अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
धर्मः' अर्थात् धर्म के विषय में तर्क न करे। क्योंकि शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं— १. प्रभुसम्मित, २. मुहूर्तसम्मित तथा ३. कान्तासम्मित। ये वेद आदि धर्मशास्त्र 'प्रभुसम्मित शास्त्र' के अन्तर्गत आते हैं, अतः ये अतर्क्य हैं; राजशासन के समान कठोर होते हैं।
सारांशः —जो सत्कर्म अपनी तथा दूसरों को धारण करता है, उसका नाम 'धर्म' है। उसी को कोषकारों ने पुण्य, श्रेयस्, मुक्त तथा वृष पर्यायों से कहा है। शुभ कर्म को 'धर्म' और अशुभ कर्म को 'अधर्म' या पाप कहा है। ऐसे कर्म या कर्मों से स्वास्थ्य-लाभ होता है और मनःसन्तोष प्राप्त होता है। यही कारण है कि आयुर्वेद में विधि-निषेधक्रम से धर्म की शिक्षा दी जाती है। आयुर्वेद में कहा गया सम्पूर्ण सद्बुत धर्म का आकर है। इसी को सदाचार कहा गया है और सत् आचार को ही चरक ने 'आचाररसायन' कहा है। अन्य आयुर्वेदीय रसायन व्ययसाध्य हैं, किन्तु 'आचाररसायन' संयमसाध्य है।
भक्त्या कल्याणमित्राणि सेवेतेतरदूरगः।
मित्र-अमित्र सेवन-विचार —अच्छे मित्रों ( शुभचिन्तक, अच्छी सलाह देने वालों ) का श्रद्धा-भक्ति से सेवन करे। इनसे विपरीत चरित्र वालों से दूर रहे अर्थात् सावधान रहे, क्योंकि इनका सेवन करने से हानि हो सकती है।
हिंसास्तेयात्यथाकामं पैशुन्यं परुषानुते ॥ २१ ॥
सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्निपर्ययम्। पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैत्यजेत् ॥ २२ ॥
पापकर्मों का त्याग —नीचे लिखे गये दस प्रकार के पापकर्मों का मन, वचन तथा कर्म से सदैव परित्याग करे— १. हिंसा ( मार-पीट या किसी के मन को दुःखाना आदि ), २. स्तेय ( चोरी, लूट ), ३. अन्ध्याकाम ( अनुचित हंग से सुखभोग करना; जैसे—अगम्यागमन आदि )—इन शारीरिक दुष्कर्मों का शरीर से परित्याग करे। ४. पिशुनता ( ज़ुगुलखोरी ), ५. परुषवाक्य ( कठोर या अप्रियवचन ), ६. अनूत ( झूठी बात ) तथा ७. सम्भिन्न आलाप ( कभी कुछ और कभी कुछ कहना, जिसे दोगलापन कहते हैं )—वाणी सम्बन्धी इन पापकर्मों का वाणी द्वारा परित्याग करे अर्थात् ऐसी बातें न कहे। ८. व्यापाद ( किसी को मार डालने या मरवा डालने की योजना ), ९. अभिध्या ( दूसरे की सम्पत्ति को हड़प जाने की इच्छा करना ) तथा १०. दृग्निपर्यय ( शास्त्र के निर्देशों के विपरीत सोचना, नास्तिकता, आप्त वाक्यों के विरुद्ध सोचना आदि )—इन मानसिक पापों का मन से परित्याग करे ॥ २१-२२ ॥
अवृत्तिव्याधिशोकार्तननुवर्तते शक्तिः।
अनुकूल व्यवहार-निर्देश —जिनकी कोई आजीविका नहीं है, जो रोग तथा शोक से पीड़ित हैं, उनके साथ अपनी शारीरिक तथा आर्थिक शक्ति के अनुरूप उचित व्यवहार करे अर्थात् आजीविकाहीनों को आर्थिक सहायता, रोगियों को चिकित्सा आदि की सहायता तथा शोकपीड़ितों को उचित आश्वासन देकर उनके अनुकूल व्यवहार करे।
आत्मवत्सलं पश्येदपि कीटपिपौलिकम् ॥ २३ ॥
समदृष्टि का निर्देश —सभी प्राणियों को अपने समान समझें, भले ही कीड़े-मकोड़े, चींटियाँ ही क्यों न हों अर्थात् किसी को क्षुद्र ( छोटा या नीच ) न समझें। उन्हें कष्ट न पहुँचायें, उन पर दया करें ॥ २३ ॥
अर्चयेहेवगोविप्रवृद्धवैद्यनृपातिथीन् ।
सम्मान करने का निर्देश —देवता, गाय, ब्राह्मण, वृद्ध, वैद्य, नृप तथा अतिथि—इनकी पूजा करे अर्थात् इन्हें उचित सम्मान दें तथा इनका सत्कार करे।
वक्तव्य —यहाँ वृद्ध शब्द से माता-पिता तथा गुरुजनों का समावेश भी कर लेना चाहिए।
विमुखात्रार्थिनः कुर्यान्नावमन्येत नाक्षिपेत् ॥ २४ ॥