अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः
अथातः स्वेदविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से स्वेदविधि नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —इसके पहले अध्याय में शरीरशोधन-विधि को ध्यान में रखकर स्नेहन-विधि का सांगोपांग वर्णन किया गया, अब इस अध्याय में स्वेदविधि का वर्णन किया जायेगा। क्योंकि शरीर के स्निग्ध होने पर दोषों को मुटु करने के लिए स्वेदन किया जाता है। अतएव स्वेदन-विधि का समुचित ज्ञान कराने के लिए प्रस्तुत अध्याय की प्रस्तावना की जा रही है।
भगवान् पुनर्वसु ने चरक-सूत्रस्थान अध्याय १४ में १३ प्रकार की स्वेदन विधियों का विस्तार से वर्णन किया है, किन्तु महर्षि वाग्भट ने उन भेदों का अन्तर्भाव आगे कहे जाने वाले चार प्रकार के स्वेदभेदों में कर दिखाया है। यह स्वेदनकर्म सम्पूर्ण शरीर पर किया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर किसी अंग-विशेष पर भी किया जाता है। इसकी चरम उपलब्धि है—सम्पूर्ण शरीर से अथवा अंग-विशेष से पसीना निकालना। इससे रोकुणों के बन्द हुए मुख ( द्वार ) खुल जाते हैं।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १४; सु.चि. ३२ एवं अ.सं.सू. २६ में देखें।
स्वेदस्तापोपनाहोष्मद्वबभेदाच्चतुर्विधः ।
स्वेद के चार भेद —स्वेद या स्वेदन के चार भेद होते हैं। यथा—१. तापस्वेद, २. उपनाहस्वेद, ३. ऊष्मस्वेद तथा ४. द्वबस्वेद।
वक्तव्य —महर्षि वाग्भट चतुर्विध स्वेदन के वर्णन में पूर्ण रूप से सुश्रुत से प्रभावित थे। चरकोक्त स्वेदन भेद इस प्रकार हैं—१. संकर, २. प्रस्तर, ३. नाडी, ४. परिषेक, ५. अवगाहन, ६. जेन्ताक, ७. अश्मघन, ८. कर्ण, ९. कुटी, १०. भू, ११. कुम्भ, १२. कूप तथा १३. होलाक। इन १३ स्वेदविधियों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है—तापस्वेद में—जेन्ताक, कर्ण, कुटी, कूप तथा होलाक ५ को, ऊष्मस्वेद तथा उपनाहस्वेद में—संकर, प्रस्तर, अश्मघन, नाडी, कुम्भ तथा भूस्वेद ६ को और द्वबस्वेद में—परिषेक तथा अवगाहन २ को।
तापोऽग्रितत्तवसनफालहस्ततलादिभिः ॥ १ ॥
तापस्वेद —उक्त चारों भेदों में से प्रथम तापस्वेद का परिचय प्रस्तुत है—यह वह स्वेदन-विधि है जिसमें आग में तपाये गये वस्त्र, फाल ( हर्द या केवल हर्द से बनाये गये वस्त्रों का ग्रहण किया गया है ) तथा हाथ-पैर के तलुओं आदि को आग में तपाकर स्वेदन किया जाता है ॥ १ ॥
उपनाहो वचाकिण्वशताह्निद्वबहृभिः । धान्यैः समस्तेर्गद्वैश्च रात्रैरपडजटाभिषैः ॥ २ ॥
उद्विकृलवर्णैः स्नेहचुकुतक्रपयःप्लुतैः । केवले पवने, श्लेष्मसंसृष्टे सुरसादिभिः ॥ ३ ॥
पितेन पद्मकाद्यैस्तु सात्वण्डित्यैः पुनःपुनः ।
उपनाहस्वेद —बालवच, किण्व ( सुराबीज ), सौफ या सोया, देवदार, जौ, गेहूँ आदि धान्य, नालुका ( मोटी तज ) आदि सुगन्धित द्रव्य, रासना, रेड की जड़ तथा मांस को लेकर पर्याप्त नमक मिलाकर स्नेह