अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य —प्रायः देखा गया है कि जो बहुत दिनों तक व्यायाम करते रहे, बाद में जिन्होंने एकाएक व्यायाम करना छोड़ दिया, उन्हें वृद्धावस्था में आमवात, ऊहस्तम्भ, अर्शरोग ( बवासीर ) अथवा अण्डवृद्धि ( पोता का बढ़ जाना ) आदि रोग हो जाते हैं।
व्यायामजागराध्वस्तीहास्यभाष्यादि साहसम् । गजं सिंहं इवाकर्पन् भजन्नति विनश्यति ॥ १४ ॥
व्यायाम आदि का निषेध —व्यायाम, जागरण, मार्गगमन, मैथुन, हैसना, बोलना ( जोर-जोर से चिल्लाना ) तथा साहसिक कार्य का अधिक सेवन करने से शक्ति युक्त मनुष्य का भी उस प्रकार विनाश हो जाता है जैसे सिंह अपने द्वारा मारे हुए हाथी को खींचकर ले जाने का दुःसाहस करता है, तो वह स्वयं मर जाता है ॥ १४ ॥
वक्तव्य —व्यायाम आदि का युक्तियुक्त सेवन सुखद होता है, किन्तु इनका अधिक सेवन न करे, यही ग्रन्थकार का अभिप्राय है। इसीलिए शक्तिमान् सिंह भी यदि अपने द्वारा मारे गये हाथी को खींचकर ले जाना चाहेगा तो वह भी मर जायेगा। यह एक दुःसाहस का उदाहरण है। जागरण ( रात में अधिक जागना ), अधिक मार्ग चलना, जो कभी नहीं चलता उसके लिए थोड़ा चलना भी बहुत है, इस प्रकार विचार कर लें। ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं। दुःसाहस का अधिक प्रयोग करने से उरःक्षत हो जाता है।
अधिक व्यायाम करने से 'क्षय' हो जाता है, यह ऊपर कहा गया है। तन्त्रकार की एक अपनी शैली होती है, वह है—सूत्र तथा व्याख्यान शैली। क्षय या राज्यक्षमा के सम्बन्ध में महर्षि पुनर्वसु के उद्गार—'राज्यक्षमा रोगसमूहानाम्' तथा 'अयथाबलमारम्भः प्राणोपरोधिनाम्' । ( च.सू. २५।४० ) उक्त १४ वें श्लोक का आधार है—'व्यायाम'... 'मात्रया' ( च.सू. ७।३४ )।
उद्भूतं कफहरं मेदसः प्रविलायनम् । स्थिरीकरणमङ्गानां त्वचप्रसादकरं परम् ॥ १५ ॥
उबटन के गुण —व्यायाम के बाद उबटन करना चाहिए, इससे कफ का नाश होता है। यह मेदोघातु को पिघला कर उसे मुखा देता है, अंगों को स्थिर ( मजबूत ) करता है और त्वचा को कान्तियुक्त करता है ॥ १५ ॥
वक्तव्य —जो या चना का आटा अथवा सरसों को पीसकर उसमें तेल तथा हल्दी मिलाकर शरीर पर मसलने को उद्भूतन, उत्सादन या उबटन कहा जाता है। इस विधि से रोमकूपों में जमी हुई मैल भलीभाँति निकल जाती है। इससे त्वचा चिकनी तथा कोमल हो जाती है। इसका प्रयोग छोटे बच्चों के शरीर पर भी किया जाता है। इसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए। परन्तु इस वैज्ञानिक युग में ये सात्विक सुख कहीं सुलभ है ?
दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमूर्जाबलप्रदम् । कण्डूमलश्रमस्वेदतन्नातुइदाहपाभजित् ॥ १६ ॥
स्नान के गुण —स्नान करने से जठराग्नि प्रदीप्त होता है, यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ) है, आयु को बढ़ाता है, उत्साहशक्ति तथा बल को बढ़ाता है; कण्डू ( खुजली ), मल ( त्वचा का मैल ), थकावट, पसीना, ऊँचाई, प्यास, दाह ( जलन ) तथा पाप ( रोग ) का नाश करता है ॥ १६ ॥
वक्तव्य —स्नान करने से ऊपर जिन लाभों का वर्णन किया है, उनका यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है। स्नान वृष्य है, देखें—अ.हू.उ. ४०।३५। स्नान कर लेने से मन प्रसन्न होता है, अतः यह वृष्य है।
उष्णाम्बुनाऽधःकायस्य परिषेको बलावहः । तेनैव तूतमाङ्गुस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥ १७ ॥
उष्ण-शीत जलप्रयोग —उष्ण ( गरम ) जल से अधःकाय ( गरदन से नीचे के शरीर ) का परिषेक ( स्नान ) बल को बढ़ाता है। यदि उसी ( गरम जल ) से सिर को घोया जाय अर्थात् गरम पानी से शिरःस्नान किया जाय तो इससे बालों तथा आँखों की शक्ति घटती है ॥ १७ ॥