भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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ऋतुवर्षाध्यायः ३ ]

सूत्रस्थानम्

४९

आस्थापनं शुद्धतनुर्जीर्णं धान्यं रसात् कृतान् । जाङ्कलं पिशितं यूपान् मध्वरिष्टं चिरन्तनम् ॥ मस्तु सौवर्चल्लादयं वा पञ्चकोलावचूर्णितम् । दिव्यं कौपं श्रुतं चाम्भो भोजनं त्वतिदुर्वितं ॥ ४६ ॥

व्यक्तामल्लवणस्तेहं संशुष्कं क्षौद्रवल्लघु ।

शरीर-शुद्धि—इस ऋतु के आरम्भ में वमन-विरचन क्रियाओं द्वारा शरीरगत संचित दोषों का शोधन करके आस्थापन ( निरुहण ) बलित का सेवन करे । साधारण आहार—पहले खाये हुए भोजन के भलीभाँति बन जाने पर आगे निम्नोक्त पदार्थों का इन दिनों सेवन करें—पुराने जौ एवं रोहू आदि सुपच पदार्थों को बायें, अच्छी प्रकार पकाये गये तथा छोँके हुए मांसरस, हरिण आदि जांगलदेशीय प्राणियों का मांस, मूँग आदि दालों का जूस, पुराना मधु, पुराने आसव, अरिष्ट, मस्तु, सौवर्चल ( कालानमक ) युक्त अथवा पञ्चकोल ( पिपप्ली, पीपलामूल, चब्य, चीता, नागरमोथा ) के चूर्ण को मिलाकर उक्त मांसों, मांसरसों, जूसों तथा आसवों का सेवन करें ।

जल—इन दिनों वर्षा का स्वच्छ जल ( जो आकाश से बरसते समय स्वच्छ पात्र में संग्रह किया हो ), कुआँ का जल अथवा पकाकर शीतल किये हुए जल का सेवन करें ।

दुर्विन में—जिस दिन आकाश में अत्यन्त बादल छायेँ हों, उस दिन पर्याप्त मात्रा में खट्टे रस वाले पदार्थों, नमकीन पदार्थों तथा स्निग्ध पदार्थों के साथ सूखा चबैना का सेवन करे । ये पदार्थ लघु होते हैं, अतः शीघ्र पच जाते हैं ॥ ४५-४६ ॥

अपादचारी सुरभिः सततं धृषिताम्बरः ॥ ४७ ॥

हर्म्यपुष्के वसेद्वाष्पशीतशीकरवजिते ।

सेवनीय विहार—इन दिनों नंगे पैरों से गीली भूमि में तथा कीचड़ में नहीं चलना चाहिए । इन आदि सुगन्धिन पदार्थों का प्रयोग करता रहे, वस्त्रों में अगुहू आदि की धूप देता रहे । छत के ऊपर चारों ओर से खुले कमरे में निवास करे, जहाँ पृथिवी से निकलने वाली भाप न हो, सर्दी न हो तथा वर्षा की बौछारें न पहुँचती हों ॥ ४७ ॥

वक्तव्य—‘हर्म्यपुष्के’—हर्म्य का अर्थ है राजाओं या श्रीमानों अथवा धनिकों का निवासगृह, उसका ‘पुष्क’ अर्थात् ऊपरी भाग, जिसे संस्कृत में ‘अट्ट’ एवं हिन्दी में ‘अट्टालिका’ कहते हैं । यह ‘अट्ट’ या ‘अट्टालिका’ हवादार कमरा होता है । श्रीवाभट ने इसी को ‘हर्म्यपुष्के’ स्वीकारा है ।

नदीजलोदमन्याहःस्वप्नयासातपांस्त्यजेत् ॥ ४८ ॥

त्याज्य विहार—इन दिनों नदी या नद के जलों तथा पतला मठा या छोँछ को न पीयें । सत्तु का सेवन न करें, दिन में न सोयें, अधिक परिश्रम न करें और धूप ( घाम ) का सेवन न करें ॥ ४८ ॥

वक्तव्य—वर्षा ऋतु में नदीजल का सामान्य रूप से निषेध किया गया है । इसकी विशेष जानकारी के लिए आप प्राचीन मंहिताओं एवं परवर्ती निघण्टु-ग्रन्थों का अवलोकन कीजिये । भावप्रकाश-निघण्टु बारिर्वा ३२-३६ के अनन्तर भावमिश्र ने उसी प्रकरण में वृद्धसुश्रुत के वचनों को उद्धृत किया है उन्हें भी देखें—६५-६७ । ‘वर्षान्निदयमुदकानाम्’ ( च.सू. २५।३९ ) ।

‘अनुषोऽहितदेशानाम्’ ( च.सू. २५।४० )—चरक ने अहितकर देशों में अनुप देश की गणना की है । ध्यान रहे, वर्षा ऋतु में जाङ्कल देश तथा साधारण देश भी अनुपदेश का रूप धारण कर लेते हैं, अतः इन दिनों अत्यन्त सावधानी से रहकर अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखें । पहले तो कभी भी नंगे पैरों नहीं चलना चाहिए, फिर इन दिनों तो जूता पहनकर चले या सवारी से भ्रमण करें, अन्यथा ‘अलस’ नामक बुरादोग हो सकता है । देखें—सु.नि. १३।३२ ।

वर्षाशीतोचिताङ्कानां सहसेवाकैरभिमभिः । तप्तानां सञ्चितं बुष्टो पित्तं शरदि कुप्यति ॥ ४९ ॥ तज्जयाय घृतं तित्कं विरेको रक्तमांक्षणम् ।

४ अ० ३०