अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—पञ्चतन्त्र में इसी आशय का एक पद्य इस प्रकार आया है—‘लुब्धमर्थेन गृहीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्ख छन्दानुरोधेन यथार्थत्वेन पण्डितः॥’ (सूक्ति) अर्थात् लोभी को पैसा देकर, क्रोधी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को जैसा वह कहता है वैसा ही मानकर और यथार्थ बात को कहकर पण्डित को प्रसन्न करना चाहिए। यह लोकव्यवहार है।
न पीडयेदित्तिद्याणि न चैतान्यति लालयेत्॥ २९॥
इन्द्रिय-व्यवहारविधि—आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को रूप, शब्द आदि अपने-अपने विषयों का उपभोग करने से न रोके, परन्तु उन-उन विषयों में उन्हें अत्यन्त लोलुप्य भी न होने दें॥ २९॥
त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत् च विरोधयत्।
त्रिवर्ग-विरोध का निषेध—ऐसा कोई कार्य न करे जिससे त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) की प्राप्ति न हो अथवा त्रिवर्ग का विरोध होता हो।
अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमास्म॥ ३०॥
सभी धर्मों का आचरण—सभी प्रकार के धर्मों में मध्यम मार्ग से चले, किसी धर्म का घोर समर्थक या घोर विरोधी न बने। यहाँ धर्म शब्द में आयुर्वेदोक्त सदाचार मार्ग में मध्यममार्ग पर चले॥ ३०॥
नीचरोमनखश्चर्मुर्निर्मलाङ्घ्रिमलायनः। स्नानशीलः सुसूरभिः सुवेण्डुन्तुलणोज्ज्वलः॥ ३१॥
शरीरशुद्धि के प्रकार—रोम (लौम), नख तथा श्मश्रु (दाढ़ी-मोछ) इन्हें अधिक न बढ़ाये, इन्हें काटते या कटवाते रहें। पैरों को स्वच्छ रखें, गुद आदि मलमार्गों को भी साफ रखना चाहिए। प्रतिदिन स्नान करें, सुगन्धित पदार्थों (इत्र आदि) का सेवन करें, सुन्दर वस्त्र धारण करें, उद्भूत वेश न बनाये अर्थात् सम्भ्य पुरुषों के आचरणों का अनुकरण करें॥ ३१॥
धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः।
रत्न आदि का धारण—रत्न, सिद्ध मन्त्र तथा औषधद्रव्यों को धारण करना चाहिए।
बक्तव्य—रत्न—हीरा, माणिक्य, पुखराज, नीलम आदि। सिद्धमन्त्र—बला, अतिबला, अपराजिता आदि। महौषधि—सहदेवी आदि। इनको वैद्य तथा दैवज्ञ आदि के निर्देशानुसार बाँह तथा गला आदि में धारण करना चाहिए।
सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदुकु॥ ३२॥
छाता आदि धारण—छाता लगाकर चले, जूता पहन कर चले तथा चार हाथ आगे तक के मार्ग को देखते हुए चले॥ ३२॥
निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान्।
दण्ड आदि धारण—रात में यदि कोई आवश्यक कार्य आ जाय तो हाथ में लाठी लेकर चले, सिर में पगड़ी बाँध लें या टोपी पहन लें और किसी को साथ में सहायता के लिए ले लें।
बक्तव्य—ऐसे उपदेश या तो शास्त्र देते हैं अथवा माता-पिता, शुभचिन्तक। पञ्चतन्त्र में भी एक ऐसी कथा आयी है; यथा—‘अपि का पुरुषो मार्गं द्वितीयः क्षेमकारकः’। अर्थात् कैसा भी आदमी हो उसे साथ ले लेना चाहिए, वह कल्याण करता ही है।
चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ ३३॥
नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवो न च।
गमन-निर्देश—चैत्य (देवता का स्थान, बौद्ध या जैन मन्दिर, समाधि) पर न चढ़े, ध्वजा के डण्डा पर न चढ़े, निन्दित कर्म करने वाले पुरुष की छाया का स्पर्श भी न करे, भस्म (राख) तथा तुष (भूसी) के ढेर पर और अपवित्र स्थान पर न चढ़े और बालू एवं ठेले के ढेर पर चढ़कर न चले॥ ३३॥