अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहविधिरध्यायः १६ ]
सूत्रस्थानम्
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तब इन्हें स्नेहन दें और उसके बाद संशोधन ( वमन या विरंचन ) करायें। इस प्रकार करने से उक्त प्रकार के व्यक्तियों में भी स्नेहव्यापद ( स्नेहसेवन के कारण होने वाले रोग ) नहीं होते ॥ ३७-३८ ॥
अलं मलानीरयितुं स्नेहश्चासात्यतां गतः।
असात्यम् स्नेह की शक्ति—असात्यता को प्राप्त स्नेह ही मलों को अपने स्थान से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करने में समर्थ हो जाता है।
बालवृद्धादिषु स्नेहपरिहारासहिष्णुषु ॥ ३९ ॥
योगानिमाननुद्रेगान् सद्यःस्नेहान् प्रयोजयेत्।
सद्यःस्नेहन का निर्देश—बालक, वृद्ध तथा सुकुमार आदि जो स्नेहविधि के प्रयोगकाल में परिहार ( छोड़ने योग्य—शीतल जलपान ) को सहन न कर सकें, उन्हें इन नीचे कहे गये योगों का प्रयोग कराना चाहिए, क्योंकि ये योग सद्यः ( तत्काल ) स्नेहन भी करते हैं और इनके सेवन से किसी प्रकार की घबड़ाहट भी नहीं होती है ॥ ३९ ॥
प्राज्यमांसरसास्तेषु, पेया वा स्नेहर्भजिता ॥ ४० ॥
तिलचूर्णश्च सस्नेहफणिः, कुशरा तथा। क्षीरपेया घृतादघोष्णा, दध्नो वा सगुडः सरः ॥ ४१ ॥
पेया च पञ्चप्रसूता स्नेहेस्तण्डुलपञ्चमैः। सप्तैते स्नेहनाः सद्यः, स्नेहाश्च लवणोत्वर्णाः ॥ ४२ ॥
सात सद्यःस्नेहन योग— १. अधिक घी मिला हुआ मांसरस, २. अधिक घी डालकर छोँकी गयी पेया, ३. तिलचूर्ण ( कक्क ) तथा राब्र घी मिला हुआ, ४. घी डाली गयी खिचड़ी, ५. घी डाली गयी गरम खीर, ६. गुड़ मिलायी गयी दही की मलाई और ७. घी, तेल, वसा, मज्जा एवं चावल ये प्रत्येक एक-एक प्रसूत अर्थात् दो-दो पल ( १ प्रसूत = दो पल = ८ तोला ) मिलाकर पकायी गयी पेया—ये सात योग सद्यः ( शीघ्र ही ) स्नेहन कराने वाले हैं। इन सभी स्नेहों में पर्याप्त लवण मिलाकर देना चाहिए ॥ ४०-४२ ॥
तद्वद्यभिष्यन्चारूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवधि च।
लवण के गुण—वह लवण अभिष्यन्दी है, रुक्षतारहित है अतएव स्निग्ध है, सूक्ष्म है, उष्ण है तथा व्यवयी ( सम्पूर्ण शरीर में फैलने वाला ) होता है।
गुडानूपमिषक्षीरतिलमाषसुरादधि ॥ ४३ ॥
कुष्ठशोफप्रमेहेषु स्नेहार्यं न प्रकल्पयेत्।
स्नेहन-योगों का नियम—गुड़, अनुपदेशज प्राणियों का मांस, दूध, तिल, उड़द द्वारा निर्मित बड़े आदि खाद्य पदार्थ, सुरा और दही—ये पदार्थ स्नेहन में कारण होते हैं। इनका प्रयोग कुष्ठरोग, शोथरोग तथा प्रमेहरोग में स्नेहन करने के लिए नहीं कराना चाहिए ॥ ४३ ॥
त्रिफलापिप्पलीपथ्यागुग्गुल्वादिविपाचितान् ॥ ४४ ॥
स्नेहान् यथास्वमेतेषां योजयेदविकारिणः।
कुष्ठादि के योग्य स्नेह—इन उपर्युक्त कुष्ठ आदि रोगों में स्नेहन के लिए त्रिफला, पिप्पली, हरीतकी तथा गुग्गुलु आदि के संयोग से पकाये गये स्नेहों का प्रयोग करें। क्योंकि ये स्नेह उक्त रोगों में हानिकारक नहीं होते ॥ ४४ ॥
क्षीणानां त्वामयेरश्विदेहसन्धुक्षणक्षमान् ॥ ४५ ॥
क्षीण पुरुषों के योग्य स्नेह—जीर्णज्वर आदि रोगों के कारण क्षीण हुए पुरुषों को स्नेहन देने के लिए उन स्नेहों का प्रयोग करना चाहिए जो स्नेह जठराग्नि को प्रदीप्त करने तथा शरीर को पुष्ट करने में समर्थ हों ॥ ४५ ॥