भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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दितन्त्राध्यायः २ ]

सूत्रस्थानम्

३५

याचकों की सम्मान-विधि—अर्थियों ( याचकों ) को अपनी शक्ति के अनुसार कुछ देना चाहिए। उन्हें निराश नहीं लौटाना चाहिए, उनका अपमान न करे और न उन्हें झिड़कना ही चाहिए॥ २४॥

उपकारप्रधानः स्यादपकारपरैऽप्यहो ।

उपकार का निर्देश—सदा सबका उपकार करना चाहिए, भले ही अपकार करने के लिए तैयार शत्रु ही सामने क्यों न हो, उसके प्रति भी उपकार करना चाहिए।

वक्तव्य—सामान्य दृष्टिकोण है कि शत्रु के साथ अपकार ही करना चाहिए, किन्तु यहाँ तन्त्रकार का कथन उसके विपरीत है। उसका समर्थन इस प्रकार किया जा रहा है—जैसे वात आदि दोष रोगकारक होते हैं और जब वे सम अवस्था में होते हैं तो वे 'शरीरधारणात् धातवः' कहे जाते हैं, अतएव वे दोष भी हितकारक कहे जाते हैं।

सम्पद्विपत्स्वेकमना, हेतावीर्घ्यस्फले न तु॥ २५॥

समभाव का निर्देश—सम्पत्ति ( सुख ) में तथा विपत्ति ( दुःख ) में समान भाव से रहे। किम कारण से सम्पत्ति मिली है और किस कारण से विपत्ति मिली है, इसका पता करे। जिस कारण से विपत्ति मिली है उस कारण से द्वेष करना चाहिए, न कि विपत्ति से द्वेष करे॥ २५॥

वक्तव्य—यह सम्पत्ति एवं विपत्ति अपने-पराये सब पर आती है। दूसरे की सम्पत्ति को देखकर जलना नहीं चाहिए और दूसरे की विपत्ति को देखकर प्रसन्न नहीं होना चाहिए; अपितु यदि आप सम्पन्न होना चाहते हैं, तो उस कारण का पता लगाइए और वैसा प्रयत्न कीजिए, जिससे आप भी सम्पन्न हो सकें, जलते रहने से कोई लाभ नहीं होता।

काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम्।

मधुरभाषण-निर्देश—समय पर बोलें, हितकर बात कहें, थोड़ा ( युक्तियुक्त ) बोलें, ऐसी बात कहें जो अविस्वादि ( जिसका कोई विरोध न करे अर्थात् सत्य ) हो तथा पेशल ( मौठा वचन ) कहें।

पूर्वाभिभाषी, सुमुखः सुशीलः कर्णामृदुः॥ २६॥

नैकः सुखी, न सर्वत्र विश्रब्धो, न च शङ्कितः।

भाषण-विधि—पहले बोलें ( यह प्रतीक्षा न करे कि जब वह बोलेगा तब मैं बोलेगा ) अर्थात् मित्र के मिलते ही उसके बोलने से पहले मैं बोलेगा, यह भाव मन में होना चाहिए और कुशल प्रश्न करने लगे। प्रसन्नचित्त, सभ्य व्यवहार करने वाला, दयालु, सरल स्वाभाव वाला, अकेला सुखी न रहे अर्थात् अपने बन्धु-बान्धव-इष्टमित्रों सहित सुखों का उपभोग करे। सबके साथ विश्वास न करे और सबके साथ अविश्वास भी न करे॥ २६॥

न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्विपुम्॥ २७॥

प्रकाशयेत्तापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः।

विचारों को गुप्त रखें—न अपने को किसी का शत्रु और न दूसरे को अपना शत्रु बतलाये। किसी ने अपना अपमान किया हो, उसका तथा अपने स्वामी, राजा आदि की अपने प्रति स्नेहहीनता का ही वर्णन किसी से न करे॥ २७॥

जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति॥ २८॥

तं तथैवानुवर्तत परराधनपण्डितः।

परच्छन्दानुवर्तन—दूसरे के मन का अभिप्राय समझकर जो व्यक्ति जिस प्रकार सन्तुष्ट होता हो, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, उसे 'परराधनपण्डित' कहते हैं॥ २८॥