भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

अन्य सदाचार—सूर्य को एकटक होकर देखता न रहे, सिर पर बोझ रखकर न ले जाये; मूधम, बमकीले, अपवित्र तथा अप्रिय पदार्थों को लगातार देखना न रहे ॥ ३९ ॥

वक्तव्य—सूर्य को कब न देखे, इस सम्बन्ध में मनुस्मृति का वचन देखें—'उदय तथा अस्त होते हुए, ग्रहणकाल में, जल में प्रतिबिम्बित, आकाश के मध्य में स्थित सूर्य को न देखें। ( मनु. ४३७ )

मद्यविक्रयसन्धानदानानानि नाचरेत्।

मद्य-विक्रय आदि का निषेध—मद्य का विक्रय न करे, मद्य का सन्धान ( निर्माण ) भी न करे और उसका लेन-देन ( व्यापार ) भी न करे तथा उसे पीना भी नहीं चाहिए; केवल 'औषधार्थे सुरां भिबेत्'।

पुरोवातातपरजस्तुधारपरुषानिलान् ॥४०॥

अनुजः क्षवयुद्धारकासस्वप्नास्रमैयुनम्। कूलच्छायां नृपदिष्टं व्यालदंष्ट्रिविपाणिनः ॥४१॥

हीनानार्थातिनिपुणसेवां विग्रहमुत्तमैः। सन्ध्यास्वभ्यवहारस्त्रीस्वप्नाध्ययनचिन्तनम् ॥४२॥

शत्रुसत्रगणार्कीर्णगणिकापणिकाशनम्। गात्रवक्त्रनखैर्वाद्यं हस्तकेशावधूतनम् ॥४३॥

तोयाग्निपूज्यमध्येन यानं धूमं शवाश्रयम्। मद्यातिसर्कितं विश्वम्भस्वातन्त्र्ये स्त्रीषु च त्यजेत् ॥

अन्य निषिद्ध कर्म—पूर्व दिशा की ओर से बहने वाली वायु का, सामने से आने वाली वायु का, क्षुप का, घुल्लि का, तुषार ( ओस तथा बर्फ ) का तथा झोंके से चलने वाली वायु ( आँधी ) का सेवन न करे। जब शरीर की स्थिति सीधी न हो ऐसी अवस्था में न झोंके, न डकार ले, न खाँसे, न सोये, न खाना खाये और न मैयुन करे। कूल ( नदी का किनारा ) की छाया में न बैठे, राजा के शत्रु का साथ न करे। सर्प से, दीतों से काटने वाले कुत्ता आदि प्राणियों से दूर रहे। सींग से मारने वाले साँड़, भैंसा आदि प्राणियों से सदा दूर रहे। नीच, अनार्य ( अधम या कमौना ), अतिनिपुण ( दुष्ट, शैतान ) व्यक्तियों की सेवा ( नौकरी ) न करे। उत्तम ( अपने से बलवान् अथवा सदाचार युक्त ) पुरुषों से झगड़ा ( वैर ) न करे।

सन्ध्याकाल में भोजन, स्त्रीसहवास, सोना, अध्ययन आदि किसी विषय का विचार न करे। यह समय भगवद्भजन करने का होता है। शत्रु का, यज्ञ का, गण ( समुदाय या समाज ) का, आर्कीर्ण ( इधर-उधर बिखरा हुआ ), गणिक ( वेश्याओं ) का तथा पणिक ( दुकान, होटल आदि ) का भोजन न करे। ( ब.सू. ८।२० के अनुसार आर्कीर्ण का अर्थ—बहुजनार्कीर्ण है।) गात्र ( काँख, ताली आदि ) से, मुख से तथा नाखूनों से बाजा बजाने की नकल न करें। हाथों को हिलाना एवं बालों का अवधूतन ( कम्पन ) न करे। ( प्रायः हाथों तथा केशों का कम्पन यह लक्षण उन्मादरोगियों में देखा जाता है। चेतन अवस्था में ये कृत्य शिष्टाचार के विरुद्ध हैं। )

जल, अग्नि तथा पूज्यजनों के बीच में से होकर इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। ( इस विषय को चाणक्य ने इस प्रकार कहा है—'विप्रयोर्विप्रवहद्योश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः। अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य तृषभस्य च' ॥—चाणक्यनीति ) श्मशान में चिता के धुँआ से दूर रहे, मद्य ( मादक पदार्थों के सेवन ) का अभ्यासी न बने। स्त्रियों का विश्वास न करे और इन्हें स्वतन्त्रता प्रदान न करे, क्योंकि 'प्रायः साहसिकाः स्त्रियः' ॥ ४०-४४ ॥

वक्तव्य—ऊपर कहा गया सद्वृत्त सत्पुरुषों तथा कुलांगनाओं के आचरण का लेखा-जोखा है। प्रतिदिन के आचरण में उक्त उपदेशों का समावेश अवश्य कर लेना चाहिए। सद्वृत्त में कहे गये विषयों के लिए ब.सू. ५ तथा ८ को और मु.चि. २४ को देखें। यहाँ कहा गया सम्पूर्ण वृत्त सदुत्तम है। इनका व्यावहारिक प्रयोग मनुष्य को सदाचारी एवं सज्जन बनाता है, जिससे समाज उसका आदर करता है और परलोक में उसे शुभ गति प्राप्त होती है।

आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः। अनुकुर्यात्तमेवातो लौकिकेऽर्थे परीक्षकः ॥४५॥

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