अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहविधिरध्यायः १६ ]
सूत्रस्थानम्
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स्नेहपानार्थ आहार-विचार—जब कल स्नेहपान कराना हो तो उसके एक दिन पहले, जिस दिन स्नेहपान किया जाय उस दिन और स्नेहपान करने के एक दिन बाद भी ऐसा भोजन करना चाहिए जो उचित मात्रा में हो, अधिक पतला, अधिक गरम तथा जो अभिप्यन्दी न हो, अधिक स्नेहमिश्रित न हो और अनेक प्रकार का मिला हुआ भोजन नहीं करना चाहिए ॥ २५ ॥
उष्णोदकोपचारी स्यादब्रह्मचारी क्षपशयः । न वेगरोधी व्यायामक्रोधशोकहिमातपान् ॥ २६ ॥ प्रवातयानयानाध्वभाष्यात्यासनसंस्थितीः । नीचात्युच्चोपधानाहःस्वप्नधूमरजांसि च ॥ २७ ॥ यान्यहानि पिबेत्तानि तावन्त्ययान्यपि त्यजेत् ।
स्नेहपानार्थ विहार-विचार—जितने दिनों तक स्नेहपान किया जाय उतने दिनों में और उतने ही अगले दिनों में स्नान करने में, पीने में तथा अन्य व.यों में भी गरम पानी का ही प्रयोग करना चाहिए, वह ब्रह्मचारी रहे, रात्रि में ही शयन करे, मल-मूत्र आदि के वेगों को न रोके, व्यायाम, क्रोध, शोक, शीत, धूप ( घाम ), झोंके की हवा, ऊटपटांग सवारियों में बैठकर यात्रा न करे, न अधिक रास्ता चले, अधिक भाषण न करे, अधिक न बैठे, अधिक देर तक खड़ा न रहे, अधिक नीचा या अधिक ऊँचा सिरहाना न रखे, दिन में सोना, धुआँ, धूलि में रहना या साँस लेना छोड़ दें ॥ २६-२७ ॥
सर्वकर्मस्वयं प्रायो व्याधिक्षीणेषु च क्रमः ॥ २८ ॥
सर्वत्र त्याज्य कर्म—ऊपर कहे गये आहार-विहारों को न केवल स्नेहपान में ही अपितु स्वेदन, वमन, विरेचन आदि में भी छोड़ देना चाहिए और यही क्रम व्याधिशीलों ( रोग के कारण जो कुश हो गये हों उन ) में भी त्यागने का ध्यान रखना चाहिए ॥ २८ ॥
उपचारस्तु शमने कार्यः स्नेहे विरिक्तवत् ।
शमन-स्नेहपान में उपचार—शमनस्नेह के सेवनकाल में जिसे विरेचन करा दिया गया हो, उसके समान उपचार ( आहार-विहार ) करना चाहिए। इसे देखें—आगे अ.हृ.सू. १८१८-२९ में।
व्यहमच्छं मृदौ कोष्ठे क्रूरे सप्तदिनं पिबेत् ॥ २९ ॥
सम्यक्स्निग्धोऽथवा यावदतः सात्य्योभवेत् परम् ।
स्नेहपान की अवधि—मृदुकोष्ठ वाले व्यक्ति को अच्छेस्नेह का सेवन तीन दिन तक करना चाहिए और क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्ति को ( अच्छेस्नेह का सेवन ) सात दिन तक करना चाहिए। अथवा जब तक कोष्ठ भलीभाँति स्निग्ध न हो जाय तब तक पीना चाहिए। उसके बाद भी स्नेहपान करते रहने पर उसका स्नेहन सम्बन्धी लाभ नहीं मिलता, क्योंकि उसके बाद वह सात्य्य ( अभ्यस्त ) हो जाता है ॥ २९ ॥
बक्तव्य—सुश्रुत ने स्नेहपान की अवधि का वर्णन इस प्रकार किया है—'पिबेत्ः...सेवितः' । ( मु.वि. ३१।३६ ) अर्थात् स्नेह को तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन, छः दिन, अधिक-से-अधिक सात दिन तक सेवन करना चाहिए। इसके आगे सेवन किया गया स्नेह सात्य्य हो जाता है। यही मत भगवान् पुनर्वसु का भी है—'स्नेहस्य'...रात्रकौ' ॥ ( च.सू. १३।५१ )
वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ॥ ३० ॥
स्नेहोद्देशः कलमः सम्यक्स्निग्धे, रुक्षे विपर्ययः । अतिसिन्ध्रे तु पाण्डुत्वं प्राणवक्त्रगुदघ्नवाः ॥
सम्यक् स्निग्ध पुरुष के लक्षण—वातदोष की अनुकूलता, जठराग्नि का प्रदीप्त हो जाना, मल का स्निग्ध हो जाना, मल की गोलों का ढीला पड़ जाना, स्नेहपान के प्रति रुचि का होना तथा मन में थकवाट की प्रतीति का होना—ये लक्षण होते हैं।
रुक्ष रहने ( सम्यक् स्निग्ध न होने ) पर उसके विपरीत लक्षण देखे जाते हैं।
१४ अ० हू०