भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

अतिस्निग्ध के लक्षण—शरीर में पीलापन का होना, नासिका, मुख तथा गुदद्वार से घ्राव का होना ये लक्षण होते हैं। इस घ्राव में उक्त अवयव के मलों के साथ स्नेह भी निकलता है॥ ३०-३१॥

अमात्रयाऽहितोऽकाले मिथ्याहारविहारतः। स्नेहः करोति शोफाशैस्तन्द्रास्तम्भविसंज्ञताः॥

कण्डुकुच्छ्वरोत्क्लेशशूलानाहप्रमादिकान् ।

मिथ्या स्निग्ध के लक्षण—किसको कितनी स्नेहमात्रा देनी चाहिए, इसका विचार किये बिना प्रयुक्त स्नेह, जो जिसके लिए निषिद्ध स्नेह है उसका सेवन करने से, अकाल में (किसको ग्रीष्मकाल में, किसको शीतकाल में कौन-सा स्नेहपान करना चाहिए, इसका विवरण इसी अध्याय में पहले दिया जा चुका है), मिथ्या आहार-विहार करने पर सेवन किया गया स्नेहपान—शोथ, अर्श (बवासीर), हृदयस्तम्भ, बेहोशी, कण्ठ (खुजली), कुष्ठरोग, ज्वर, मिचली, शूल, आनाह, भ्रम, बलक्षय, जड़ता, स्वरभेद आदि अष्टांगसंग्रह में कहे गये रोगों को उत्पन्न कर देता है। इसी को 'स्नेहव्यापद' कहते हैं॥ ३२॥

क्षुत्तुष्णोल्लेखनस्वेदरूक्षपातान्नभेषजम् ॥ ३३ ॥

तक्रारिष्टखलोहालयवश्यामाककोद्रवम् । पिप्पलीत्रिफलाक्षौद्रपथ्यागोमूत्रगुग्गुलु॥ ३४॥

यथास्वं प्रतिरोगं च स्नेहव्यापदि साधनम्।

स्नेहव्यापद की चिकित्सा—भूखा रहना, प्यासा रहना, उल्लेखन (वमन कराना), स्वेदन, रूक्षपान, रूक्ष भोजन तथा रूक्ष औषधद्रव्यों का सेवन, तक्र (मठा) एवं विविध प्रकार के अरिष्टों को पीना, तिल अथवा सरसों की खली का सेवन, जौ, सावों, कोदों, पिप्पली, त्रिफला, शहद, हरड, गोमूत्र, गुग्गुल आदि का श्लोक ३२ में कहे गये रोगों के अनुसार उक्त औषध-द्रव्यों का स्नेहव्यापदरोग में प्रयोग करना चाहिए॥ ३३-३४॥

वक्तव्य—अतिमात्रा में प्रयुक्त स्नेह के कारण उत्पन्न रोगों की यह रूक्षण चिकित्सा अथवा 'निदानपरिवर्जन-चिकित्सा' है।

विरूक्षणं लङ्घनवक्तुतातिकृतलक्षणम्॥ ३५॥

विरूक्षण-निर्देश—ऊपर कहे गये उपचारों द्वारा जब शरीर में रूक्षता उत्पन्न होती है, तो चिकित्सक को ध्यान देना चाहिए। इसमें भी लंघन के समान कृत (मुयोग) तथा अतिकृत (अतियोग) के लक्षण देखे जाते हैं॥ ३५॥

वक्तव्य—लंघन के मुयोग तथा अतियोग के लक्षणों के लिए देखें—अ.ह.सू. १४।

स्निग्धद्रवोष्णधन्वोत्प्लवसभक् स्वेदमाचरेत्। स्निग्धस्थं स्थितः कुर्याद्विरेकं, वमनं पुनः॥ ३६॥

एकाहं दिनमत्यच्च कफमुत्क्लेश्य तत्करैः।

स्वेदन आदि के प्रयोग—सम्यक् स्नेहन होने के बाद स्वेदन कराना चाहिए। स्वेदन कराते समय स्नेहयुक्त, द्रव एवं उष्ण आहार का तथा जांगलदेशीय मृग आदि प्राणियों के मांसरस का सेवन उस व्यक्ति को कराना चाहिए। स्नेहन कराने के तीन दिन बाद विरेचन कराना चाहिए। विरेचन कराने के एक दिन बाद अर्थात् एक दिन रुककर अगले दिन उस व्यक्ति को तिल, माष आदि से निर्मित कफकारक पेया आदि पिलाकर कफ को उभाड़ कर तब वमन कराना चाहिए, जिससे कफ का निर्हरण हो जाय॥ ३६॥

मांसला मेदुरा भूरिन्म्लेष्माणो विषमाद्ययः॥ ३७॥

स्नेहोचिताश्च ये स्नेहास्तान् पूर्वं रूक्षयेततः। संस्नेहा शोधयेदेवं स्नेहव्यापन्न जायते॥ ३८॥

स्नेहन के पूर्व रूक्षण-विधि—जो मनुष्य मांसल (मोटे) हों, जो मेदस्वी हों अर्थात् जिनका मेदोधातु बढ़ा हो, जो अधिक कफ वाले हों, जिनकी जठराग्नि विषम हो और जिन्हें स्नेह माल्य हो ऐसे पुरुषों को यदि स्नेहन कराना हो तो इन्हें पहले रूक्षण-प्रयोग कराये और रूक्षण-विधि के सम्पन्न हो जाने पर