्ता को स्वीकारा है। देखें—च.वि. ८।१२५।
मतभेद का समाधान— हमारे ये तन्त्रकार नीरजस्तम, आप्त, शिष्ट, विबुद्ध थे, अतएव इनके सिद्धान्त तीनों काल में मानने योग्य होते हैं, फिर भी जहाँ मतभेद होता है उसका कारण भी होता है। देखें—जिन देशों ( भूखण्डों ) में ठण्ड अधिक पड़ती है वहाँ हेमन्त तथा शिशिर नामक दो ऋतुएँ शीतकाल की होती हैं और जहाँ वर्षा अधिक होती है वहाँ प्रावृद् तथा वर्षा नाम की दो ऋतुएँ मानी जाती हैं। हमारे भारतवर्ष में हिमालय के कई भाग ऐसे भी हैं जहाँ वर्षभर सर्दी बनी रहती है। आसाम आदि कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा दक्षिण के कुछ देश ऐसे भी हैं जहाँ अधिक गर्मी पड़ती है; तथापि ऋतुओं का अपना प्रभाव उन-उन स्थानों पर भी अवश्य पड़ता ही है। इसी दृष्टि से प्राचीन महर्षियों ने भौगोलिक सर्वेक्षण कर अधिकाधिक प्रभावकारी भूभागों को उक्त विभाजन की सूक्ष्म दृष्टियों से देखा है, जो चिकित्सा की दृष्टि से उपादेय है।
सुश्रुत ने पहले ऋतुभेद से जिन वात आदि दोषों के चय, प्रकोप, प्रशम का वर्णन वर्षभर की अवधि में दिखलाया था, उसे दिन-रात के रूप में इस प्रकार कहा है—दिन के पूर्वार्ध में वसन्तऋतु ( कफप्रकोप ) के मध्याह्नकाल में, ग्रीष्मऋतु ( वातसंचय ) के अपराह्न में प्रावृद् ऋतु ( वातप्रकोप ) के प्रदोषकाल ( रात्रि के पूर्वभाग ) में वर्षाऋतु के ( पित्तसंचय ) के आधीरात में शरद ऋतु ( पित्तप्रकोप ) के, रात्रि के अन्तिम भाग ( उषःकाल ) में हेमन्तऋतु ( कफसंचय ) के लक्षण होते हैं। इस प्रकार दिन-रात में भी दोषों के संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है। देखें—सु.सू. ६।१४।
तस्मिन् ह्यत्यर्थतीक्ष्णोरुक्षा मार्गस्वभावतः। आदित्यपवनाः सौम्यान् क्षययन्ति गुणान् भुवः। तिक्तः कषायः कटुको बलिनोऽत्र रसाः क्रमात्। तस्मादादानमाशेयम्—
अग्निगुण-प्रधान आदानकाल— इस उत्तरायण काल में सूर्य के उत्तरमार्ग में चलने के कारण सूर की किरणें अत्यन्त तीक्ष्ण तथा उष्ण ( गरम ) हो जाती हैं। सूर्य की गरमी से तपी हुई हवाएँ भी उष्ण एवं रुक्षा हो जाती हैं अर्थात् लू चलने लगती है। अतएव ये दोनों ( सूर्य तथा हवा ) पुष्टी के सौम्य ( शीतल तथा गीलापन आदि ) गुणों को क्षीण ( नष्ट ) कर देते हैं। यही कारण है कि इन दिनों प्राणियों का भ्रंशारीरिक बल क्षीण हो जाता है। इस उत्तरायण काल में क्रमशः शिशिर ऋतु में तित्करस, वसन्त ऋतु में कषाय रस और ग्रीष्म ऋतु में कटुरस बलवान् ( शक्तिशाली ) हो जाते हैं। यही कारण है कि यह आदानकाल आशेय ( अग्निगुण प्रधान ) कहा गया है॥ ३॥
वक्तव्य— ‘आदित्यपवनाः’ अर्थात् सूर्य की उष्णता से युक्त इधर-उधर बहती हुई हवाएँ इस काल में अपनी भयंकरता से युक्त रहती हैं। वास्तव में हवा का स्वभाव ही ऐसा होता है कि गर्मी में वहाँ ‘लू’ का रूप धारण कर लेती है और जाड़ों में सर्दी का। इस सम्बन्ध में चरक ने कहा है—‘वायु को
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अष्टाङ्गहृदय
योगवाही कहा गया है—जैसा उसे संयोग मिलता है, वैसा उसका स्वभाव हो जाता है'। देखें—च.चि. ३१८। अग्निगुण-प्रधान आदानकाल का वर्णन चरक ने भी प्रायः इसी प्रकार किया है। देखें—च.सू. ६६।
—ऋतवो दक्षिणायनम् ॥ ४ ॥
वर्षादयो विसर्गश्च—
विसर्गकाल-दक्षिणायन—वर्षा, शरद् तथा हेमन्त नामक इन तीन ऋतुओं का नाम दक्षिणायन है, इसी का दूसरा नाम है 'विसर्ग काल'। क्योंकि 'विसुजति ददाति बलम् इति विसर्गः कालः' ॥ ४ ॥
—यद्वन्न विसुजत्ययम्। सौम्यत्वादत्र सोमो हि बलवान् हीयते रविः ॥ ५ ॥
मेघवृष्ट्यचनितैः शीतैः शान्ततापे महतीतले। स्निग्धाश्चैहाम्ललवणमधुरा बलिनो रसाः ॥ ६ ॥
विसर्गकाल-परिचय—यह काल सौम्य होने के कारण प्राणिमात्र को बल देता है। इस काल में सौम्यगुणों वाला सोम ( चन्द्रमा ) बलवान् रहता है और सूर्य का बल क्षीण हो जाता है। इस काल में मेघों ( बादलों ) के छाये रहने के कारण, वर्षा के होते रहने से इन दोनों के कारण शीतल हवा के बहने से भूतल का सन्ताप शान्त हो जाता है। अतः वर्षा ऋतु में स्निग्ध गुण वाला अम्ल रस, शरद् ऋतु में लवण रस तथा हेमन्त ऋतु में मधुररस बलवान् हो जाते हैं। फलतः इस विसर्गकाल ( दक्षिणायन ) में प्राणियों के देह तथा उनका बल बढ़ जाता है, अतएव इसे 'विसर्गकाल' कहते हैं ॥ ५-६ ॥
वक्तव्य—'वि + गुञ् + घञ् = विसर्गः' अर्थात् दान। यह काल प्राणियों को बल का विसर्जन करता है। चरक-सुश्रुत ने भी इस काल की प्रशंसा की है।
शीतैऽग्रघं वृष्टिघमैऽल्पं बलं मध्यं तु शेषयोः।
बल का चयापचय—शीत ऋतुओं ( हेमन्त तथा शिशिर ) में प्राणियों में बल की स्थिति उत्तम रहती है, शेष दो शरद् तथा वसन्त ऋतुओं में शारीरिक बल की स्थिति मध्यम कोटि की तथा वर्षा और ग्रीष्म ऋतुओं में बल की मात्रा अति अल्प हो जाती है।
वक्तव्य—विसर्गकाल में क्रमशः बढ़ा हुआ शारीरिक बल आदानकाल में क्रमशः उस प्रकार घटता जाता है, जैसे शुक्लपक्ष में क्रमशः बढ़ा हुआ चन्द्रमा कृष्णपक्ष में क्रमशः घटता जाता है। अतएव शारीरिक बल के ह्रास-वृद्धि क्रम को हीन, मध्य, उत्तम भेद से तीन भागों में विभाजित किया गया है।
बलिनः शीतसंरोधाद्वेमन्ते प्रबलोऽनन्तः ॥ ७ ॥
भवत्यल्पेन्दनो धातून् स पचेद्वायुनेरितः। अतो हि मेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्गम्ललवणात्रसान् ॥ ८ ॥
हेमन्तऋतुचर्या—हेमन्त ऋतु में कालस्वभाव के कारण पुरुष अधिक बलवान् रहता है। क्योंकि शीत के कारण भीतर रुका होने के कारण ( अर्थात् रोमकूपों के शीत से अवरुद्ध होने के कारण ) जठराग्नि ( पाचकाग्नि ) अधिक बलवान् हो जाती है। यदि उसे आहार रूपी ईधन ( जिसे वह जठराग्नि पका या जला सके। ) कम मिल पाता है, तो वह अग्नि वायु द्वारा प्रेरित होकर ( मुलगकर ) रस आदि शरीरस्थ धातुओं को पचाने लगता है। इसलिए हेमन्त ऋतु में वातनाशक मधुर, अम्ल तथा लवण रसयुक्त पदार्थों का पर्याप्त सेवन करना चाहिए ॥ ७-८ ॥
वक्तव्य—यह हेमन्तऋतुचर्या है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि गर्मी में गर्मी नहीं पड़ती, वर्षा ऋतु में वर्षा नहीं होती और सर्दियों में जाड़ा नहीं पड़ता; इसे ऋतुविपर्यय कहते हैं। ये लक्षण शनि आदि ग्रहों के अतिचार से भी देखे जाते हैं। आजकल राकेट आदि अन्तरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं, इनके प्रकोप से भी ये परिवर्तन दिखलायी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में कुशल चिकित्सक देश-काल की सामयिक स्थिति के अनुसार ऋतुचर्या का निर्देश करे।