भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदय

दीप्तान्तराग्निः परिशुद्धकोष्ठः प्रत्यग्रधातुर्बलवर्णयुक्तः । दृढेन्द्रियो मन्दजरः शतायुः स्नेहोपसेवी पुरुषः प्रदिष्टः ॥ ४६ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने स्नेहविधिर्नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥


स्नेह-सेवन से लाभ—स्नेहों का निरन्तर सेवन करने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है, कोष्ठ के अन्तर्गत सभी अवयव शुद्ध रहते हैं, रस-रक्त आदि सातों धातु ताजे बने रहते हैं, अतएव मानव बल तथा वर्ण (कान्ति) से युक्त बना रहता है। चक्षु आदि इन्द्रियां अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में पूर्ण समर्थ रहती हैं। स्नेहसेवन करने वाले पर वृद्धता का प्रभाव शीघ्र नहीं पड़ता तथा वह शतायु होता है ॥ ४६ ॥

वक्तव्य—स्नेहसेवन-प्रकरण में उन निर्धनों पर भी आयुर्वेद ने ध्यान दिया है, नहीं तो वे बेचारे कहाँ से घी-तेल लाते। आप ध्यान दें—‘यात्यामाशयमाहारः पूर्व प्राणानिलेरितः। बहेर्बलेन माधुर्यं स्निग्धतां याति तद्रसः ॥ पुष्णाति धातुनखिलात् सम्यक् पक्वोऽमुतोपमः’ ॥ (शा.सं.पू.खं. ६।४ से ८) अर्थात् आहार रस का समुचित पाक हो जाने पर वह रस स्वभाव से मधुर एवं स्निग्ध हो जाता है, तदनन्तर वह सभी धातुओं का पोषण करता है। यह है ईश्वर की कृपा।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में स्नेहविधि नामक सोलहवीं अध्याय समाप्त ॥ १६ ॥