अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः
अथात ऋतुचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब यहाँ से हम ऋतुचर्या नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा कि इसके सम्बन्ध में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम— चर्या शब्द का व्याख्यान हमने 'दिनचर्या' प्रकरण में कर दिया था। अब यहाँ 'ऋतु' = दो-दो मास के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष को छः भागों में जो बाँटा गया है उनमें किस प्रकार का आहार-विहार होना चाहिए, इस अध्याय में उस विषय का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत— च.सू. ६; च.वि. ८; सु.सू. ६; सु.वि. २४ तथा सु.उ. ६४ एवं अ.सं. ४ में देखें।
मासेन्द्रिसृष्ट्यार्माघाद्यैः क्रमात् षड्वतवः स्मृताः । शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाः शरद्विमाः ॥
शिशिराद्यास्त्रिभिस्तेस्तु विद्यादयनमृत्तरम् । आदानं च, तदादत्ते नृणां प्रतिदिनं बलम् ॥ २ ॥
छः ऋतुषु— माघ आदि दो-दो महिनों से क्रमशः छः ऋतुएँ होती हैं। यथा— १. माघ-फाल्गुनः शिशिर ऋतु, २. चैत्र-वैशाख : वसन्त ऋतु, ३. ज्येष्ठ-आषाढ़ : ग्रीष्म ऋतु, ४. श्रावण-भाद्रपद : वर्षा ऋतु, ५. आश्विन-कार्तिक : शरद ऋतु और ६. मार्गशीर्ष-पौष : हेमन्त ऋतु।
उत्तरायण तथा आदानकाल— शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म नामक तीन ऋतुओं में होने वाले छः मासों का नाम 'उत्तरायण' है; इसी का दूसरा नाम है—'आदानकाल'। क्योंकि इन दिनों में यह काल अपनी प्रकृति से प्रतिदिन प्राणियों के बल को लेता रहता है अर्थात् उनके बल का अपहरण करता रहता है ॥ १-२ ॥
वक्तव्य— तन्त्रकारों की व्याख्यान-सरणियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, तथापि निष्कर्ष प्रायः समान होते हैं। यहाँ छः ऋतुओं तथा उत्तरायण की चर्या की गयी है। यह भारत वर्ष 'भार्यवान्' देश है, यह ऋतु आदि की विविधता यहाँ के निवासियों का ही सौभाग्य है, अन्यत्र ऐसा नहीं है। इसके लिए आप विश्व के भूगोल का अध्ययन करें, अस्तु।
सम्पूर्ण वर्ष में १२ मास, ६ ऋतुएँ और २ अयन होते हैं। यह कालविभाग सौरमासों के अनुसार कहा गया है। ज्योतिष के अनुसार वर्षभर में चान्द्रमासों की भी सत्ता स्वीकार की गयी है। तदनुसार प्रति तीसरे वर्ष १ मास बढ़ जाता है, क्योंकि चान्द्रमास २७ या २८ दिन का होता है, किन्तु ऋतु-विभाजन सौरमासों के अनुसार ही होता है। उक्त चान्द्रमास को समझने के लिए आप देखें—'तैश्चतुर्भिर्होरात्रिश्च, पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः। पक्षद्वयं मासः। स शुक्लान्तः'। (अ.सं.सू. ४।४) अर्थात् ४ पहर का दिन और ४ पहर की रात्रि होती है, जिसे मिलाकर १ दिन होता है। १५ दिनों का एक पक्ष होता है, यह कृष्ण तथा शुक्ल भेद से माना गया है। २ पक्षों का एक मास होता है, शुक्लपक्ष की 'पूर्णिमा' के दिन इस मास की पूर्ति होती है।
सूर्यसिद्धान्त के मध्याधिकार श्लोक १२-१३ के अनुसार मास (महीना) दो प्रकार का होता है— १. चान्द्र (ऐन्द्र) मास—इसकी गणना प्रतिपदा से अमावास्या तक १५ दिन का कृष्णपक्ष और पुनः प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन का शुक्लपक्ष, दोनों को मिलाकर एक मास। २. सौरमास—इसकी गणना मेष (वैशाख),