अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
—वसा तु सन्ध्यस्थिमर्मकोच्छरुजासु च। तथा दग्धाहृतघ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि ॥ ११ ॥
वसास्नेह का प्रयोगक्षेत्र—जिसकी सन्धियों ( जोड़ों ), अस्थियों, मर्मों में अथवा कोष्ठ ( आमाशय, पक्वाशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय तथा उण्डुक ) में पीड़ा हो रही हो; जो आग से जल गया हो; जो किसी प्रकार के आघात से प्रताड़ित हो, जिसकी योनि ( गर्भाशय ) खिसक कर बाहर आ गयी हो; इसी को योनिघ्रंश भी कहते हैं और जिसके कान एवं सिर में पीड़ा हो उनके लिए वसा का सेवन अधिक लाभदायक होता है ॥ ११ ॥
तैलं प्रावृषि, वर्षान्ते सर्पिरन्यो तु माधवे।
ऋतुभेद से स्नेहन-निर्देश—प्रावृद्ध ऋतु ( आषाढ़-श्रावण ) में तैल का, शरद् ऋतु में घी का और वसन्त ऋतु में वसा तथा मज्जा का सेवन करना चाहिए।
ऋतौ साधारणे स्नेहः शस्तोऽह्वि विमले रवौ ॥ १२ ॥
दिन में स्नेहसेवन-निर्देश—साधारण ऋतुओं में अर्थात् जिन दिनों जाड़ा, गर्मी, वर्षा सामान्य हो ऐसे दिनों में जब सूर्य का प्रकाश स्वच्छ हो तब दिन में स्नेह का प्रयोग करे ॥ १२ ॥
तैलं त्वरायां शीतेऽपि—
शीतकाल में तैल-प्रयोग—यदि चिकित्सा के लिए किसी स्नेहपान की आवश्यकता हो तो अन्य कालों के साथ शीतकाल में भी तैल का प्रयोग किया जा सकता है।
—घर्मैऽपि च घृतं निशि।
रात्रि में घृतपान-विधान—यदि गर्मी के दिनों में तत्काल स्नेहपान कराने की आवश्यकता हो तो रात में भी घृतपान किया जा सकता है।
निश्येव पिते पवने संसर्गे पित्तवत्यपि ॥ १३ ॥
कारण-भेद से रात्रि में घृतपान—न केवल गर्मियों में ही रात को घृतपान करना चाहिए अपितु पित्त के प्रकृपित होने से उत्पन्न पित्तज विकारों में तथा वात के प्रकृपित होने से वातज विकारों में यदि वह स्नेहास्य हो तो रात में भी घृतपान कराया जा सकता है ॥ १३ ॥
निश्यन्थया वातकफाद्रोगाः स्युः पित्तो दिवा।
स्नेहसेवन-विचार—ऊपरनिर्दिष्ट घृत-तैल सेवनकालों के विपरीत शीतकाल की रात्रियों में घृतपान करने से वातज तथा कफज रोग हो सकते हैं और उष्णकाल के दिनों में तैलपान करने से पित्तज विकार हो सकते हैं।
वक्तव्य—घृत अथवा तैलपान कराते समय रोगी की प्रकृति, देश, काल आदि का भी विचार कर लें।
युक्त्याऽवचारयेत्तनेहं भक्ष्याद्यक्षेन बस्तिभिः ॥ १४ ॥
नस्याभ्यजनगण्डूषमूर्द्धकर्णाक्षितर्पणेः ।
स्नेहसेवन की युक्ति—स्नेह का सेवन युक्ति से ( मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष तथा स्वभाव का विचार करके ) करना चाहिए।
स्नेहसेवन-प्रकार—भक्ष्य, भोज्य, लैह्य अथवा पेय चतुर्विध आहार के साथ करें या उसमें मिलाकर करें। तीन प्रकार की बस्तियों ( निरुह, अनुवासन तथा उत्तर बस्ति ) का प्रयोग करें। नस्य, अस्थेग, गण्डूष, शिरोबस्ति, कर्णपूर्ण तथा अक्षितर्पण के रूप में करें ॥ १४ ॥
रसभेदैककत्वाभ्यां चतुःषष्टिर्विचाराणाः ॥ १५ ॥
स्नेहस्यान्याभिभूतत्वादल्पत्वाच्च क्रमात्समुताः।