भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

स्नेहविधिरध्याय: १६ ] सूत्रस्थानम्‌ २०७

स्नेह की विचारणाएँ---उपर्यक्त भेदों के अनुसार स्नेह की विचारणाएँ चौंसठ प्रकार की स्वीकार

की गयी है। अ.ह.सू. अध्याय १० में मधुर आदि रसों के जो ६३ भेद बतलाये गये हैं, उन एक-एक

रसभेद के साथ स्नेह को मिलाकर सेवन करने से स्नेह की भी ६३ प्रविचारणाएँ तो हो जाती हैं। नस्य

अथवा अभ्यंग में प्रयुक्त शुद्ध स्नेह का एक भेद और जोड़ देने से इसके ६४ भेद हो जाते हैं। दूसरे विद्वान्‌

बस्ति आदि में प्रयुक्त स्नेह का एक भेद मानते हैं॥ १५॥

वक्तव्य--- प्रविचचारणा' को कल्पनापूर्वक भेद कहा है। आचार्य चक्रपाणि ने इस पद की व्याख्या

इस प्रकार की है--- 'प्रविचार्यते अवचार्यते अनुकल्पेन उपयुज्यते अनयेति प्रविचारणा: ओदनादय: । ( च.सू.

१३।२५ की टीका में ) इस प्रसंग में चक्रपाणि का यह विचार युक्तिसंगत प्रतीत होता है। यही कारण है

कि चरक ने २४ प्रकार की प्रविचारणाओं को ही स्वीकार किया है, न कि ६४ प्रकार की, अस्तु।

यथोक्तहेत्वभावाज्च नाच्छपेयो विचारणा। १६॥

विचारणा---ऊपर कहे गये कारणों के न होने से अच्छपेय ( केवल स्नेहपान या शुद्ध स्नेहपान )

को विचारणा नहीं कहा गया है। १६॥

स्नेहस्य कल्पः स श्रेष्ठः स्नेहकर्मा शुसाधनात्‌ ।

अच्छपेय के लाभ---इस प्रकार के अच्छपेय को स्नेहपान का उत्तम कल्प माना जाता है, क्योंकि

इस विधि से किया गया स्नेहपान शीघ्र ही शरीर को स्निग्ध ( स्नेहगुणसम्पन्न ) कर देता है।

वक्तव्य---भोजन में मिलाकर सेवन किया गया स्नेह प्रायः मल के साथ निकल जाता है, इसका

आप भी स्वयं अनुभव करें। इसके विपरीत अच्छपेय में प्रयुक्त स्नेह पच जाता है। इसका प्रयोग करने

के पहले यह देख लें कि जिसे स्नेहपान कराया जा रहा है, उसकी जठराग्नि प्रदीप्त है या नहीं, क्योंकि

मन्दाग्नि वाले व्यक्ति को इसका प्रयोग न करायें। भगवान्‌ पुनर्वसु ने अच्छपेय की उत्तम मात्रा की इस

प्रकार प्रशंसा की है---तस्या:****चेतसाम्‌!। ( च.सू. १३।३३-३४ ) उत्तम मात्रा के गुण--विधिपूर्वक

सेवन की गयी स्नेह की यह मात्रा शीघ्र ही रोगों को शान्त करती है। यह तीनों रोगमार्गों में जाती हुई

वहाँ के दोषों को नष्ट करती है। यह बल को बढ़ाती है और शरीर, इन्द्रियों एवं मन को पुनः ताजा

कर देती है। अतएव इसे दोषानुकर्षिणी' कहा है।

द्वाभ्यां चतुर्भिरष्टाभियामिर्जीर्यन्ति या: क्रमात्‌।। १७॥

हृस्वमध्योत्तमा मात्रास्तास्ताभ्यश्व ह्सीयसीम्‌। कल्पयेद्वी क्ष्य दोषादीन्‌ प्रागेव तु हुसीयसीम ।।

स्नेहमात्रा-विचार---स्नेहपान की मात्रा तीन प्रकार की होती है--- १. लघु, २. मध्यम तथा ३. उत्तम |

स्नेह की जो मात्रा दो पहर (६ घण्टे ) तक में पच जाती है, उसे ह्ृस्व या लघु मात्रा कहते हैं। जो

चार पहर (१२ घण्टे ) तक में पचती है, उसे मध्यम कहते हैं और जो मात्रा आठ पहर (२४ घण्टे )

तक में पचती है, उसे उत्तम मात्रा कहते हैं।

चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह दोष, देश तथा काल आदि का विचार कर उक्त तीनों मात्राओं

से भी छोटी एक मात्रा की कल्पना करके पहले सबसे छोटी उस मात्रा का प्रयोग करे || १७-१८॥

वक्तव्य--इस अल्पमात्रा के औचित्य का विचार करते हुए वृद्धवाग्भट इसके सम्बन्ध में कहते हैं---

अआ.सं.सू. २५।२३, २५।

हास्तने जीर्ण एवान्ने स्नेहो5चछः: शुद्धये बहुः।

शोधनार्थ स्नेहमात्रा---संशोधन-चिकित्सा के लिए अच्छस्नेह की उत्तम मात्रा का प्रयोग उस समय

करे, जब कल का खाया हुआ भोजन भलीभाँति पच गया हो।