अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
३३
स्नानमर्दितनेत्रास्यकर्णरोगातिसारिषु। आध्यानपीनसाजोर्णभुक्तवत्सु च गृहितम्॥१८॥
स्नान का निवेश— अर्दित ( मुखप्रदेश का लकवा ), नेत्ररोग, मुखरोग, कर्णरोग, अतिसार, आध्यान ( अफरा ), पीनस, अजीर्ण रोगों में तथा भोजन करने के तत्काल बाद स्नान करना हानिकारक होता है॥१८॥
वक्तव्य— स्नान करने के बाद बालों को मुँह अंगोछा से पोछकर उनमें तेल लगाकर कंघी कर लें और स्वच्छ वस्त्रों को धारण करें। दिनचर्या के अनेक कृत्यों का उल्लेख इसमें नहीं हो पाया है, उन्हें आप चरक-सुश्रुत से संग्रह कर लें। अ.सं.अ. ३ में दिनचर्या से सम्बन्धित अन्य अनेक विषय दिये गये हैं, आप उन्हें भी देखें।
जोर्णं हितं मितं चाद्यान्न वेगनीरयेद्वलात्। न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्नजित्वा साध्यमामयम्॥
भोजन आदि कर्तव्य— स्नान कर लेने के बाद तथा पहले किये हुए भोजन के पच जाने के पश्चात् जो हितकर भोजन हो उसे मात्रा के अनुसार खाये; मूत्र, पुरीष के वेगों को बलपूर्वक न उभाईं। यदि मल-मूत्र का वेग मालूम पड़े तो उन्हें दबाकर अन्य कर्मों में न लग जाय। साथ ही यदि किसी प्रकार का साध्यरोग हो तो उसकी चिकित्सा किये बिना भी किसी दूसरे कार्य में नहीं लग जाना चाहिए॥१९॥
वक्तव्य— स्मृतियों में कथित दिनचर्या से आयुर्वेदीय दिनचर्या सर्वथा भिन्न है और होनी भी चाहिए, क्योंकि दोनों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। स्मृतिनिर्दिष्ट चर्या मनु. ४।१२-१३ में आप ही देखिए—कहाँ स्नान के बाद सन्ध्या और कहीं सीधे भोजन, वह भी जब पहले का पच गया हो। हितं मितं— हितकारक वह भोजन है जिसमें धारण तथा पोषण करने की शक्ति हो। देखें—'डुधाद्धारपोषणयोः' धातु से त्त प्रत्यय जोड़कर बना हुआ शब्द—धा + त्त + हित। इसके बाद ऋतु, देश, काल का विचार करके जो साल्प्य हो, उसे हित कहते हैं। मितं—नपा-तुला, परिमित या थोड़ा। 'न वेगितोऽन्यकार्यः स्यात्—'इस विषय का विशेष व्याख्यान आप चरकसंहिता सू.अ. ७ में विस्तारपूर्वक देखें। अथवा अ.हृ.सू. अध्याय ४ का अवलोकन करें। 'नजित्वा साध्यमामयम्—'यह वाग्भट का उपदेश विशेष करके आशुकारी रोगों के लिए है। अन्यथा प्रमेह तथा अर्श ( बवासार ) आदि अनेक रोग ऐसे हैं, जिनमें रोगी चिकित्सा के साथ अन्य कार्यों को भी करता ही रहता है। यदि साध्य एवं आशुकारी रोगों की उपेक्षा कर रोगी अन्य कार्य करने लगता है, तो वह रोग असाध्य हो सकता है। भोजनविधि का वर्णन अ.सं.सू. ३।७६-८० तक को भी देख लें। यह भोजनविधि का आर्य स्वरूप है।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः। सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत्॥२०॥
सुख का साधन धर्म— सभी प्राणी चाहते हैं कि हमें सुख मिले, अतएव उनकी प्रवृत्तियाँ ( कार्य करने की लगन ) सुख पाने के लिए होती है और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं होती। अतः सभी को धर्म-कार्य करने में तत्पर रहना चाहिए॥२०॥
वक्तव्य— धर्म शब्द को लेकर धार्मिक नेताओं तथा राजनीतिक नेताओं ने बड़ा हंगामा चलाया है, अस्तु। वास्तव में प्राणिमात्र का यह धर्म है कि वह अपनी तथा अपने उपकारक पदार्थों की रक्षा करे। इसमें किसी को किसी प्रकार का मतभेद नहीं है। इसी प्रकार की व्युत्पत्ति हमारे शास्त्रचिन्तकों ने धर्म शब्द की की है। देखें—'प्रियते लोकः अनेन इति धर्मः' अथवा 'धरति लोकम् असौ इति धर्मः'। आज वास्तविक धर्म का आचरण न करने के कारण देश में जो दुर्बलथा फैली है, इसको कोई नहीं देख रहा है। मनु आदि धर्माचार्यों ने धर्म का आचरण करने की सभी को आज्ञा दी है तथा सभी के अलग-अलग धर्मों का उपदेश दिया है। संक्षेप में इन स्थलों का अवलोकन करें। मनु. २।१२, २।११२. ४।२३८, २४१, २४२; ६।९२, ८।१५ तथा १७। उक्त उद्धरणों के अतिरिक्त महामानव मनु ने 'धर्म' शब्द की एक परिभाषा और भी दी है—'सत्तेर्केणाऽनुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतः'। ( मनुः १।२।०६ ) अर्थात् जो तर्कबुद्धि से अनुसन्धान ( विचार ) करता है, वही धर्म को समझता है, यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है—'अतर्क्यं वै
३ अ० हू०