भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

कृतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

४१

वृष ( ज्येष्ठ ) आदि राशियों के अनुसार होती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न राशियों पर सूर्य के संक्रमण को मेघसंक्रान्ति आदि कहते हैं।

सुश्रुत का दृष्टिकोण— ‘इह तु...’प्रावृद्धि’। (सु.सू. ६।१०) अर्थात् यहाँ वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृद् ये छः ऋतुएँ वात आदि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं। उक्त छः ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो-दो मासों को लेकर इस प्रकार मानी गयी हैं—१. वर्षा—भाद्रपद-आश्विन, २. शरद—कार्तिक-मार्गशीर्ष, ३. हेमन्त—पौष-माघ, ४. वसन्त—फाल्गुन-चैत्र, ५. ग्रीष्म—वैशाख-ज्येष्ठ तथा ६. प्रावृद्—आषाढ़-श्रावण। महर्षि सुश्रुत शल्यशास्त्र के आचार्य थे, अतएव उन्होंने वात, पित्त एवं कफ दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशम को दृष्टि में रखकर इस प्रकार ऋतुक्रम को व्यवस्थित किया है। कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता में ‘प्रावृद्’ नामक ऋतु को स्वीकार न करके अपने क्रम से ‘शिषिर’ ऋतु को माना है। देखें—च.सू. ६।४। फिर भी चरक ने संशोधन-चिकित्सा को ध्यान में रखकर ‘प्रावृद्’ ऋतु की सत्ता को स्वीकारा है। देखें—च.वि. ८।१२५।

मतभेद का समाधान— हमारे ये तन्त्रकार नीरजस्तम, आप्त, शिष्ट, विबुद्ध थे, अतएव इनके सिद्धान्त तीनों काल में मानने योग्य होते हैं, फिर भी जहाँ मतभेद होता है उसका कारण भी होता है। देखें—जिन देशों ( भूखण्डों ) में ठण्ड अधिक पड़ती है वहाँ हेमन्त तथा शिशिर नामक दो ऋतुएँ शीतकाल की होती हैं और जहाँ वर्षा अधिक होती है वहाँ प्रावृद् तथा वर्षा नाम की दो ऋतुएँ मानी जाती हैं। हमारे भारतवर्ष में हिमालय के कई भाग ऐसे भी हैं जहाँ वर्षभर सर्दी बनी रहती है। आसाम आदि कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा दक्षिण के कुछ देश ऐसे भी हैं जहाँ अधिक गर्मी पड़ती है; तथापि ऋतुओं का अपना प्रभाव उन-उन स्थानों पर भी अवश्य पड़ता ही है। इसी दृष्टि से प्राचीन महर्षियों ने भौगोलिक सर्वेक्षण कर अधिकाधिक प्रभावकारी भूभागों को उक्त विभाजन की सूक्ष्म दृष्टियों से देखा है, जो चिकित्सा की दृष्टि से उपादेय है।

सुश्रुत ने पहले ऋतुभेद से जिन वात आदि दोषों के चय, प्रकोप, प्रशम का वर्णन वर्षभर की अवधि में दिखलाया था, उसे दिन-रात के रूप में इस प्रकार कहा है—दिन के पूर्वार्ध में वसन्तऋतु ( कफप्रकोप ) के मध्याह्नकाल में, ग्रीष्मऋतु ( वातसंचय ) के अपराह्न में प्रावृद् ऋतु ( वातप्रकोप ) के प्रदोषकाल ( रात्रि के पूर्वभाग ) में वर्षाऋतु के ( पित्तसंचय ) के आधीरात में शरद ऋतु ( पित्तप्रकोप ) के, रात्रि के अन्तिम भाग ( उषःकाल ) में हेमन्तऋतु ( कफसंचय ) के लक्षण होते हैं। इस प्रकार दिन-रात में भी दोषों के संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है। देखें—सु.सू. ६।१४।

तस्मिन् ह्यत्यर्थतीक्ष्णोरुक्षा मार्गस्वभावतः। आदित्यपवनाः सौम्यान् क्षययन्ति गुणान् भुवः। तिक्तः कषायः कटुको बलिनोऽत्र रसाः क्रमात्। तस्मादादानमाशेयम्—

अग्निगुण-प्रधान आदानकाल— इस उत्तरायण काल में सूर्य के उत्तरमार्ग में चलने के कारण सूर की किरणें अत्यन्त तीक्ष्ण तथा उष्ण ( गरम ) हो जाती हैं। सूर्य की गरमी से तपी हुई हवाएँ भी उष्ण एवं रुक्षा हो जाती हैं अर्थात् लू चलने लगती है। अतएव ये दोनों ( सूर्य तथा हवा ) पुष्टी के सौम्य ( शीतल तथा गीलापन आदि ) गुणों को क्षीण ( नष्ट ) कर देते हैं। यही कारण है कि इन दिनों प्राणियों का भ्रंशारीरिक बल क्षीण हो जाता है। इस उत्तरायण काल में क्रमशः शिशिर ऋतु में तित्करस, वसन्त ऋतु में कषाय रस और ग्रीष्म ऋतु में कटुरस बलवान् ( शक्तिशाली ) हो जाते हैं। यही कारण है कि यह आदानकाल आशेय ( अग्निगुण प्रधान ) कहा गया है॥ ३॥

वक्तव्य— ‘आदित्यपवनाः’ अर्थात् सूर्य की उष्णता से युक्त इधर-उधर बहती हुई हवाएँ इस काल में अपनी भयंकरता से युक्त रहती हैं। वास्तव में हवा का स्वभाव ही ऐसा होता है कि गर्मी में वहाँ ‘लू’ का रूप धारण कर लेती है और जाड़ों में सर्दी का। इस सम्बन्ध में चरक ने कहा है—‘वायु को