अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः
अथातो वमनविरेचनविधिमध्येयां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से वमन-विरेचनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —सत्रहवें अध्याय के अन्तिम पद्य में कहा है कि स्नेहन तथा स्वेदन विधियों द्वारा कोष्ठ में लाये गये या पहुँचाये गये दोषों को संशोधन-विधियों से बाहर किया जायेगा। अतः प्रस्तुत अध्याय में उन दोषों को निकालने के लिए वमन तथा विरेचन विधियों का विस्तार से वर्णन किया जा रहा है। भगवान् पुनर्वसु ने वमन-विरेचन की व्याख्या इस प्रकार की है—‘तत्र’...‘लभते’ ॥ ( च.क. १।४ ) अर्थात् मुखभाग से दोषों का जो निर्हरण किया जाता है, उसे वमन कहते हैं और निचले ( गुद ) भाग से जो दोषों का निर्हरण किया जाता है, उसे विरेचन कहते हैं अथवा शरीर के दोषों को निकालने के कारण दोनों ( वमन तथा विरेचन ) की विरेचन संज्ञा है। यही मत सुश्रुत का भी है। देखें—सु.चि. ३३।४।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १५ एवं १६; च.सि. १, २, ६; सु.चि. ३३, ३९; अ.सं.सू. २७ में देखें।
कफे विदध्याद्भ्रमनं संयोगे वा कफोल्बणे । तद्विरेचनं पिते—
वमन-विरेचन व्यवस्था —कफदोष की वृद्धि होने पर तथा कफजनित रोगों में अथवा कफदोष की प्रधानता जिस दोष ( वात-पित्त ) के साथ हो, तो इन सभी में वमन कराना चाहिए। इसी प्रकार पित्तदोष की वृद्धि होने पर तथा पित्तजनित रोगों में अथवा पित्तदोष की प्रधानता जिस दोष के साथ हो, तो इन सभी विकारों में विरेचन कराना चाहिए।
—विशेषेण तु वामयेत् ॥ १ ॥
नवज्वरातिसाराधःपित्तासुग्राजयक्षिणः । कुष्ठमेहापचोन्नयिन्श्लोपदोन्मादकासिनः ॥ २ ॥
श्वासहूलासबौर्षपस्त्यदोषोर्ध्वरोगिनः ।
वमन-निर्देश —विशेष करके निम्नलिखित रोगों में वमन कराने का निर्देश दिया गया है—नवज्वर की मुक्ति हो जाने पर, अतिसार में, नीचे के मार्ग से होने वाले रक्तपित्तरोग में, राजयक्षमारोग में, कुष्ठरोग में, अपचौरोग में, ग्रन्थिरोग में, श्लोपदरोग में, उन्माद में, कास में, श्वास में, हूलास ( जो मिचलाना ) में, विसर्पिरोग में, दुग्धदोष में एवं ऊर्ध्वजत्रु में होने वाले रोगों में ॥ १-२ ॥
वक्तव्य —उक्त रोगों में वमन का विधान इसलिए किया गया है कि इनमें कफ की प्रधानता होती ही है, यदि कभी किसी रोग में ऐसा न देखा जाय तो वमन न करायें। वमन तथा विरेचन विधियों में पहले वमन कराने का निर्देश इसलिए दिया गया है कि वमन द्वारा कफ के निकल जाने पर विरेचन-विधि सरलता से की जा सकती है और यदि बिना वमन कराये गये विरेचन कराया जाता है, तो वह बड़ा हुआ कफ विरेचन कराते समय ग्रहणी को डक देता है, जिससे भलीभाँति विरेचन नहीं हो पाता है। अतः विरेचन कराने के पहले वमन करा लेना चाहिए।
अवाम्या गर्भिणी रूक्षः क्षुधितो नित्यदुःखितः ॥ ३ ॥
बालवृद्धुकुशसूयूहद्रोगिभक्तदुर्बलाः । प्रसक्तवमयुलोहितमिरक्रिमिकोष्ठिनः ॥ ४ ॥
ऊर्ध्वप्रवृत्तवायव्यघतबस्तिहतस्वराः । मूत्राघात्युदरी गुल्मी दुर्बमोऽत्यग्रिशरसः ॥ ५ ॥
उदावर्तप्रमाडौलापाष्र्णरूवातरोगिनः । ऋते विषगराजीर्णविरुद्वाभ्यवहारतः ॥ ६ ॥