भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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स्वेदविधिरध्यायः १७ ]

सूत्रस्थानम्

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शोष (राजयक्ष्मा), आढच (वातरक्त) रोगी, जिन्होंने दूध, दही, स्नेह तथा शहद को तत्काल पिया हो, जिन्हें अभी विरंचन कराया गया हो, प्रष्टगुद (जिसकी कोंच निकल गयी हो), दग्धगुद (जिसका गुदप्रदेश क्षार या अग्नि से जल गया हो), मानसिक क्लेश से युक्त तथा क्रोध, शोक, भय, भूख, प्यास से पीड़ित; कामलारोगी, पाण्डुरोगी, प्रमेहरोगी, पित्तज रोगों से पीड़ित, गर्भिणी, रजस्वला तथा प्रमूता (जिसने हाल में ही शिशु को जन्म दिया हो) —इनको स्वेदन का प्रयोग न कराये। आवश्यक होने पर रोग की स्थिति में मृदु स्वेदन कराया जा सकता है॥ २१-२४॥

वक्तव्य— वामभट की प्रतिज्ञानुसार जब हम उनकी पूर्ववर्ती संहिताओं का अवलोकन करते हैं, तो हमें 'सूता' या 'प्रमूता' के लिए स्वेदन का निषेध चरक में नहीं मिलता। आप भी देखें—च.सू. १४१६-१९। इसके विपरीत 'सूतिका'... 'सूतिकायाः' ॥ (च.शा. ८।४८) में 'पिप्पल्यादि गण' द्वारा पकायी गयी स्नेहयुक्त यवामू का सेवन तथा उसे उष्णोदक द्वारा स्नान करना निर्दिष्ट है। ये दोनों ही विधियाँ स्वेदन ही हैं। अब आप सश्रुत के दृष्टिकोण को भी देखें। आपने जिन्हें अस्वेद्य कहा है, उनका परिगणन यहाँ किया जा रहा है—पाण्डुरोगी, प्रमेहरोगी, रक्तपित्तरोगी, क्षयरोगी, क्षाम (कृश), अजीर्णरोगी, उदररोगी, विष से पीड़ित, प्यासा, वमन से पीड़ित, गर्भिणी, मद्यपान किया हुआ तथा अतिसाररोगी—इन्हें स्वेदन नहीं देना चाहिए। देखें—सु.चि. ३३।२५। इसमें 'सूता' को स्वेदन के अयोग्य नहीं कहा है। इसी के पहले सुश्रुत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है—'सम्यक् प्रजाता काले या पश्चात् स्वेद्या विज्ञानता'। (सु.चि. ३२।१८) इसके पहले सुश्रुत ने सु.शा. १०।१६-१८ में प्रमूता की जो परिचर्चा दी है, वह स्नेह तथा स्वेदन के भावों को व्यक्त करती है। लोकचार्य में भी सद्यःप्रमूता स्त्रियों को स्वेदन का प्रयोग कराया ही जाता है।

निष्कर्ष— प्राचीन महर्षियों के वचन सारवान् होते हैं। उक्त समस्त ऊहापोह करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि स्वेदन के उन भावों का आचार्य ने यहाँ निषेध किया है, जिन्हें सुकोमलांगी प्रमूताओं को अवश्य त्याग देना चाहिए। वे भाव हैं—नियुद्ध (बाहुयुद्ध या पैदल लड़ाई करना अर्थात् आयास-जनित समस्त कार्य), भारवहन, मार्गचलन आदि उन कष्टसाध्य कार्यों को न करे, जिनसे पसीना होता हो। यही आशय वृद्धवामभट का भी प्रतीत होता है।

श्वासकासप्रतिशयायहिध्माध्मानविबन्धिषु । स्वरभेदानिलव्याधिश्च्लेष्मास्तम्भगौरवे ॥ २५ ॥

अङ्गमर्दकटीपाश्चैषुष्कुभिहनुग्रहे । महत्त्वे मूष्कयोः खल्यामायामे वातकण्टके ॥ २६ ॥

मूत्रकृच्छ्रार्बुदग्रन्थिशुक्राघाताद्यमास्ते । स्वेदं यथायथं कुर्यात्तदोषधविभागतः ॥ २७ ॥

स्वेदन के योग्य— श्वास, कास, प्रतिशयाय (जुकाम), हिध्मा (हिकवा या हिककी), अफरा, विबन्ध (कञ्चियत), स्वरभेद (गला बैटना), वातज रोग, कफज रोग, आमरसजनित रोग, हनुस्तम्भ, भारीपन, अंगों में मसलने की-सी पीड़ा का होना, कटिग्रह, पाश्चैग्रह, पुष्पग्रह, कुक्षिग्रह (आंतों की गति में रुकावट), हनुग्रह, अण्डवृद्धि, खल्ली, अन्तरायाम या बाह्यायाम, वातकण्टक, मूत्रकृच्छ्र, अर्बुदरोग, ग्रन्थिरोग, शुक्राघात तथा आढचवात (ऊरुस्तम्भ) —इन रोगों में उस-उस रोग का नाश करने वाली औषधियों द्वारा तैयार किये गये द्रव्यों से स्वेदन कराना चाहिए ॥ २५-२७ ॥

स्वेदो हितस्त्वनाग्नेयो वाते भेदःकफावृते ।

अनाग्नेय स्वेद— प्रायः सभी स्वेदन अग्नि के संयोग से सम्पन्न कराये जाते हैं। कुछ स्वेदन ऐसे हैं, जिनमें अग्नि का प्रयोग नहीं होता। इस प्रकार के स्वेदों का प्रयोग मेदोघातु तथा कफदोष से आवृत (घिरे हुए) वातदोष से होने वाले (ऊरुस्तम्भ आदि) रोगों में किया जाता है।

निवातं गृह्मायासो गुरुप्रावरणं भयम् ॥ २८ ॥

उपनाहाहवक्रोधा भूरिपानं क्षुधाऽऽतपः ।

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