अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
के समय जो शरीर पर तेल लगा है, उसे कपाय-द्रव्यों से दूर करें, न कि सावून आदि धारयुक्त पदार्थों से। इनके प्रयोग से केशभूमि रूक्ष हो जाती है।
स्नानविधि —इसके लिए शास्त्र में दोषी अवगाहन ( टब में लेटकर नहाने ) का विधान है। इसमें गरम पानी भर दिया जाता है, मिर को डुबाये बिना पूरे शरीर का इस प्रकार मुखद स्नान हो जाता है। केशर-कस्तुरी का लेप करने से शरीर सुवासित हो जाता है और शरीर में उष्णता का संचार भी होता है।
भोजन —खाने वाले की रुचि के अनुसार इसका निर्माण किया तथा कराया जाता है। मांस-भोजन मांसभोजियों के लिए है। शाकाहार सबके लिए है। उड़न के बड़े तथा पकीड़े शाकाहारियों के मांस के प्रतिनिधित्वरूप आहारद्रव्य हैं। वसा प्राणिज स्नेह है। गौड शब्द से गूड़ से बने भोज्य पदार्थ या मांस का ग्रहण किया जाता है। प्रबेणी—रंगीन ऊनी वस्त्र। कौचब—रंकित वस्त्रभेद। पाठभेद के अनुसार कुथक—‘कुथ’ का अर्थ अमरकोश में ‘कुश’ दिया है। इसके कुशासन बनते हैं। ये विछाये जाते हैं। धान के पुआल का गढ़ा गरीबों का उत्तम बिस्तर है, किन्तु श्रीचक्रपाणि ने कुथक का अर्थ चित्रकम्बल किया है। इसी अर्थ में माषपण्डित ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। देखें—‘कृयेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम्’ ( शिशुपालवध १।८ ) इसके अतिरिक्त श्रीअत्रिदेव तथा श्रीछायागोत्री ने इसका अर्थ रई का गढ़ा किया है। यह अर्थ प्रसंगोचित होने पर भी विचारणीय है। मूल में ‘कौचब’ शब्द होने पर भी श्रीहेमाद्रि ‘कुथक’ का पर्याय कम्बल दे रहे हैं। अस्तु।
पौवरोहस्तनश्रोण्यः समदाः प्रमदाः प्रियाः । हरन्ति शीतमुष्णाङ्गुचो धूपकुडुकुमयोवनेः ॥ १५ ॥
शीतताशक उपाय —पीन ( स्थूल एवं पुष्ट ) ऊह, स्तन तथा श्रोणिवाली यौवन तथा सुरा के मद से मदमाती हुई प्रिया, कुंकुम के लेप, अगुरु की धूप एवं यौवनमद के कारण उष्ण शरीर वाली नारियाँ ( भोग्या स्त्रियाँ ) शीत को हर लेती हैं ॥ १५ ॥
अङ्गारतापसन्तप्तगर्भभूवेशमचारिणः । शीतपारुष्यजनितो न दोषो जातु जायते ॥ १६ ॥
निवास-विधि —जल्ले हुए अंगारों से तपे हुए मकान के निचले तल में निर्मित कमरे में ( जहाँ बाहर बहने वाली शीतल हवा का प्रवेश न हो ) अथवा गर्भभूवेशम ( घर के भीतर बनी हुई गुफा ) में निवास करने वाले नर-नारियों को शीत के कारण उत्पन्न होने वाली परुषता सम्बन्धी कोई विकार कभी नहीं होता। अतः इन दिनों उक्त प्रकार के घर में निवास करें ॥ १६ ॥
अयमेव विधिः कार्यः शिशिरेऽपि विशेषतः । तदा हि शीतमधिकं रौक्ष्यं चादानकालजम् ॥ १७ ॥
शिशिर ऋतुचर्या —हेमन्त ऋतु में कहीं गयी सभी विधियों का सेवन विशेष करके शिशिर ऋतु में भी करना चाहिए। विशेषता यह है कि इस ऋतु में हेमन्त ऋतु की अपेक्षा शीत अधिक पड़ने लगता है, क्योंकि इस ऋतु में आदानकाल का प्रारम्भ हो जाता है। अतः इसमें रुक्षता आने लगती है ॥ १७ ॥
वक्तव्य —इसमें आदानकाल के प्रारम्भ होने के कारण जो रुक्षता होने लग जाती है, उसकी शान्ति के लिए अश्वंग का सेवन तथा स्निग्ध आहारों का सेवन करना चाहिए। संक्षेप में यही ‘शिशिर ऋतुचर्या’ है। तन्त्रकार का सूत्र रूप में सामान्य-विशेष विधि से वर्णन का प्रकार सर्वत्र दिखाई देता है।
कफश्चित्तो हि शिशिरे वसन्तेऽर्काशुतापितः । हृत्वाऽग्निं कुहते रोगानतस्तं त्वरया जयेत् ॥ १८ ॥
तीक्ष्णैर्विमनस्यार्चैर्लघुरूक्षैश्च भोजनैः । व्यायामोर्द्वतनाघातेर्जित्वा स्लेष्माण्मूल्यणम् ॥ १९ ॥
स्नातोऽनुलिप्तः कर्पूरचन्दनागुरुकुडुकुमैः । पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गूलशूल्यभुक ॥ २० ॥
सहकाररसोन्मिश्रान्तास्वाद्य प्रिययाऽपितान् । प्रियास्यसङ्गसुभोन् प्रियानेत्रोत्पलाङ्कितान् ॥
सौमनस्यकृतो हृद्यान्यस्यैः सहितः पिबेत् । निर्गदानासवारिष्टसौधुमाद्रौकमाधवान् ॥ २१ ॥
शृङ्गबेराम्बु साराम्बु मध्वम्बु जलदाम्बु च ।