अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
शरद्-ऋतुचर्या —वर्षा ऋतु में पानी से भीगे हुए अतएव शीततायुक्त प्राणियों के शरीरों में पित्त का संचय क्रमशः होता रहता है। उसके बाद शरद् ऋतु के आ जाने पर एकाएक सूर्य की तेज किरणों द्वारा तपे हुए प्राणियों के शरीरों में वर्षाकाल में संचित हुआ पित्त इस समय कुपित हो जाता है। उस पर विजय पाने के लिए अर्थात् वह किसी प्रकार के पित्तजनित विकारों को पैदा न कर दें, इसके लिए तित्तघृत का सेवन तथा रक्तमोक्षण करना चाहिए॥ ४९ ॥
वक्तव्य —अ.हृ.वि. १९ में वर्णित तित्तघृत अथवा महातित्तघृत का सेवन करायें। चिकित्सक की अनुमति से विरेचन तथा रक्तमोक्षण भी करायें।
तित्तं स्वादु कषायं च क्षुधितोऽन्नं भजेत्तलघु॥ ५० ॥
शालिमुद्रसिताध्रात्रीपटोलमधुजाङ्गलम् ।
आहार-विधि —तित्त, मधुर तथा कसैले रस-प्रधान पदार्थों को आहारकाल में भूख लगने पर थोड़ी मात्रा में खायें। शालि के चावल, मूँग, मिथी या खाँड़, आंवला, परवल, मधु तथा जांगल प्राणियों के मांस या मांसरस का सेवन करें॥ ५० ॥
तप्तं तप्तांशुकिरणैः शीतं शीतांशुरश्मिभिः ॥ ५१ ॥
समत्तादयहोरात्रमगस्त्योदयनिर्विषम्। शुचि हंसोदकं नाम निर्मलं मलजिज्जलम् ॥ ५२ ॥
नाभिष्यन्दि न वा रुक्षं पानादिष्वमुतोपमम्।
हंसोदकसेवन-निर्देश —दिन में स्वाभाविक रूप से सूर्य की किरणों से तपा हुआ और रात्रि में चन्द्रमा की किरणों से शीतल अर्थात् सूर्य एवं चन्द्र की किरणों से मुसेवित तथा अगस्त्य तारा के उदय हो जाने से निर्विष ( दोषरहित ) अतएव पवित्र, निर्मल एवं दोषनाशक जल को 'हंसोदक' कहते हैं। यह जल अभिष्यन्दकारक नहीं होता और न हृद्य ही होता है। यह अमृत के समान गुणों वाला जल पीने योग्य होता है॥ ५१-५२ ॥
वक्तव्य —'वर्षामु चौयते पित्तं शरतुकाले प्रकृष्यति'। 'हंसोदक' को ही भावमिश्र ने 'अंशुदक' कहा है। इसका वर्णन भा.प्र.वारिवर्ग ६२-६३ में देखें।
चन्दनोशीरकपूरमुक्ताघ्रवसनोज्ज्वलः ॥ ५३ ॥
सौधेषु सौधधवलं चन्द्रिकां रजनीमुखे।
विहार-विधि —रजनीमुख ( रात्रि होने के बाद एक-दो घण्टा तक आरम्भ ) में चन्दन, खस तथा कपूर का लेप लगाकर ( इन द्रव्यों का अलग-अलग या एक साथ भी लेप बनाया जा सकता है), मोतियों की माला धारण कर, साफ-सुथरे बस्त्र पहन कर, चूना से पुते हुए भवन की ऊपरी छत पर बैठकर चूना के सद्गुण उज्ज्वल चाँदनी का सेवन करें॥ ५३ ॥
वक्तव्य —सायंकाल छत में बैठकर चाँदनी का सेवन करें। यह लाभ पूर्णिमा के आस-पास की कुछ ही रात्रियों में मिल सकता है, शेष दिनों सायंकालीन हवा का सेवन करें। 'रजनीमुखे' शब्द का तात्पर्य है कि रात होते ही एक-दो घण्टा तक छत पर बैठने का सुख लिया जा सकता है, उसके बाद ओस गिरने लगती है। यह हानिकारक होती है, इसका सेवन न करें।
तुषारक्षारसौहित्यदधितैलवसातपान् ॥ ५४ ॥
तीक्ष्णमद्यदिवास्वनपुरोवातान् परित्यजेत्।
अपथ्य-निषेध —इस ऋतु में निम्नलिखित दस वस्तुओं का सेवन न करें, ये अपथ्य होते हैं—१. ओस, २. क्षार पदार्थ, ३. भरपेट भोजन करना, ४. दही, ५. तेल, ६. वसा ( प्राणिज स्नेह के द्वारा पकाये गये पदार्थ), ७. तेजधूप ( घाम ), ८. तीक्ष्ण मद्य, ९. दिन में सोना तथा १०. पूरब की ओर से बहने वाली वायु॥ ५४ ॥