अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें४९
अष्टाङ्गहृदय
योगवाही कहा गया है—जैसा उसे संयोग मिलता है, वैसा उसका स्वभाव हो जाता है'। देखें—च.चि. ३१८। अग्निगुण-प्रधान आदानकाल का वर्णन चरक ने भी प्रायः इसी प्रकार किया है। देखें—च.सू. ६६।
—ऋतवो दक्षिणायनम् ॥ ४ ॥
वर्षादयो विसर्गश्च—
विसर्गकाल-दक्षिणायन—वर्षा, शरद् तथा हेमन्त नामक इन तीन ऋतुओं का नाम दक्षिणायन है, इसी का दूसरा नाम है 'विसर्ग काल'। क्योंकि 'विसुजति ददाति बलम् इति विसर्गः कालः' ॥ ४ ॥
—यद्वन्न विसुजत्ययम्। सौम्यत्वादत्र सोमो हि बलवान् हीयते रविः ॥ ५ ॥
मेघवृष्ट्यचनितैः शीतैः शान्ततापे महतीतले। स्निग्धाश्चैहाम्ललवणमधुरा बलिनो रसाः ॥ ६ ॥
विसर्गकाल-परिचय—यह काल सौम्य होने के कारण प्राणिमात्र को बल देता है। इस काल में सौम्यगुणों वाला सोम ( चन्द्रमा ) बलवान् रहता है और सूर्य का बल क्षीण हो जाता है। इस काल में मेघों ( बादलों ) के छाये रहने के कारण, वर्षा के होते रहने से इन दोनों के कारण शीतल हवा के बहने से भूतल का सन्ताप शान्त हो जाता है। अतः वर्षा ऋतु में स्निग्ध गुण वाला अम्ल रस, शरद् ऋतु में लवण रस तथा हेमन्त ऋतु में मधुररस बलवान् हो जाते हैं। फलतः इस विसर्गकाल ( दक्षिणायन ) में प्राणियों के देह तथा उनका बल बढ़ जाता है, अतएव इसे 'विसर्गकाल' कहते हैं ॥ ५-६ ॥
वक्तव्य—'वि + गुञ् + घञ् = विसर्गः' अर्थात् दान। यह काल प्राणियों को बल का विसर्जन करता है। चरक-सुश्रुत ने भी इस काल की प्रशंसा की है।
शीतैऽग्रघं वृष्टिघमैऽल्पं बलं मध्यं तु शेषयोः।
बल का चयापचय—शीत ऋतुओं ( हेमन्त तथा शिशिर ) में प्राणियों में बल की स्थिति उत्तम रहती है, शेष दो शरद् तथा वसन्त ऋतुओं में शारीरिक बल की स्थिति मध्यम कोटि की तथा वर्षा और ग्रीष्म ऋतुओं में बल की मात्रा अति अल्प हो जाती है।
वक्तव्य—विसर्गकाल में क्रमशः बढ़ा हुआ शारीरिक बल आदानकाल में क्रमशः उस प्रकार घटता जाता है, जैसे शुक्लपक्ष में क्रमशः बढ़ा हुआ चन्द्रमा कृष्णपक्ष में क्रमशः घटता जाता है। अतएव शारीरिक बल के ह्रास-वृद्धि क्रम को हीन, मध्य, उत्तम भेद से तीन भागों में विभाजित किया गया है।
बलिनः शीतसंरोधाद्वेमन्ते प्रबलोऽनन्तः ॥ ७ ॥
भवत्यल्पेन्दनो धातून् स पचेद्वायुनेरितः। अतो हि मेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्गम्ललवणात्रसान् ॥ ८ ॥
हेमन्तऋतुचर्या—हेमन्त ऋतु में कालस्वभाव के कारण पुरुष अधिक बलवान् रहता है। क्योंकि शीत के कारण भीतर रुका होने के कारण ( अर्थात् रोमकूपों के शीत से अवरुद्ध होने के कारण ) जठराग्नि ( पाचकाग्नि ) अधिक बलवान् हो जाती है। यदि उसे आहार रूपी ईधन ( जिसे वह जठराग्नि पका या जला सके। ) कम मिल पाता है, तो वह अग्नि वायु द्वारा प्रेरित होकर ( मुलगकर ) रस आदि शरीरस्थ धातुओं को पचाने लगता है। इसलिए हेमन्त ऋतु में वातनाशक मधुर, अम्ल तथा लवण रसयुक्त पदार्थों का पर्याप्त सेवन करना चाहिए ॥ ७-८ ॥
वक्तव्य—यह हेमन्तऋतुचर्या है, कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि गर्मी में गर्मी नहीं पड़ती, वर्षा ऋतु में वर्षा नहीं होती और सर्दियों में जाड़ा नहीं पड़ता; इसे ऋतुविपर्यय कहते हैं। ये लक्षण शनि आदि ग्रहों के अतिचार से भी देखे जाते हैं। आजकल राकेट आदि अन्तरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं, इनके प्रकोप से भी ये परिवर्तन दिखलायी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में कुशल चिकित्सक देश-काल की सामयिक स्थिति के अनुसार ऋतुचर्या का निर्देश करे।