अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
पितास्रकोपतृणमूर्च्छास्वराङ्गसदनभ्रमाः । सन्धिपीडा ज्वरः श्यावरक्तमण्डलदर्शनम् ॥ १६ ॥ स्वेदातियोगाच्छिद्धिश्च, तत्र स्तम्भनमीषधम् । विषक्षारागन्वतीसारच्छिर्दमोहातुरेषु च ॥ १७ ॥
स्वेदन का अतियोग—इससे पित्तविकार, रक्तविकार, प्यास का लगना, बेहोशी होना, स्वर तथा शरीर में ढीलापन, चक्करों का आना, जोड़ों में पीड़ा का होना, ज्वर, काले एवं लाल चकत्तों का दिखलायी पड़ना तथा छवि ( वमन ) का होना—ये लक्षण होते हैं। इस स्थिति में स्तम्भन-चिकित्सा करनी चाहिए। विषजनित विकारों, क्षारविकारों, अग्निविकारों में, अतिसार, वमन तथा मूर्च्छा रोगों में भी स्तम्भन-चिकित्सा करनी चाहिए ॥ १६-१७ ॥
स्वेदनं गुरु तीक्ष्णोष्णं प्रायः, स्तम्भनमन्यथा । द्रवस्थिरसरस्निग्धरूक्षसूक्ष्मं च भेषजम् ॥ १८ ॥
स्वेदनं, स्तम्भनं श्लक्ष्णं रूक्षसूक्ष्मसरद्रवम् । प्रायस्तिक्तं कषायं च मधुरं च समासतः ॥ १९ ॥
स्वेदन द्रव्य—प्रायः गुरु, तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य वाले द्रव्य स्वेदनकारक होते हैं। इनके विपरीत गुण-धर्म वाले द्रव्य स्तम्भनकारक होते हैं; यथा—लघु, मृदु एवं शीतवीर्य वाले द्रव्य। द्रव, स्थिर, सर, स्निग्ध, रूक्ष तथा सूक्ष्म द्रव्य स्वेदनकारक होते हैं।
स्तम्भन द्रव्य—श्लक्ष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, सर एवं द्रव द्रव्य प्रायः स्तम्भनकारक होते हैं। रसों के विचार से स्तम्भन द्रव्य—तिक्त, कषाय तथा मधुर रस वाले द्रव्य प्रायः स्तम्भन होते हैं। रसों के विचार से स्वेदन द्रव्य—उक्त रसों के विपरीत ( लवण, अम्ल तथा कटु ) रस वाले द्रव्य स्वेदन होते हैं ॥ १८-१९ ॥
बक्तव्य—वास्तव में जिन द्रव्यों के प्रयोग से शरीर से पसीना निकले वे स्वेदन हैं और जिनके प्रयोग से पसीना निकलना रुक जाय वे स्तम्भन हैं। जैसे—उष्ण जल में अवागहन करना या उष्ण जल से स्नान करना स्वेदन हैं, इसके विपरीत शीतल जल से स्नान करना या शीतल हवा का सेवन करना आदि उपाय स्तम्भन हैं।
स्तम्भितः स्याद्वले लब्धे यथोक्तामयसङ्घातु ।
स्तम्भन के समुचित प्रयोग के लक्षण—बल की प्राप्ति होना तथा इसी अध्याय के १६वें श्लोक में कहे गये पित्तज, रक्तज विकार आदि का क्षीण हो जाना—ये स्तम्भन के लक्षण होते हैं।
स्तम्भत्वकृत्स्यायुसङ्कोचकम्यहृद्वाघनुग्रहैः ॥ २० ॥
पादौच्छत्वकृरैः श्यावैरतिस्तम्भितमादिशेत् ।
स्तम्भन के अतियोग के लक्षण—शरीर में अकड़न या जकड़न, त्वचा एवं स्नायुओं में संकोच, कम्पन, हृदय, वाणी तथा हनु की गति में रुकावट, पैरों, होठों, त्वचा, हाथों एवं नखों में नीलापन का दिखलायी देना ॥ २० ॥
बक्तव्य—इस स्थिति में पुनः देश-काल के अनुसार उष्णोपचार करने चाहिए।
त स्वेदयेदतिस्थूलरूक्षदुर्बलमूर्च्छितान् ॥ २१ ॥
स्तम्भनीयक्षतक्षीणक्षाममद्यविकारिणः । तिमिरोदरबीसर्पकुष्ठशोषाढघरोगिणः ॥ २२ ॥
पीतदुग्धधदिस्नेहमधुतु कृतविरेचनान् । भ्रष्टदग्धगुदम्लानिक्क्रोधशोकभयार्दिनान् ॥ २३ ॥
क्षुत्तुष्णाकामलपाण्डुमेहनः पित्तपीडितान् । गर्भिणीं पुष्पितां सूतां, मृदु चात्ययिके गदे ॥ २४ ॥
स्वेदन के अयोग्य रोगी एवं रोग—अत्यन्त मोटे, अत्यन्त हृक्ष शरीर वाले, अत्यन्त कमजोर, मूर्च्छारोग से पीड़ित, स्तम्भन के योग्य व्यक्ति की ( इनका वर्णन इसी अध्याय के श्लोक १५, १६ तथा १९ में आया है ), क्षत ( उरःक्षत अथवा घाव लगने से पीड़ित ), क्षीण ( धातुक्षय आदि से पीड़ित ), क्षाम ( कुश ), मद्यविकार वाले ( मदात्यय आदि मदजनित रोगों से पीड़ित ), तिमिररोगी, उदररोगी, विसर्परोगी, कुष्ठरोगी,