भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

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वसन्त ऋतुचर्या —शिशिर ऋतु में शीत की अधिकता के कारण स्वाभाविक रूप से कफदोष का संचय हो जाता है। वह कफदोष वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त होकर पिघलने लगता है, जिसके कारण पाचकाग्नि मन्द पड़ कर अनेक प्रकार के (प्रतिशय आदि) रोगों को उत्पन्न कर देता है, अतः इस ऋतु में उस कफदोष को शीघ्र निकालने का प्रयत्न करे। ( वमन तथा रुक्ष नस्यों के प्रयोग से इसका निर्हरण करे। ) अन्यत्र कहा भी है—‘हेमन्ते चैतये श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति’। यहाँ हेमन्त शब्द के साहचर्य से शिशिर ऋतु का भी ग्रहण कर लेना चाहिए, क्योंकि दोनों की ऋतुचर्या प्रायः समान है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हेमन्त-शिशिर ऋतु में संचित कफदोष का प्रकोप वसन्त ऋतु में होता है। इसलिए कफदोष को निकालने के लिए तीक्ष्ण वमनकारक द्रव्यों द्वारा वमन कराये और तीक्ष्ण एवं रुक्ष औषधों का प्रतिदिन नश्य लें। लघु ( शीघ्र पचने वाले) तथा रुक्ष ( स्नेहरहित) भोजन करे। व्यायाम, उबटन, आघात ( दण्ड-बैठक ) का प्रयोग करें और कराये, जिससे बढ़ा हुआ कफदोष शान्त हो जाय ( अन्यत्र इस ऋतुचर्या में घूमपान, कवलग्रह का भी विधान है )। उसके बाद स्नान करें; फिर कपूर, अगर, चन्दन, कुंकुम का शरीर में अनुलेप लगाये ( तिलक करे )। भोजन में पुराने जौ, गेहूँ की रोटी आदि बनाकर खाये, मधु का सेवन करें, जांगल देश के प्राणियों के मांस के बड़े बनवाकर खाये, जो लोहे की शलका में पिरोंकर पकाये जाते हैं, अतएव इन्हें ‘शूल्य’ कहा जाता है।

पान-विधि —पके हुए आम का रस निकाल कर, जिसे पहले प्रियतमा ने चबकर अपने प्रियतम को दिया हो, प्रिया के मुख की गन्ध से सुरभित, जिस पर प्रिया के नयनकमलों की छाया पड़ रही हो, जो मन को प्रिय लगने वाला हो, हृदय को शक्ति देने वाला हो; ऐसे आम के रस का मित्रमण्डली के साथ पान करे। ( ध्यान रहे, इन मित्रों के साथ-साथ पली भी अवश्य रहे, नहीं तो ‘प्रियानेतोत्पलाङ्कितान्’ यह विशेषण व्यर्थ हो जायेगा )। दोपरहित आसव, अरिष्ट, सीधु, मुनवका द्वारा निर्मित सुरा तथा महुआ के आसव का सेवन भी मित्रों के साथ बैठकर उचित मात्रा में करे। अदरख का पानी, विजयसार तथा चन्दन का जल, मधुमिथित जल और नागरमोथा का कथित जल इनका भी सेवन करे ॥ १५-२२ ॥

वक्तव्य —ऊपर जो विस्तृत खान-पान व्यवस्था बतलायी है, इसका उद्देश्य यह है कि जिसे जो रुचिकर तथा प्रिय हो उसका वह सेवन करे। अदरख का पानी आदि सभी का क्वाथ कर लें, मध्वम्बु को केवल जल में घोलकर लें। यहाँ तक वसन्त ऋतु की प्रातःकालीन चर्या का वर्णन कर दिया गया है।

दक्षिणानिलशीतेषु परितो जलवाहिषु ॥ २३ ॥

अवृष्टनष्टसूर्येषु मणिकुटिमकान्तिषु। परपुष्टविघृष्टेषु कामकर्मन्तभूमिषु ॥ २४ ॥

विचित्रपुष्पवृक्षेषु काननेषु सुगन्धिषु। गोष्ठीकथाभिश्चित्राभिर्मध्याह्ं गमयेत्सुखी ॥ २५ ॥

मध्याह्नचर्या —जो घने वन दक्षिण दिशा की वायु अर्थात् मलयज पवन से शीतल तथा सुगन्धित हों, जहाँ चारों ओर जलप्रवाह हो रहा हो, जहाँ सूर्य का प्रकाश थोड़ा पड़ रहा हो या वन के घने होने से न हो रहा हो, जहाँ हीरे-मरकत आदि के फर्श बने हों; इनकी कान्ति से युक्त वनों में, जहाँ कोयलें कुक रही हों, सहवास करने योग्य स्थानों में, जहाँ विविध प्रकार के सुगन्धित फूलों वाले वृक्ष हों, ऐसे वनों ( उद्यानों ) में सुख चाहने वाला पुरुष मित्रमण्डली की कथा-मुभाषित युक्त सभाओं द्वारा मध्याह्नकाल को बिताये ॥ २३-२५ ॥

गुरुशीतदिवास्वप्नस्निग्धास्लमधुरास्यजेत् ।

वसन्त ऋतु में अपथ्य —इस ऋतु में गुरु ( देर से पचने वाले भक्ष्य पदार्थ ), शीतल पदार्थ, दिन में सोना, स्निग्ध ( ची-तेल से बने हुए खाद्य ) पदार्थों, अम्ल तथा मधुर रस-प्रधान पदार्थों का सेवन न करें, क्योंकि ये सभी कफवर्धक होते हैं।

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