अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
दसविध अनाग्रेय स्वेद—१. निवात घर में रहना, २. आयास ( विविध प्रकार के परिश्रमसाध्य कार्यों को करते रहना ), ३. गुरुप्रावरण ( मोटे कम्बल अथवा रखाई आदि को ओढ़े रहना ), ४. भय ( यह भी पसीना लाने का एक उपाय है ), ५. उपनाह ( ऊन की पट्टी से या साधारण पट्टी से कसकर बाँधे रहना ), ६. आहव ( लड़ाई या कुश्ती करना ), ७. क्रोध करना, ८. अधिक मात्रा में मादक पदार्थों का सेवन करना, ९. भूखा रहना तथा १०. आतप ( धूप का सेकना ) ॥ २८ ॥
वक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने भी दसविध अनग्रिस्वेदन का वर्णन इस प्रकार किया है—‘व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा । बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः’ ॥ ( च. सू. १४१४ ) इसका अर्थ भी वाग्भट के उक्त २८वें श्लोक के समान है।
ज्वर में भूखा रहना या लंघन करना इस विधि से कुछ दिन बाद स्रोतों के खुल जाने पर पसीना निकलने लगता है; यही क्षुधा द्वारा स्वेदन होने का प्रमाण है। स्वेदन के भलीभाँति हो जाने के बाद किस प्रकार का आहार-विहार करना चाहिए, इसके लिए देखें—अष्टांगसंग्रह-सू. २६।३६
स्नेहकिल्लाः कोष्ठगा धातुगा वा स्रोतोलीना ये च शाखास्थिसंस्थाः ।
दोषाः स्वेदेस्ते द्रवीकृत्य कोष्ठं नीताः सम्यक् शुद्धिर्निर्लिप्यन्ते ॥ २९ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुश्रुतमद्राग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने स्वेदविधिर्नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
स्वेदन का फल —कोष्ठगत दोष, रस-रक्त आदि धातुओं में गये हुए या व्याप्त दोष, स्रोतों में विलीन ( सटे हुए ) दोष एवं शाखाओं ( त्वचा, बाहूओं, सन्धियों ) में तथा अस्थियों में स्थित दोष स्नेहन-विधि द्वारा निकले किये गये तदनन्तर स्वेदन-विधि से पिघलाये जाने पर कोष्ठ में पहुँचा दिये जाते हैं। तदनन्तर वमन-विरचन रूप संशोधन-विधियों से उन्हें मुखपूर्वक भलीभाँति बाहर निकाला जा सकता है ॥ २९ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में स्नेहविधि नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १७ ॥