भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

शमनः क्षुद्रतोऽनन्तो मध्यमात्रश्च शस्यते ॥ ११ ॥

शमनार्थ स्नेहमात्रा—शमन-चिकित्सा के लिए अच्छेसे की मध्यम मात्रा का प्रयोग उस समय करे जब भलीभाँति भूख लगी हो। इसे अन्न के साथ कभी न लें ॥ ११ ॥

बृंहणो रसमद्याद्यैः सभक्तोऽल्पः—

बृंहणार्थ स्नेहपान-विधि—इसका प्रयोग शरीर को पुष्ट करने के लिए इस प्रकार किया जाता है—स्नेह की थोड़ी मात्रा को मांसरस में मिलाकर सेवन करे और उसके बाद नियमानुसार मद्यपान करे।

—हितः स च। बालवृद्धपिपासार्तस्तेहृद्भिन्मद्यशीलिषु ॥ २० ॥

स्त्रीस्तेहनित्यमन्दाप्रिसुखितकलेशभीरुषु। मृदुकोष्ठात्पदोषेषु काले चोष्णे कृशेषु च ॥ २१ ॥

बृंहण स्नेहपान के योग्य व्यक्ति—यह अल्पमात्रा में प्रयुक्त बृंहण स्नेहपान बालक, वृद्ध, प्यास से पीड़ित, स्नेहपान न करना चाहने वाले, सदा मद्यपान करने वाले, स्त्री-सहवास करने वाले, प्रतिदिन भोजन के साथ स्नेह का सेवन करने वाले, मन्दाग्नि वाले, सुखी जीवन बिताने वाले, कलेश (कष्ट) से डरने वाले, मृदुकोष्ठ वाले अर्थात् जिन्हें सामान्य विरक्त पदार्थों से भी विरक्त हो जाता है, अल्पदोषों वाले तथा कुश पुरुषों के लिए और उष्णकाल में सबके लिए हितकर होता है ॥ २०-२१ ॥

वक्तव्य—स्नेहपान या स्नेहसेवन विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. बृंहणस्नेह, २. शमनस्नेह तथा ३. शोधनस्नेह। यद्यपि इनका आशय नाम मात्र से स्पष्ट हो जाता है, फिर भी संक्षेप में यहाँ तीनों का परिचय प्रस्तुत है—१. बृंहणस्नेह का वर्णन ऊपर दिये गये २०-२१ श्लोकों में है, वैसे भी प्रतिदिन दाल में डालकर, रोटियों में चुपड़कर, दाल, शाक आदि को छौंककर जो अल्पमात्रा में स्नेह का प्रयोग होता है, वह बृंहणस्नेह है। २. शमनस्नेह उसे कहते हैं, जो दोषों को शान्त करने के लिए प्रयुक्त होता है और ३. शोधनस्नेह उसे कहते हैं, जिसका प्रयोग दोषों को निकालने के लिए किया जाता है।

प्राइमध्योत्तरभक्तोऽसावधोमध्योर्ध्वदेहजान्। व्याधीजयेद्दलं कुर्यादङ्गानां च यथाक्रमम् ॥ २२ ॥

स्नेहसेवन का प्रभाव—उक्त त्रिविध स्नेहमात्रा भोजन के पहले खाने या पीने से शरीर के निचले भाग के रोगों को, भोजन के बीच में खाने-पीने से शरीर के मध्यभाग के रोगों को और भोजन के अन्त में खाने-पीने से शरीर के ऊपरी भाग के रोगों को नष्ट करता है तथा उन्हीं अवयवों को बलवान् भी करता है ॥ २२ ॥

वार्युणमच्छनु पिबेत् स्नेहे तत्सुखपत्तये। आत्म्योपलेपशुद्धये च, तीवराच्छक्रे न तु ॥ २३ ॥

जीर्णाजीर्णविशुद्ध्यां पुनरुष्णोदकं पिबेत्। तेनोद्भारविशुद्धिः स्यात्तत्तश्च लघुता रुचिः ॥ २४ ॥

विविध स्नेहों के अनुपान—अच्छस्नेह का सेवन करने के बाद अनुपान के रूप में उष्ण जल पीना चाहिए। ऐसा करने से वह स्नेह सुख से पच जाता है तथा इससे स्नेहपान के कारण मुख में होने वाली बिपचिपाहट भी दूर हो जाती है। किन्तु उक्त उष्णजलपान का नियम तुरक (चाल्मोगरा) तथा भिलावा के स्नेह का सेवन करने में नहीं करें अर्थात् इनका सेवन करने के बाद अनुपान के रूप में शीतल जल पीना चाहिए। यदि सेवन किया गया स्नेह पचा या नहीं पचा ऐसी शंका हो तो बाद में फिर उष्णजल पीने के लिए दिया जा सकता है। इस प्रकार गरम पानी पीने से शुद्ध (निर्दोष) डकार आते हैं, शरीर में हलकापन तथा भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है ॥ २३-२४ ॥

वक्तव्य—सुप्रसिद्ध वातनाशक एवं विरक्त एरण्डतेल का अनुपान भी उष्ण जल या गरम दूध ही माना गया है। इसके विपरीत घी-तेल में बने पकवानों को खाने के बाद जो प्यास लगती है, उसमें शीतल जल का ही सेवन करना चाहिए।

भोज्योऽन्नं मात्रया पास्यन् श्वः पिबन् पीतवानपि। द्रवोष्णमनभिष्यन्ति नातिस्निग्धमसङ्करम् ॥

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