भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

तीक्षांशुरतितीक्षांशुग्रीष्मे सङ्क्षिप्ततीव यत् ॥ २६ ॥

प्रत्यहं क्षीयते श्वेष्मा तेन वायुश्च बर्धते । अतोऽस्मिन्दुकट्टमूलव्यायामार्ककांस्त्यजेत् ॥ २७ ॥

ग्रीष्म ऋतुचर्या—ग्रीष्म ऋतु में तीक्षांशु ( सूर्य ) अपनी तेज किरणों से संसार के जलीय तत्व को सुखा देता है। ( यहाँ एक दूसरा पाठभेद इस प्रकार मिलता है—'स्नेहमर्काऽतितीक्षांशुः' । यह पाठ अधिक स्पष्ट है, इससे भी चरकोक्त यह पाठ अधिक स्पष्ट है—'मयुखैर्जगतः स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः' । ( च.सू. ६।२७ ) जिसके कारण शरीरस्थित जलीय अंश कफघातु का भी क्षय होने लगता है, फलतः वातदोष की वृद्धि होती जाती है। इसलिए इस ऋतु में लवण, कटु तथा अम्ल रस-प्रधान पदार्थों का, व्यायाम एवं धूप ( घाम ) का सेवन करना छोड़ दें ॥ २६-२७ ॥

भजेन्मधुरमेवात्रं लघु स्निग्धं हिमं द्रवम् ।

सेवनीय पदार्थ—इस ऋतु में अधिक मधुर आहारों का सेवन करें तथा लघु ( शीघ्र पच जाने वाले ), स्निग्ध ( घी-तेल से बने हुए ) पदार्थों, शीतल एवं पेयों का सेवन करें।

बक्तव्य—घी-तेल से बने पदार्थ गुरु होते हैं, अतः 'गुरुणामर्धसौहित्यम्' अर्थात् गुरु पदार्थों को भरपेट न खाकर आधा ही खाना चाहिए, यह शास्त्र की आज्ञा है; नहीं तो पाठकों को सन्देह होगा कि ऊपर पहले लघु ( सुपच ) कहा है, फिर आगे स्निग्ध ?

सुशीततोयसिक्ताङ्गो लिङ्गात्सकून् सर्शकरान् ॥ २८ ॥

सत्-सेवनविधि—अत्यन्त शीतल जल ( यह स्वभावशीतल जल पर्वतीय प्रदेशों में मुलभ होता है, कुत्रिम शीतल जल सर्वत्र मिल सकता है, किन्तु गुणवत्ता की दृष्टि से वह निकृष्ट होता है। देखें—'हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः' । च.सू. २७।२०९ ) से स्नान करें, चीनी मिलाकर सतुओं को चाटें। ( चाटने योग्य बनाने के लिए उसमें शीतल जल मिला लें ॥ २८ ॥

मद्यं न पेयं, पेयं वा स्वल्पं, सुबहुवारि वा ।

मद्य-सेवनविधि—इन दिनों मद्यपान न करें, यदि पीना ही हो तो थोड़ा पीयें अथवा उसमें बहुत-सा जल मिलाकर पीयें। इतना भी वे पीयें जिन्हें यह अनुकूल पड़ता हो।

अन्यथा शोषशैथिल्यदाहमोहान् करोति तत् ॥ २९ ॥

मद्यपान का निषेध—शास्त्रीय आज्ञा के विरुद्ध किया हुआ मद्यपान शोष ( क्षय ), पाठभेद के अनुसार शोफ = सूजन, शैथिल्य ( शिथिलता = अंगों में ढीलापन ), दाह ( जलन ), बेहोशी आदि विकारों को उत्पन्न कर देता है ॥ २९ ॥

कुन्देन्दुधवलं शालिमशनीयाज्जाङ्गलैः पलैः ।

भोजन-विधान—कुन्द ( चमेली का एक भेद 'मोतिया' ) के समान सफेद तथा इन्दु ( चन्द्रमा ) के समान शीतल ( शीतवीर्य ) शालिचावलों के भात को तीतर, बटेर आदि जांगलदेशीय प्राणियों के मांसरस के साथ खाये।

पिबेदसं नातिघनं रसालां रागखाण्डवौ ॥ ३० ॥

पानकं पञ्चसारं वा नवमूद्राजने स्थितम् । मोचचोचदलैर्युक्तं साम्बं मृन्मयशुक्तिभिः ॥ ३१ ॥

पाटलवासितं चाम्बः सकर्पूरं सुशीतलम् ।

पेय-विधान—अधिक गाढ़े मांसरस का सेवन न करें। रसाला, राग ( रायता ), खाण्डव ( खट्टे, मधुर, नमकीन रसों के घोल ) का पान करें। पञ्चसार का सेवन करें, जो नये मिट्टी के पात्र में बनाया गया हो; इस पात्र की सौधी गन्ध भी उसमें आ जाती है, उसे शीतल करने के लिए कुछ देर केले अथवा