भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

४८

अष्टाङ्गहृदये

करे। जिस घर में शिल्पियों द्वारा स्त्री की आकृति की पुतलियाँ बनायी हों, उसके स्तनों, हाथों तथा मुख पर रखे गये खस से सुगन्धित जल बह रहा हो, तो ऐसे स्थान पर शयन करें ॥ ३५-३६ ॥

वक्तव्य —श्रीमानों के घरों की साज-सज्जा में 'पुरुष-स्त्री' के जैसे अनेक प्रकार के चित्र किंवा मूर्तियाँ उनके शो.नागृह में अथवा उद्यानों में देखी जाती हैं। यह भी विहार का एक प्राचीन प्रकार रहा है। फूलों तथा किसलियों की शय्या रचाने का प्रकार भी प्राचीन ही है।

निशाकरकराकीर्णे सीधपुष्के निशासु च ॥ ३७ ॥

आसना

रात्रिचर्या —रात के समय चूना पुते हुए महल (सींध) की छत पर, जहाँ चन्द्रमा की चाँदनी छिटकी हो, वहाँ बैठना या लेटना चाहिए ॥ ३७ ॥

—स्वस्थचित्तस्य चन्दनाद्वैतस्य मालिनः। निवृत्तकामतन्त्रस्य सुसूक्ष्मतनुवासः ॥ ३८ ॥

जलाद्रास्तालवृन्तानि विस्तृताः पद्मिनीपुटाः। उत्क्षेपाश्च मृदुक्षेपा जलवर्षिहिमानिलाः ॥

कर्पूरमलिकामाला हाराः सहरिचन्दनाः। मनोहरकलालापाः शिशवः सारिकाः शुकाः ॥

मृणालवलयाः कास्ताः प्रोत्फुल्लकमलोज्ज्वलाः। जङ्गमा इव पद्मिन्यो हरन्ति दयिताः कलमम् ॥

मनोहर वाताबरण —इन दिनों चित्त को स्वस्थ बनाये रखें, चन्दन के लेप से शरीर को गीला करें, फूलों एवं रत्नों की माला को धारण करें, स्त्री-सहवास न करें, पतले एवं हल्के वस्त्रों को धारण करें। पानी में भिगोये हुए ताड़ के पंखों की हवा का सेवन करें या कमल के पत्तों की हवा का सेवन करें या मोरपंखों की हवा ले, जो धीरे-धीरे हिलाये जा रहे हों; इन सभी प्रकार के पंखों से शीतल जल की बूँदें गिर रही हों तथा शीतल हवा आ रही हो, कपूर के घोल से सुवासित स्फटिक की मालाओं को धारण करें; इसी को मलिकामाला कहा गया है। हरिचन्दन से सुवासित मोतियों की मालाएँ धारण करें। चारों ओर तुतली वाणी बोलने वाले शिशु ( बालक-बालिकाएँ) खेल रहे हों, सुग्मे ( तोते तथा मैनाएँ कलरव कर रही हों, कमलानले के कंकण धारण की हुई तथा खिले हुए कमलों के समान उज्ज्वल मुखों वाली चल्ती-फिरती हुई कमलिनियों के सदृश नारियों ग्रीष्मकालजनित सुस्ती को दूर कर देती हैं ॥ ३८-४१ ॥

वक्तव्य —सम्पूर्ण ग्रीष्म ऋतु के वर्णन का सारांश यह है कि इन दिनों सभी प्रकार के आहार-विहार शीतल, सुगन्धित एवं मनोहर होने चाहिए। कालिदास ने इन दिनों को 'परिणामरमणीया दिवसाः' कहा है अर्थात् सायंकाल का समय ही इन दिनों सुहावना लगता है। इस वर्णन को देखकर यह विश्वास होता है कि हमारे पूर्वज बहुत ही सम्पन्न एवं रसिक थे, अन्यथा इस प्रकार चित्रण करना और ऐसे साधन जुटा पाना वाणी से भी अगम ही होते हैं।

आदानगलानवपुषामग्निः सन्नोऽपि सीदति। वर्षासु दोषैर्दुष्यन्ति तेषाम्बुलम्बाम्बुदेऽम्बरे ॥ ४२ ॥

सतुषारणे मरुता सहसा शीतलेन च। भूबाष्पेणाम्लपाकेन मलिनैन च वारिणा ॥ ४३ ॥

बहिर्नैव च मन्देन, तेष्वित्यन्योऽच्यदृषिषु। भजेत्साधारणं सर्वमूषणस्तेजं च यत् ॥ ४४ ॥

वर्षाऋतुचर्या —आदानकाल ( शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म ) के प्रभाव से दुर्बल शरीर वाले प्राणियों की पहले से ही मन्द हुई अग्नि ( जठराग्नि ) इस ( प्रावृट् एवं वर्षा ) ऋतु में वात आदि दोषों से और भी अधिक मन्द पड़ जाती है, क्योंकि उक्त वे दोष जल के भार से लटकते हुए बादलों द्वारा आकाश में छाये रहने पर तुषार युक्त अतएव शीतल वायु के स्पर्श से, पृथिवी में से निकलने वाली भाप के प्रभाव से, आहार के अस्मविकाप वाले होने से, इस काल में होने वाले मैले जल के प्रयोग से तथा जठराग्नि के मन्द पड़ जाने से ( वे दोष ) कुपित होकर आपस में एक-दूसरे को दूषित करने लगते हैं। ऐसी स्थिति हो जाने पर साधारण आहार-विहार, जो वात आदि दोषों का शमन करने वाला हो, साथ ही जठराग्निवर्धक हो, उसका सेवन करें ॥ ४२-४४ ॥