अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदिनचर्याध्यायः २ ]
सूत्रस्थानम्
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अन्य सदुपदेश—सभी प्रकार के सांसारिक व्यवहारों को सीखने के लिए बुद्धिमान् मानव का सम्पूर्ण संसार ही आचार्य (गुरु) है, फिर भी सांसारिक अर्थ (स्वार्थ तथा परार्थ) की परीक्षा (क्या करने में हित है और क्या करने में अहित है, इस प्रकार का विचार) करने वाला मनुष्य संसार का अनुकरण करे ॥ ४५ ॥
वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने उक्त विषय में अत्यन्त स्पष्ट निर्देश इस प्रकार दिया है—‘कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमताम् आचार्यः, शत्रुश्च अबुद्धिमताम्’ (च.वि. ८।१४) अर्थात् समझदार नर-नारियों के लिए सम्पूर्ण संसार आचार्य (गुरु या उपदेशक) है, क्योंकि वे उससे अच्छी बातें सीखते हैं और नासमझ लोग उससे बुरी बातें सीखते हैं, अतः संसार को उनका शत्रु कहा गया है।
आद्रसन्तानता त्यागः कायवाकृचेतसां दमः। स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सद्गतम् ॥ ४६ ॥
सदाचार-सूत्र—सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना, शरीर, मन तथा वाणी पर नियन्त्रण रखना अर्थात् इन्हें स्वतन्त्र न छोड़ना तथा दूसरों के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना (उन्हें भी अपने ही जैसा समझना) यह सूत्र रूप में पूर्ण सदाचार माना गया है ॥ ४६ ॥
नक्तंदानानि मे यान्ति कथम्भृतस्य सम्प्रति। दुःखभाङ्गन भवत्येवं नित्यं सन्नहितस्मृतिः ॥ ४७ ॥
विचार-पद्धति—आजकल मेरे रात-दिन कैसे बीत रहे हैं, मैं कैसा होता जा रहा हूँ? इस प्रकार का प्रतिदिन ध्यानपूर्वक विचार करने वाला पुरुष कभी दुःखी नहीं होता है ॥ ४७ ॥
वक्तव्य—महर्षि चाणक्य ने भी इसी प्रकार सोचने के लिए मनुष्य को बाध्य किया है—‘कः कालः कानि मित्राणि को देशः को व्यायामी। कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहूर्मुहुः’ ॥ (चाणक्यनीति) इस प्रकार विचार करने वाला पुरुष अज्ञानवश हुई अपनी भूलों को सुधार सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह कभी दुःखी नहीं होता।
इत्याचारः समासेन, यं प्राप्नोति समाचरन्।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं यशो लोकांश्च शाश्वतान् ॥ ४८ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुनुश्रीमद्राष्ट्रविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने दिनचर्या नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
सदवृत्त का उपसंहार—इस प्रकार संक्षेप से आचार (सदाचार अथवा सदवृत्त = सज्जों का कर्तव्य) कह दिया गया है। जिसका अपने जीवन में आचरण करता हुआ पुरुष (नर-नारी) दीर्घायु, आरोग्य (उत्तम स्वास्थ्य), ऐश्वर्य (धन-सम्पत्ति), सुयश तथा स्वर्ग आदि सनातन लोकों को प्राप्त करता है ॥ ४८ ॥
वक्तव्य—इस अध्याय में मनुष्यों के हित के लिए सदाचार का संक्षेप से वर्णन किया गया है। यही मनुष्यों का प्रथम अथवा परम धर्म है। इसके सम्बन्ध में मनु ने कहा है। देखें—मनु. १।१०८-११०। इस सदाचार रूपी धर्म से धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है, इससे सुख मिलता है और इसी से रोगों का नाश होता है। लोक में व्याप्त अन्य धर्मों से सदाचार नामक धर्म सर्वोत्तम है। इसका सेवन करने से मानव-जीवन मङ्गल हो जाता है और इसका आचरण न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है। अतः सभी को सदाचार का सेवन करना चाहिए।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
दिनचर्या नामक दूसरा अध्याय समाप्त ॥ २ ॥