अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऋतुचर्याध्यायः ३ ]
सूत्रस्थानम्
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मुश्रुत के अनुसार हेमन्तचर्या—'हेमन्ते लवणक्षारतिक्रताम्लकटुककोल्कटम्। सर्पिस्तैलमहिममशनं हितमुच्यते' ॥ (सू.उ. ६४१३) अर्थात् हेमन्त ऋतु में नमकीन, तित्त, क्षार, अम्ल, कटु रसों का एवं मर्पात्न घी-तैल का तथा इनसे बने हुए भोज्य पदार्थों का सेवन हितकर होता है। इस काल में वातकारक पदार्थों का सेवन न करे। ऊपर कहे गये तित्त, कटु आदि रस-प्रधान पदार्थ कफदोष के विनाशक होते हैं, क्योंकि इस काल में कफ की वृद्धि स्वभावतः होती है।
देव्याग्निश्रानामतेर्हि प्रातरेव बुभुक्षितः। अवश्यकार्य सम्भाव्य यथोक्तं शीलयेदनु॥ ९ ॥
वातघ्नतेलेरभ्यङ्गं मूर्छि तैले विमर्दनम्। नियुद्धं कुशलैः सार्धं पादाघातं च युक्तिः॥ १० ॥
प्रातःकाल के कर्तव्य—हेमन्त ऋतु में रातें लम्बी होने लगती हैं, अतः प्रातःकाल उठते ही भूख लग जाती है। इसलिए प्रातःकाल समय पर उठकर मल-मूत्र करने के बाद शौच आदि क्रिया से निवृत्त होकर दतवन आदि करके उसके बाद यथोक्त (आठवें पद्य में ऊपर जो कहा है—'सेवेत स्वादम्ललवणान् रसान्') का सेवन करे अर्थात् मधुर, लवण तथा अम्ल रसयुक्त पदार्थों (मिठाई, नमकीन आदि) को खावे अथवा जलपान करे। इस ऋतु में प्रतिदिन वातनाशक तैलों का मालिश करे या कराये। मल्लविद्याकुशल पहलवानों के साथ कुशती करे, यदि सम्भव हो तो पादाघात (लंगड़ी लगाना) आदि को विधिपूर्वक सीखे, अन्यथा कुल व्यायाम अवश्य करे ॥९-१०॥
वक्तव्य—'अवश्यकार्य' की व्याख्या हमने ऊपर कर दी है। 'बुभुक्षितः'—यद्यपि ऊपर कहा गया है कि भूख लगे हुए पुरुष को आवश्यक कार्य करने के बाद खाना चाहिए। इस प्रसंग में च.चि. १५।११७ से २२० तक पद्यों का अनुशीलन करें। इन सबका तात्पर्य यह है कि उसे तत्काल भोजन दें, अन्यथा उपेक्षा करने से उसकी मृत्यु भी हो सकती है। और भी देखें—'आहारकाले सम्प्राप्ते यो न भुव्हते बुभुक्षितः। तस्य सौदति कायाग्निरिन्धन इवानलः' ॥ इन उद्धरणों से बुभुक्षित को भोजन करना ही चाहिए, ऐसा समझें। यहाँ व्यक्ति की स्वास्थ्थ-सम्पत्ति का विचार करके चिकित्सक निर्देश दे कि तत्काल भोजन देना आवश्यक है या शौच आदि करने के बाद।
कषायापहृतस्नेहस्तः स्नातो यथाविधि। कुड्कुमेन सदपेण प्रदिग्धोऽगुहधूपितः॥ ११ ॥
रसान् स्निधान् पलं पुष्टं गौडमच्छसुरां सुराम्। गोधूमपिष्टमाषेषुक्षीरोत्थविकृतीः शुभाः॥
नवमत्रं वसां तैलं, शौचकार्यं सुखोदकम्। प्रावाराजिनकोशेयप्रवेणौकौचवास्तुतम्॥ १३ ॥
उष्णस्वभावैर्लघुभिः प्रावृतः शयनं भजेत्। युक्त्याऽर्किरणान् स्वेदं पादत्राणं च सर्वदा॥ १४ ॥
स्नान आदि विधि—उसके बाद आँवला आदि कमैले द्रव्यों के कल्क (चटनी के समान पैसे हुए द्रव्यों) से पहले किये गये अयंग (मालिश) की चिकनाहट को दूर करे, फिर विधिपूर्वक स्नान करे। उसके बाद शरीर को मोटे तौलिया से पोंछकर कुंकुम, कस्तूरी आदि उष्णगुण-प्रधान द्रव्यों का लेप (तिलक) लगाये और अगुह की धूप की सुवास का सेवन कर तदनन्तर भोजन करे।
भोजन में घी-तैल में भुना गया मांसरस स्वस्थ प्राणियों के मांस का होना चाहिए। गुड से बने पदार्थ, स्वच्छ (उत्तम) मद्य या सामान्य मद्य, गेहूँ का आटा, उड़द की दाल, इक्षुरस, दूध द्वारा निर्मित पदार्थ (दही, मठा, मलाई, रबड़ी, खुरचन आदि), नये चावलों का भात, वसा, तैल का सेवन करे। हाथ धोने आदि के लिए गुनगुना गरम जल का प्रयोग करे।
इन दिनों प्रावार (ऊनी कम्बल आदि), मुगचर्म, रेशमी बिछौना, टाट या कुथक (रंग-बिरंगा कम्बल या गलीचा या गद्दा) बिछाकर रखें। ऊनी हल्के चादर को ओढ़कर सोयें। प्रातःकाल युक्तिपूर्वक सूर्य की किरणों का सेवन करे। स्वेदन कर्म करे तथा जूता-जुराब (मोजे) को सदैव धारण करे ॥११-१४॥
वक्तव्य—कोश-साहित्य में 'नियुद्ध' शब्द का अर्थ है—बाहुयुद्ध। 'पादाघातं च युक्तिः'—यहाँ पादाघात रूपी व्यायाम को थकावट आने से पहले छोड़ दें, यही युक्ति है! 'कषायापहृतः स्नेहः'—मालिश