अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वेदविधिरध्यायः १७ ]
सूत्रस्थानम्
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इसे घड़ा में या झंझर ( सुराही ) में या नाली ( पिचकारी ) आदि में भरकर रोगयुक्त अंग पर अभ्यंग करने के बाद कपड़े से उस अंग को ढककर गुन-गुने उस द्रव का सेचन करें ॥७-१०॥
वक्तव्य —श्लोक २ से १४ तक उष्ण अर्थात् आग्नेय स्वेदों की चर्चा है, इसके विपरीत अनाग्नेय स्वेद भी होते हैं, उनका वर्णन आगे २८वें श्लोक में किया जायेगा। द्रवस्वेदों में अवगाहन, सेचन, परिषेक आदि विधियाँ कही गयी हैं। गरम पानी से स्नान करना भी 'द्रवस्वेद' ही है, किन्तु उष्ण जल से सिर को नहीं धोना चाहिए।
तैरेव वा द्रवेः पूर्ण कुण्डं सर्वाङ्गगेडनिते। अवगाह्यातुरस्तिष्पेदशःकुच्छादिरुभु च ॥११॥
निवातेऽन्तर्बहिःस्निग्धो जीर्णान्नः स्वेदमाचरेत्।
अवगाहन-स्वेदविधि —उक्त द्रवस्वेद-विधि में वर्णित द्रव्यों के क्वायजल को कुण्ड ( टब ) में भर दें। स्पर्श करने योग्य उस जल में रोगी को बैठायें या लेटा दें। यह सर्वाङ्गव्यापी स्वेदन है। इसका प्रयोग वातविकारों, अशरीर तथा मूत्रकुच्छ रोगों में कराना चाहिए ॥११॥
स्वेदन-विधि —स्नेहपान-विधि द्वारा भीतर से स्नेहन किया हुआ और अभ्यंग आदि विधियों से बाहर से स्नेहन किया हुआ पुरुष भोजन के पच जाने पर वातरहित स्थान में अर्थात् जहाँ हवा का सीधा प्रवेश न हो रहा हो ( ऐसे घर के भीतर ) स्वेदन करे।
व्याधिब्याधितदेशतुर्वशान्मध्यवरावरम् ॥१२॥
स्वेदन-विधिभेद —रोग, रोगी, देश और ऋतु ( काल ) इन सबका विचार कर तदनुसार उत्तम, मध्यम अथवा अवर ( अधम ) कोटि का यथायोग्य स्वेदन कराना चाहिए ॥१२॥
कफार्तां रुक्षणं रुक्षो, रुक्षः स्निग्धं कफानिले।
दोषभेद से स्वेदन —अन्यत्र स्नेहन करने के बाद स्वेदन करने का निर्देश है, अतः कफज रोग से पीड़ित रोगी बिना स्नेहन किये अर्थात् रूखा रहकर रुक्षताकारक द्रव्यों से स्वेदन करे। इस रुक्षस्वेदन को 'तापस्वेद' भी कहते हैं। रुक्षरोगी कफज तथा वातज रोगों में रुक्ष तथा स्निग्ध द्रव्यों द्वारा द्रवस्वेदन करे। पित्तज विकारों में स्वयं स्वेद होने से स्वेदन की आवश्यकता ही नहीं होती है।
आमाशयगते वायो कफे पक्वाशयाश्रिते ॥१३॥
रुक्षपूर्वं तथा स्नेहपूर्वं स्थानानुरोधतः।
स्थानभेद से स्वेदन —वातदोष जब आमाशय में पहुँचा हो और कफदोष पक्वाशय में स्थित हो तो उस समय सबसे पहले रुक्ष स्वेदन करें, फिर स्निग्ध स्वेदन करें और जब वातदोष मलाशय में स्थित हो तो पहले स्निग्ध स्वेदन, फिर रुक्ष स्वेदन करें। यह स्थान के विचार से निर्णय लिया गया है ॥१३॥
अल्पं वृद्धणयोः, स्वल्पं दृढमुष्कहृदये न वा ॥१४॥
अन्यत्र स्वेदन-निर्देश —दोनों वंशणों ( पेड़ और जाँघ के बीच का भाग ) में अल्प ( अवर श्रेणी का ) स्वेदन करना चाहिए। दृष्टि ( नेत्रों ), अण्डकोषों तथा हृदयप्रदेश पर थोड़ा-सा स्वेदन करें अथवा न करें ॥१४॥
शीतशूलक्षये स्विन्नो जातेऽङ्गानां च मादैव। स्याच्छन्तेर्मीदितः स्नातस्ततः स्नेहविधिं भजेत ॥
स्वेदन का सम्यक् योग —जब सर्दी लगाना रुक जाय तथा शूल की शान्ति हो जाय और जकड़े हुए अंग ( शरीर के अवयव ) सुकोमल हो जायें तब समझें कि भलीभाँति स्वेदन हो चुका है। इस क्रिया के पश्चात् धीरे-धीरे शरीर को मसलना चाहिए, फिर गुनगुने जल से स्नान करे, तदनन्तर स्नेहपान या स्नेहन-विधि करे ॥१५॥