भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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आयुष्कामीयाध्यायः १ ]

सूत्रस्थानम्

१५

शार्ङ्गधराचार्य ने विपाक का परिचय इस प्रकार दिया है—'जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्। रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः' ॥ (शा.पू.खं.द्वि. ३३) अर्थात् मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है, वह 'विपाक' कहा जाता है। आयुर्वेदशास्त्र में रस-गुण-वीर्य-विपाक का विपुल साहित्य है, फिर भी आप देखें—यह 'सम्यक् विपाक' हुआ है या 'मिथ्या विपाक', तभी आप ठीक निष्कर्ष पर पहुँच पायेंगे। फिर भी आप निम्न सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य करें—च.सू. २६।५७-५८। च.सू. २६।६१-६२। सु.सू. ४०।१०-१२। च.चि. १५।९-११। शा.प्र.ख. ६।१-२।

गुरुमन्दहिमस्निग्धश्लक्ष्णसान्द्रमुदुस्थिराः। गुणाः ससूक्ष्मविशदा विशतिः सविपर्यायाः ॥ १८ ॥

द्रव्य के गुणों का वर्णन —द्रव्यों में परस्पर विपरीत ये २० गुण पाये जाते हैं—१. गुरु, २. लघु, ३. मन्द, ४. तीक्ष्ण, ५. शीत, ६. उष्ण, ७. स्निग्ध, ८. रुक्ष, ९. श्लक्ष्ण, १०. खर, ११. सान्द्र, १२. द्रव, १३. मुदु, १४. कठिन, १५. स्थिर, १६. सर, १७. सूक्ष्म, १८. रु, १९. विशद और २०. पिच्छल ॥ १८ ॥

वक्तव्य —अ.हृ.नि. ६।१ में मद्य के १० गुण और इनके विपरीत १० ओजस् के जो गुण गिनाये हैं, वे भी ये ही २० गुण हैं। चरक ने दूध के दस गुण गिनाकर यह बतलाया है कि जो गुण दूध के कहे गये हैं वे गुण ओजस् के भी हैं, अतएव दूध को पीने से ओजोगुण की वृद्धि होती है। चरक ने जो दिव्य जल के ६ गुणों का वर्णन च.सू. २७।१९८ में किया है, यदि हम इन्हें मानते हैं तो फिर गुणों की संख्या २० ही कैसे मानी जा सकती है? इसका समाधान इस प्रकार है—ये जो ६ अतिरिक्त गुणों का वर्णन यहाँ किया गया है, इनका अन्तर्भाव उक्त २० गुणों में ही कर लिया जाता है।

ध्यान दें —व्यवाधि, विकाशी, आशुकारी ये गुण मद्य में कहे गये हैं और 'प्रसन्न' नामक गुण दूध में। फिर यह भी कहा गया है कि मद्य के गुणों से विपरीत गुण ओजस् में होते हैं। साथ ही फिर यह भी कहा गया है कि जो गुण ओजस् में होते हैं वे ही गुण दूध में होते हैं। इन विषयों का समन्वय इस प्रकार किया गया है—व्यवायी गुण का अन्तर्भाव द्रव गुण में, विकाशी का खर में, आशुकारी का चल में और प्रसन्न का स्थूल में। इनका समर्थन चरक तथा सुश्रुत के वचनों द्वारा प्राप्त है।

उक्त २० गुणों के अर्थ

१. गुरु = भारी६. उष्ण = गरम११. सान्द्र = गाढ़ा१६. सर = चल
२. लघु = हल्का७. स्निग्ध = चिकना१२. द्रव = पतला१७. सूक्ष्म = बारीक
३. मन्द = चिरकारी८. रुक्ष = रुखा१३. मुदु = कोमल१८. स्थूल = मोटा
४. तीक्ष्ण = तीखा९. श्लक्ष्ण = साफ१४. कठिन = कठोर१९. विशद = टूटने वाला
५. शीत = शीतल१०. खर = खुरदरा१५. स्थिर = अचल२०. पिच्छल = लसीला

विशेष —३. मन्द—जो न शीघ्र हानि करता हो और न लाभ करता हो। ४. तीक्ष्ण—शीघ्र लाभ या हानि करने वाला। १६. सर—फैलने वाला या गतिशील। १७. सूक्ष्म—छोटे-से-छोटे स्रोतों में प्रवेश करने वाला। २०. पिच्छल—लुआबदार।

कालार्थकर्मणों योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः। सम्यग्योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्येककारणम् ॥ १९ ॥

रोग एवं आरोग्य के कारण —काल, अर्थ तथा कर्म के हीनयोग, मिथ्यायोग एवं अतियोग रोग या रोगों की उत्पत्ति में एक मात्र कारण होते हैं तथा काल, अर्थ और कर्म का सम्यक् योग आरोग्य (स्वस्थ रहने) का एक मात्र कारण होता है ॥ १९ ॥