भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

( घौ ) आदि स्निग्धद्रव्य, चक्र, तक्र और दूध इन सबको पकाकर केवल वातविकारों में बांधा जाता है। यदि वातदोष के साथ कफदोष भी मिला हो तो सुरसादि गण की औषधियों के उपनाह का प्रयोग करना चाहिए और यदि वातदोष के साथ पित्तदोष मिला हो तो पचकादि गण तथा साल्वण नामक योगों द्वारा निर्मित उपनाहों का बार-बार प्रयोग करना चाहिए ॥ २-३ ॥

बक्तव्य —उक्त उपनाहस्वेद में कहे गये कुछ द्रव्य इधर-उधर से लिये गये हैं, अतः उनका निर्देश हम यहाँ कर रहे हैं—'समस्तेर्नवैध' इसे वृद्धवाग्भट ने अ.सं.सू. २६।५ में सर्वगन्ध कहा है, देखें। 'सुरसादि गण' को देखें—अ.हृ.सू. १।५३०। 'पचकादि गण' को देखें—अ.हृ.सू. १।५१२ तथा 'साल्वण'—सु.चि. ४।१४-१५ में देखें। यहाँ 'उपनाह' का अर्थ है—उक्त द्रव्यों के साथ बाँधना। इसी को 'पुलित्स' भी कहते हैं।

स्निग्धोष्णवीर्यमृदुभिश्चर्म्यपट्टैरपूतिभिः ॥४॥

अलाभे वातजित्पत्रकौशेयाविकशाटकैः। बद्धं रात्रौ दिवा मुञ्चैन्मुञ्चेद्वात्रौ दिवाकृतम् ॥५॥

बन्धनद्रव्य-निर्देश —ऊपर कहे गये द्रव्यों का पतला हलुआ-सा बनाकर बेदना वाले अंग पर लगाकर स्निग्ध तथा उष्णवीर्य वाले मूलायम चमड़े की पट्टियों, जो दुर्गन्धित न हों, से बाँधें। यदि उक्त प्रकार की चमड़े की पट्टी सुलभ न हो तो वातनाशक एरण्ड आदि के पत्ते उस पर रखकर रेशमी अथवा ऊनी पट्टियों से बाँधें। दिन में बाँधे हुए इस बन्धन को रात में खोलें और रात में बाँधे हुए को दिन में खोलें अर्थात् यह बन्धन १२ घण्टा बँधा रहे ॥४-५॥

ऊष्मा तूत्कारिकालोष्टकपालोपलपांसुभिः। पत्रभङ्गेन धान्येन करीषसिकतातुवैः ॥६॥ अनेकोपायसन्तत्तैः प्रयोज्यो देशकालतः।

ऊष्मस्वेद —उत्कारिका ( गरम-गरम रोटी या लपसी आदि ) से, मिट्टी के ढेले से, कपाल ( फूटे हुए घड़े के टुकड़ों ) से, पत्थर के टुकड़ों से, पांसु ( धूल, मिट्टी या बालू ) से, पत्रभंग ( भूमि पर पत्तों को जलाकर, उस पर पुनः पत्तों को बिछाकर लेटने ) से; उड़द, धान आदि को उबाल कर उसके ऊपर लेटने से; करीष ( गोबर ), सिकता ( बालू ) तथा तुष ( भूसी ) को जलाकर या गरम कर उसके ऊपर बिछाई हुई चारपायी पर लेटने से, इनके अतिरिक्त विविध विधियों से ताप देकर यह स्वेदन किया जाता है। इसका प्रयोग देश-काल के अनुसार ही करें ॥६॥

बक्तव्य —वृद्धवाग्भट ने इसके भेदों की गणना इस प्रकार की है—१. पिण्ड, २. संस्तर, ३. नाड़ी, ४. घनाश्मा, ५. कुम्भी, ६. कूप, ७. कुटी तथा जेन्ताक। देखें—अ.सं.सू. २६।७। इसी के आगे वहाँ इनकी प्रयोगविधियाँ भी दी हैं।

शिष्युवारणकेरण्डकरञ्जसुरसार्जकात् ॥७॥

शिरीषवासावंशार्कमालतीदीर्यवृन्ततः। पत्रभङ्गेर्वचाद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजैः ॥८॥

दशमूलैन च पृथक् सहितैर्वा यथामलम्। स्नेहबद्धिः सुराशुक्तारिधीरादिसाधितैः ॥९॥ कुम्भीगैलन्तीर्नाडीर्वा पूरयित्वा रुजादितम्। वाससाऽऽच्छादितं गात्रं स्निग्धं सिञ्चेद्ययासुखम् ॥

द्रवस्वेद —सहजन, वारणक ( कंटककरंज ), एरण्ड, करंज, तुलसी, वनतुलसी, सिरस, अडूसा, बाँस, आक, माल्ती तथा सोनापाठा—इन द्रव्यों के पत्रसमूह अथवा वातनाशक अन्य वृक्षों के पत्रसमूह अथवा वचादि गण ( अ.हृ.सू. १।५३५ ) के पत्रसमूह अथवा वचा आदि वे द्रव्य जो ऊपर उपनाहस्वेद ( श्लोक ३ ) में कहे गये हैं अथवा सूअर आदि अनुप देश में होने वाले प्राणियों के मांस अथवा मछली आदि पानी में होने वाले प्राणियों के मांस या दशमूल के द्रव्यों को दोषानुसार अलग-अलग लेकर अथवा सबको एक साथ लेकर सुरा, सिरका, जल, दूध में पकाकर उसमें तैल-घी आदि स्नेह मिलाकर उसे छान लें। फिर