भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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दिनचर्याध्यायः २ ]

सूत्रस्थानम्

३७

नदीं तरेन्न बाहुभ्यां, नाधिरुक्तधमभिन्नजेत् ॥ ३४ ॥ सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेदुष्प्यानवत् ।

निषिद्ध कार्य—वेगवाली नदी या घहराती हुई नदी को बाँहों से तैरकर पार न करे। अधिरुक्तध (आग के ढेर अथवा ज्वालामुखी) के समीप न जावे। दूषित सवारी पर जैसे कोई नहीं चढ़ता उसी प्रकार सन्दिग्ध नौका (जिसके डूब जाने का भय हो) उसमें न चढ़े और जिस वृक्ष का टूट कर गिर जाने का सन्देह हो उस पर भी न चढ़े ॥ ३४ ॥

नासंतवृतमुखः कुर्यात्सुतिहास्यविजुम्भणम् ॥ ३५ ॥

छीक आदि करने की विधि—मुख को ढके बिना न छीके, न हँसे और न जँभाई ले (यह शिष्टाचार है) ॥ ३५ ॥

नासिकां न विकुण्णीयात्राकस्माद्विलिखेद्वुवम् । नाङ्गैश्चेष्टेत विगुणं, नासीतोक्तटकश्चिरम् ॥

आंगिक चेष्टाओं का निषेध—अकारण नासिका के छिद्रों को अँगुली से न खोदे। अकारण भूमि को अँगुलियों से न खोदे (यह लक्षण विषदाता का कहा गया है)। टोंगों, बाँहों आदि से विकृत चेष्टाएँ न करें; जैसे—मुख बिचकाना, आँखें मटकाना आदि तथा उल्टक आसन से पाँवों के बल न बैठे ॥ ३६ ॥

बक्तव्य—सुश्रुत ने भी इस प्रकार के भावों का निषेध किया है। देखें—सु.चि. २४।९५।

देहवाक्येतसां चेष्टाः प्राक् श्रमाद्विनिवर्तयेत् । नोर्थ्वजानुश्चिरं तिष्ठेत्—

शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा—शरीर, मन तथा वाणी की चेष्टाओं (इनके कार्यों) को थकान होने से पहले ही रोक देना चाहिए (इस विषय को वाग्भट ने सद्वृत्त में दिया है, चरक ने इसे व्यायाम के लक्षणों में कहा है) और चिरकाल तक जाँचों को ऊपर की ओर उठाकर लेटा न रहे।

—नक्तं सेवेत न द्रुमम् ॥ ३७ ॥

तथा चत्वरचैत्यान्तश्चतुष्पथसुरालयान् । सूनाट्वीशून्यगृहशमशानानि दिवाऽपि न ॥ ३८ ॥

अन्य सदाचार—रात्रि में वृक्ष के नीचे न रहे तथा चत्वर (तिमुहानी), चैत्य के समीप या भीतर, चतुष्पथ (चौराहा या चौमुहानी) पर, देवमन्दिर या मद्यशाला में, सूना (कसाईघर अथवा फाँसी देने के) स्थान पर, घोर वन में, सुनसान घर में तथा शमशान में दिन में भी न रहे ॥ ३७-३८ ॥

बक्तव्य—'रात में पेड़ के नीचे न रहे'—इस वाक्य के समर्थन में श्री अरुणदत्त कहते हैं—'उस वृक्ष के आश्रय में रहने वाले कीड़ों के मल-मूत्र गिरने से रक्षा होगी। आज का विज्ञान कहता है कि रात्रि में वृक्ष 'कार्बन-डाई-आक्साइड' गैस को छोड़ते हैं, अतः उनसे दूर रहना चाहिए। क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

उक्त ३८वें श्लोक में 'चत्वर' तथा 'चतुष्पथ' दो एकार्थवाचक शब्दों का समावेश हुआ है, अतः इसकी संगति बैठाने के लिए विद्वान् टीकाकारों ने 'चत्वर' का अर्थ 'तिमुहानी' किया है। उसका आधार यह है—'चत्वरं स्यात् पथां श्लेषं' इति हैमः। अर्थात् मार्गों का संगम एकाधिक का हो ही सकता है। फिर भी हमारे विचार से यहाँ 'चत्वर' का अर्थ—स्थण्डिल या आँगन तिमुहानी से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। इसी तथ्य को श्री अरुणदत्त ने भी स्वीकार करते हुए कहा है—'अन्ये ल्वाहूः—यत्र प्रदेशे नगरनिवासिनो ग्राम्या वा समेत्य नानाविधाः कथाः कुर्वन्ति, स चत्वर उच्यते'। सुरालयान्—'सुर + आलयान्' = देवगृह या मन्दिर। 'सुरा + आलयान्' = मद्यशाला या मधुशाला। ये दो अर्थ उक्त विग्रहों के आधार पर किये गये हैं।

सर्वथेश्वेत नादित्यं, न भारं शिरसा वहेत् । नेश्वेत प्रततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च ॥ ३९ ॥