भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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कतुचर्याध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

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महृष्ट के पत्तों से ढककर रखे हुए पन्ना या शर्बत को पीयें, जिसमें कुछ खटाई भी मिलायी गयी हो। इसे पीने के लिए मिट्टी का पुरवा या कुल्हड़ या कसोरा होना चाहिए। पीने से पहले इसे पाइल के फूलों तथा कपूर से सुगन्धित कर लेना चाहिए ॥ ३०-३१ ॥

वक्तव्य —इस प्रकरण में आये हुए भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि पदार्थों का निर्माण-प्रकार भावप्रकाश के कुतान्नवर्ग में या पूर्ववर्ती संहिताग्रन्थों में देख लेना चाहिए।

पञ्चसार —इसका उल्लेख अ.हू.चि. २।१३ में इस प्रकार दिया है—मधु, खजूर, मुनक्का, फाल्गुमा, मिथ्री तथा जल—इन पाँचों को मिलाकर बनाये गये मन्थ का दूसरा नाम 'पञ्चसार' है।

शशाङ्ककिरणान् भक्ष्यान् रजन्यां भक्षयन् पिवेत् ॥ ३२ ॥

ससितं माहिषं क्षीरं चन्द्रनक्षत्रशीतलम्।

रात्रि में दुग्धपान-विधि —शशांककिरण नामक भोजनों का सेवन करते हुए चन्द्रमा तथा तारों द्वारा शीतल किया गया और मिथ्री मिले हुए घैस के दूध को पीये ॥ ३२ ॥

वक्तव्य —शशांककिरण नामक भोजन का परिचय—'तालीसर्चुण्टटकाः सकर्पूरमितोपलाः। शशाङ्ककिरणग्याश्व भक्ष्या रुचिकराः परम्' (अ.हू.चि. ५।४९)।

अभ्रङ्कपमहाशालतलरुद्दोणरश्मिषु ॥ ३३ ॥

वनेषु माधवीशिलष्टद्वान्नास्तबकशालिषु।

मध्याह्नचर्या —दोपहर के समय धूप में पीड़ित मानव आकाश को छूने वाले अर्थात् बहुत ऊँचे बड़े-बड़े शाल, ताल, तमाल वृक्षों से जहाँ सूर्य की किरणें छिप गयी हों तथा माधवीलताओं से परिवेष्टित, अंगूरों के गुच्छों से युक्त उपवनों में शयन या आराम करें ॥ ३३ ॥

वक्तव्य —यद्यपि इसी प्रकरण के ३६वें पद्य में 'स्वप्न्यात्' क्रिया का समावेश है, जिसका अध्याहार यहाँ भी कर लिया गया है।

सुगन्धिहिमपानीयसिन्धुमानपटालिके ॥ ३४ ॥

कायमाने चित्ते चूतप्रवालफललुम्बिभिः।

शयन-विधान —सुगन्धित एवं शीतल जल से बार-बार सींचे गये पटालिकाओं ( परदों ) वाले आमों के कोमल पत्तों एवं फलों की बन्दनवारों से सुसज्जित, कायमान ( जो ऊँचाई तथा चौड़ाई में निवास करने के इच्छुक नर-नारी के शरीर के नापवाले घर में तथा उसमें बिछे हुए बिस्तर ) में सोयें ॥ ३४ ॥

वक्तव्य —'कायमाने' शब्द की यहाँ जो उपयोगिता है और जो उसका शाब्दिक अर्थ है, वह हमने ऊपर लिखा है। देखें—वी.एस. आण्डे कोश। श्री अरुणदत्त ने 'कायमाने' शब्द का 'वैष्णवादिनिष्पादिते गृहविशेषे' यह जो अर्थ किया है, इस अर्थ को अभिव्यक्त करने की इसमें कितनी शक्ति है, इस पर विचार करना होगा। गर्मियों में बाँस के सहारे सरपत, घास-फूस के घर बनाये जाते हैं, पर उन्हें 'कायमान' संज्ञा कब किसने दी, यह विचारणीय है।

कदलीदलकह्लारमृणालकमलोत्पलैः ॥ ३५ ॥

कोमलैः कल्पिते तलपे हसत्कुसुमपल्लवे। मध्यन्दिनेऽकैतापार्तैः स्वप्न्याद्वारागृहेऽथवा ॥ ३६ ॥

पुस्तत्रौस्तनहस्तात्यप्रवृत्तोशीरवारिणि ।

शयन-विधान —केले के पत्तों, सुगन्धित कह्लारों ( कमलभेदों ), मृणालों ( कमलकन्द = बिसों ), कमलों, नीलकमलों से निर्मित तथा खिले हुए फूलों एवं मुलाधम पत्तों से युक्त कोमल शयन = शय्या पर दोपहर की गर्मी से पीड़ित पुरुष सोए ( यही चर्या स्त्रियों के लिए भी है ) अथवा धारागृह के समीप शयन

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