भारतकोश
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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

स्वेदविधिरध्यायः १७ ]

सूत्रस्थानम्

२१७

शोष (राजयक्ष्मा), आढच (वातरक्त) रोगी, जिन्होंने दूध, दही, स्नेह तथा शहद को तत्काल पिया हो, जिन्हें अभी विरंचन कराया गया हो, प्रष्टगुद (जिसकी कोंच निकल गयी हो), दग्धगुद (जिसका गुदप्रदेश क्षार या अग्नि से जल गया हो), मानसिक क्लेश से युक्त तथा क्रोध, शोक, भय, भूख, प्यास से पीड़ित; कामलारोगी, पाण्डुरोगी, प्रमेहरोगी, पित्तज रोगों से पीड़ित, गर्भिणी, रजस्वला तथा प्रमूता (जिसने हाल में ही शिशु को जन्म दिया हो) —इनको स्वेदन का प्रयोग न कराये। आवश्यक होने पर रोग की स्थिति में मृदु स्वेदन कराया जा सकता है॥ २१-२४॥

वक्तव्य— वामभट की प्रतिज्ञानुसार जब हम उनकी पूर्ववर्ती संहिताओं का अवलोकन करते हैं, तो हमें 'सूता' या 'प्रमूता' के लिए स्वेदन का निषेध चरक में नहीं मिलता। आप भी देखें—च.सू. १४१६-१९। इसके विपरीत 'सूतिका'... 'सूतिकायाः' ॥ (च.शा. ८।४८) में 'पिप्पल्यादि गण' द्वारा पकायी गयी स्नेहयुक्त यवामू का सेवन तथा उसे उष्णोदक द्वारा स्नान करना निर्दिष्ट है। ये दोनों ही विधियाँ स्वेदन ही हैं। अब आप सश्रुत के दृष्टिकोण को भी देखें। आपने जिन्हें अस्वेद्य कहा है, उनका परिगणन यहाँ किया जा रहा है—पाण्डुरोगी, प्रमेहरोगी, रक्तपित्तरोगी, क्षयरोगी, क्षाम (कृश), अजीर्णरोगी, उदररोगी, विष से पीड़ित, प्यासा, वमन से पीड़ित, गर्भिणी, मद्यपान किया हुआ तथा अतिसाररोगी—इन्हें स्वेदन नहीं देना चाहिए। देखें—सु.चि. ३३।२५। इसमें 'सूता' को स्वेदन के अयोग्य नहीं कहा है। इसी के पहले सुश्रुत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है—'सम्यक् प्रजाता काले या पश्चात् स्वेद्या विज्ञानता'। (सु.चि. ३२।१८) इसके पहले सुश्रुत ने सु.शा. १०।१६-१८ में प्रमूता की जो परिचर्चा दी है, वह स्नेह तथा स्वेदन के भावों को व्यक्त करती है। लोकचार्य में भी सद्यःप्रमूता स्त्रियों को स्वेदन का प्रयोग कराया ही जाता है।

निष्कर्ष— प्राचीन महर्षियों के वचन सारवान् होते हैं। उक्त समस्त ऊहापोह करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि स्वेदन के उन भावों का आचार्य ने यहाँ निषेध किया है, जिन्हें सुकोमलांगी प्रमूताओं को अवश्य त्याग देना चाहिए। वे भाव हैं—नियुद्ध (बाहुयुद्ध या पैदल लड़ाई करना अर्थात् आयास-जनित समस्त कार्य), भारवहन, मार्गचलन आदि उन कष्टसाध्य कार्यों को न करे, जिनसे पसीना होता हो। यही आशय वृद्धवामभट का भी प्रतीत होता है।

श्वासकासप्रतिशयायहिध्माध्मानविबन्धिषु । स्वरभेदानिलव्याधिश्च्लेष्मास्तम्भगौरवे ॥ २५ ॥

अङ्गमर्दकटीपाश्चैषुष्कुभिहनुग्रहे । महत्त्वे मूष्कयोः खल्यामायामे वातकण्टके ॥ २६ ॥

मूत्रकृच्छ्रार्बुदग्रन्थिशुक्राघाताद्यमास्ते । स्वेदं यथायथं कुर्यात्तदोषधविभागतः ॥ २७ ॥

स्वेदन के योग्य— श्वास, कास, प्रतिशयाय (जुकाम), हिध्मा (हिकवा या हिककी), अफरा, विबन्ध (कञ्चियत), स्वरभेद (गला बैटना), वातज रोग, कफज रोग, आमरसजनित रोग, हनुस्तम्भ, भारीपन, अंगों में मसलने की-सी पीड़ा का होना, कटिग्रह, पाश्चैग्रह, पुष्पग्रह, कुक्षिग्रह (आंतों की गति में रुकावट), हनुग्रह, अण्डवृद्धि, खल्ली, अन्तरायाम या बाह्यायाम, वातकण्टक, मूत्रकृच्छ्र, अर्बुदरोग, ग्रन्थिरोग, शुक्राघात तथा आढचवात (ऊरुस्तम्भ) —इन रोगों में उस-उस रोग का नाश करने वाली औषधियों द्वारा तैयार किये गये द्रव्यों से स्वेदन कराना चाहिए ॥ २५-२७ ॥

स्वेदो हितस्त्वनाग्नेयो वाते भेदःकफावृते ।

अनाग्नेय स्वेद— प्रायः सभी स्वेदन अग्नि के संयोग से सम्पन्न कराये जाते हैं। कुछ स्वेदन ऐसे हैं, जिनमें अग्नि का प्रयोग नहीं होता। इस प्रकार के स्वेदों का प्रयोग मेदोघातु तथा कफदोष से आवृत (घिरे हुए) वातदोष से होने वाले (ऊरुस्तम्भ आदि) रोगों में किया जाता है।

निवातं गृह्मायासो गुरुप्रावरणं भयम् ॥ २८ ॥

उपनाहाहवक्रोधा भूरिपानं क्षुधाऽऽतपः ।

२१८

अष्टाङ्गहृदय

दसविध अनाग्रेय स्वेद—१. निवात घर में रहना, २. आयास ( विविध प्रकार के परिश्रमसाध्य कार्यों को करते रहना ), ३. गुरुप्रावरण ( मोटे कम्बल अथवा रखाई आदि को ओढ़े रहना ), ४. भय ( यह भी पसीना लाने का एक उपाय है ), ५. उपनाह ( ऊन की पट्टी से या साधारण पट्टी से कसकर बाँधे रहना ), ६. आहव ( लड़ाई या कुश्ती करना ), ७. क्रोध करना, ८. अधिक मात्रा में मादक पदार्थों का सेवन करना, ९. भूखा रहना तथा १०. आतप ( धूप का सेकना ) ॥ २८ ॥

वक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने भी दसविध अनग्रिस्वेदन का वर्णन इस प्रकार किया है—‘व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा । बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः’ ॥ ( च. सू. १४१४ ) इसका अर्थ भी वाग्भट के उक्त २८वें श्लोक के समान है।

ज्वर में भूखा रहना या लंघन करना इस विधि से कुछ दिन बाद स्रोतों के खुल जाने पर पसीना निकलने लगता है; यही क्षुधा द्वारा स्वेदन होने का प्रमाण है। स्वेदन के भलीभाँति हो जाने के बाद किस प्रकार का आहार-विहार करना चाहिए, इसके लिए देखें—अष्टांगसंग्रह-सू. २६।३६

स्नेहकिल्लाः कोष्ठगा धातुगा वा स्रोतोलीना ये च शाखास्थिसंस्थाः ।

दोषाः स्वेदेस्ते द्रवीकृत्य कोष्ठं नीताः सम्यक् शुद्धिर्निर्लिप्यन्ते ॥ २९ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुश्रुतमद्राग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने स्वेदविधिर्नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥


स्वेदन का फल —कोष्ठगत दोष, रस-रक्त आदि धातुओं में गये हुए या व्याप्त दोष, स्रोतों में विलीन ( सटे हुए ) दोष एवं शाखाओं ( त्वचा, बाहूओं, सन्धियों ) में तथा अस्थियों में स्थित दोष स्नेहन-विधि द्वारा निकले किये गये तदनन्तर स्वेदन-विधि से पिघलाये जाने पर कोष्ठ में पहुँचा दिये जाते हैं। तदनन्तर वमन-विरचन रूप संशोधन-विधियों से उन्हें मुखपूर्वक भलीभाँति बाहर निकाला जा सकता है ॥ २९ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में स्नेहविधि नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १७ ॥


अष्टादशोऽध्यायः

अथातो वमनविरेचनविधिमध्येयां व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से वमन-विरेचनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —सत्रहवें अध्याय के अन्तिम पद्य में कहा है कि स्नेहन तथा स्वेदन विधियों द्वारा कोष्ठ में लाये गये या पहुँचाये गये दोषों को संशोधन-विधियों से बाहर किया जायेगा। अतः प्रस्तुत अध्याय में उन दोषों को निकालने के लिए वमन तथा विरेचन विधियों का विस्तार से वर्णन किया जा रहा है। भगवान् पुनर्वसु ने वमन-विरेचन की व्याख्या इस प्रकार की है—‘तत्र’...‘लभते’ ॥ ( च.क. १।४ ) अर्थात् मुखभाग से दोषों का जो निर्हरण किया जाता है, उसे वमन कहते हैं और निचले ( गुद ) भाग से जो दोषों का निर्हरण किया जाता है, उसे विरेचन कहते हैं अथवा शरीर के दोषों को निकालने के कारण दोनों ( वमन तथा विरेचन ) की विरेचन संज्ञा है। यही मत सुश्रुत का भी है। देखें—सु.चि. ३३।४।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. १५ एवं १६; च.सि. १, २, ६; सु.चि. ३३, ३९; अ.सं.सू. २७ में देखें।

कफे विदध्याद्भ्रमनं संयोगे वा कफोल्बणे । तद्विरेचनं पिते—

वमन-विरेचन व्यवस्था —कफदोष की वृद्धि होने पर तथा कफजनित रोगों में अथवा कफदोष की प्रधानता जिस दोष ( वात-पित्त ) के साथ हो, तो इन सभी में वमन कराना चाहिए। इसी प्रकार पित्तदोष की वृद्धि होने पर तथा पित्तजनित रोगों में अथवा पित्तदोष की प्रधानता जिस दोष के साथ हो, तो इन सभी विकारों में विरेचन कराना चाहिए।

—विशेषेण तु वामयेत् ॥ १ ॥

नवज्वरातिसाराधःपित्तासुग्राजयक्षिणः । कुष्ठमेहापचोन्नयिन्श्लोपदोन्मादकासिनः ॥ २ ॥

श्वासहूलासबौर्षपस्त्यदोषोर्ध्वरोगिनः ।

वमन-निर्देश —विशेष करके निम्नलिखित रोगों में वमन कराने का निर्देश दिया गया है—नवज्वर की मुक्ति हो जाने पर, अतिसार में, नीचे के मार्ग से होने वाले रक्तपित्तरोग में, राजयक्षमारोग में, कुष्ठरोग में, अपचौरोग में, ग्रन्थिरोग में, श्लोपदरोग में, उन्माद में, कास में, श्वास में, हूलास ( जो मिचलाना ) में, विसर्पिरोग में, दुग्धदोष में एवं ऊर्ध्वजत्रु में होने वाले रोगों में ॥ १-२ ॥

वक्तव्य —उक्त रोगों में वमन का विधान इसलिए किया गया है कि इनमें कफ की प्रधानता होती ही है, यदि कभी किसी रोग में ऐसा न देखा जाय तो वमन न करायें। वमन तथा विरेचन विधियों में पहले वमन कराने का निर्देश इसलिए दिया गया है कि वमन द्वारा कफ के निकल जाने पर विरेचन-विधि सरलता से की जा सकती है और यदि बिना वमन कराये गये विरेचन कराया जाता है, तो वह बड़ा हुआ कफ विरेचन कराते समय ग्रहणी को डक देता है, जिससे भलीभाँति विरेचन नहीं हो पाता है। अतः विरेचन कराने के पहले वमन करा लेना चाहिए।

अवाम्या गर्भिणी रूक्षः क्षुधितो नित्यदुःखितः ॥ ३ ॥

बालवृद्धुकुशसूयूहद्रोगिभक्तदुर्बलाः । प्रसक्तवमयुलोहितमिरक्रिमिकोष्ठिनः ॥ ४ ॥

ऊर्ध्वप्रवृत्तवायव्यघतबस्तिहतस्वराः । मूत्राघात्युदरी गुल्मी दुर्बमोऽत्यग्रिशरसः ॥ ५ ॥

उदावर्तप्रमाडौलापाष्र्णरूवातरोगिनः । ऋते विषगराजीर्णविरुद्वाभ्यवहारतः ॥ ६ ॥

२२०

अष्टाङ्गहृदय

वमन के अयोग्य व्यक्ति—गर्भवती, स्क्लकोष्ठ, भूखा, सदा दुःखी रहने वाला अर्थात् पुराना रोगी, बालक, वृद्ध, कुश, स्थूल ( मोटा ), हृदयरोगी, उरःक्षत का रोगी अथवा जिसे घाव ल्पा हो, दुर्बल, जिसे स्वयं उलटियाँ हो रही हों, प्लीहारोगी, तिमिररोगी, जिसके कोष्ठ ( मलाशय ) में क्रिभि हों, ऊर्ध्ववातरोग में, ऊपर की ओर प्रवृत्त रक्तपित्तरोग में, जिसे अभी बस्ति-प्रयोग कराया गया हो, स्वरभेदरोग में, मूत्राघात में, उदररोग में, गुल्मरोग में, दुर्बल रोगी में, तीक्ष्णाग्निरोगी में, अशीरोगी में, उदावर्तरोगी में, भ्रमरोगी में, अष्टीलारोगी में, पाश्वर्शूल में तथा वातरोगी में वमन का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

यदि उक्त रोगियों को विषविकार, गरविकार, अजीर्णविकार अथवा विरुद्ध आहार सम्बन्धी कोई विकार हो तो इस स्थिति में इन्हें भी वमन करना चाहिए॥ ३-६ ॥

बक्तव्य—ऊपर 'उदावर्त' शब्द का प्रयोग हुआ है, इससे पुरीषोदावर्त, मूत्रोदावर्त तथा वातोदावर्त रोगों का ग्रहण भी कर लेना चाहिए। 'उत्तु = ऊर्ध्वम्, आवर्तः = उदावर्तः'।

प्रसक्तवमयोः पूर्व प्रायेणामज्वरोऽपि च। धूमान्तैः कर्मभिर्वज्र्याः, सर्वैरेव त्वजीर्णिनः॥ ७ ॥

वमन आदि कर्मों का निषेध—ऊपर कहे गये 'प्रसक्त वमयु' से पहले गर्भिणी से लेकर दुर्बल पर्यन्त रोगियों को और प्रायः आमज्वर के रोगी को न केवल वमन कर्म का अपितु विरेचन से लेकर धूमपान पर्यन्त सभी कर्मों का निषेध किया गया है। इसके अतिरिक्त अजीर्णरोग से पीड़ित रोगियों के लिए तो वमन से लेकर गण्डूष तक के सभी कर्मों का निषेध किया गया है। आमाजीर्ण में केवल उपवास एवं पाचनकर्म ही प्रशस्त हैं॥ ७ ॥

बक्तव्य—धूमान्त कर्म—वमन, विरेचन, निरुहण, अनुवासन, नय्य एवं धूमपान। सर्वैरेव—इसकी सीमा में ऊपर कहे गये कर्मों के अतिरिक्त गण्डूष तथा कवल का ग्रहण भी होता है।

विरेकसाध्या गुल्माशीर्विस्फोटव्यङ्गकामलाः। जीर्णज्वरोदरगरच्छद्विप्लीहहलीमकाः॥ ८ ॥

विद्रधिस्तिमिरं काचः स्यन्दः पक्वाशयव्यथा। योनिशुक्राश्रया रोगाः कोष्ठगाः कृमयो ब्रणाः॥

वाताम्रमूर्ध्वर्णं रक्तं मूत्राघातः शकुन्द्रग्रहः। वाम्याश्च कृच्छ्रमेहाद्याः—

विरेचन के योग्य रोग—गुल्म, अशीरोग, विस्फोट, व्यंग, कामला, जीर्णज्वर, उदररोग, गरविषविकार, वमन, प्लीहरोग, हलीमक, विद्रधि, तिमिर, काच, अभिष्यन्द, मलाशय सम्बन्धी रोग, योनिव्यापद, शुक्रविकार, उदरगत क्रिमिरोग, ब्रण, वातरक्त, ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त, मूत्राघात, शकुन्द्रग्रह ( मलाबरोध ) तथा वमन करने के योग्य रोगों में कृच्छ्र एवं प्रमेह आदि रोग॥ ८-९ ॥

—न तु रेच्यो नवज्वरी॥ १० ॥

अल्पान्यधोगपिताम्रक्षतपाव्यत्तिसारिणः। सशल्यास्थापितकूरकोष्ठात्तिस्निग्धशोषिणः॥

विरेचन के अयोग्य रोग—नवज्वर, मन्दाग्नि, अधोगामी रक्तपित्त, गुप्तप्रदेश का क्षत, अतिसाररोग, जिसके शरीर में कहीं शल्य धँसा हो, जिसे निरुहणबस्ति दी गयी हो, कूर कोष्ठवाला, जिसे अत्यन्त स्नेहद्रव्यों का प्रयोग कराया गया हो तथा शोषरोग से पीड़ित इनको विरेचन नहीं करना चाहिए॥ १०-११ ॥

अथ साधारणे काले स्निग्धस्त्रिन्धं यथाविधि। श्रोवस्यमुत्तिलष्टकफं मत्स्यमाषतिलादिभिः॥

निशां सुप्तं सुजीर्णात्रं पूर्वाहि कृतमङ्गलम्। निरन्तमोपत्तिनग्धं वा पेयया पीतसपिषम्॥ १३ ॥

वृद्धबालाबलकलीबभीरून् रोगानुरोधतः। आकण्ठं पायितान्मद्यं क्षीरमिक्षुरसं रसम्॥ १४ ॥

यथाविकारविहितां मधुतैन्धवसंयुताम्। कोष्ठं विभज्य भेषज्यमात्रां मन्त्राभिमन्त्रिताम्॥ १५ ॥

“ब्रह्मदक्षामिन्द्रेन्द्रभूचन्द्राकनिगलनलाः। ऋषयः सौपधिग्रामा भूतसङ्गश्च पान्तु बः॥ १६ ॥

रसायनमिवर्षीणाममराणामिवामृतम्। सुधेवोत्तमनगानां भेषज्यमिदमस्तु ते॥ १७ ॥

अंनमो भगवते भेषज्यगुरवे वैद्यप्रभराजय। तथागतायाहंते सप्त्यक्तसम्बुदाय। तद्यथा—

अभेषज्ये भेषज्ये महाभेषज्ये समुन्नते स्वाहा॥”

प्राङ्मुखं पाययेत्—

वमनविरचनविधिध्यायः १८ ]

सूत्रस्थानम्

२२१

वमनकारक औषधद्वय एवं प्रयोगविधि—ऊपर कहे गये पद्यों द्वारा कौन वमन-विरचन के योग्य हैं और कौन अयोग्य हैं, इसका भलीभांति निर्णय कर लेने के बाद साधारण ( समशीतोष्ण ) काल में विधिपूर्वक स्नेहन एवं स्वेदन कराकर अगले दिन जिसे वमन कराना हो, उसे एक दिन पहले मछली का मांस, उड़द तथा तिल के भक्ष्यों को खिलाकर उसके कफदोष को उभाड़ कर उसे रात्रि में सुला दें। प्रातःकाल उसके उठ जाने पर उसे देखें, रात्रि में खाया हुआ भोजन पच गया हो तो इष्टदेव का स्मरण एवं पूजन कर मंगलाचार करके उसे बिना कुछ अन्न खिलाये उसका स्नेहन करके पेया के साथ घी पिलायें। यदि वह व्यक्ति बुद्ध, बालक, दुर्बल, क्लोह है अथवा वमन के कष्ट से डरने वाला है तो उसे रोग के अनुसार मद्य ( शराब ), दूध, गन्ने का रस अथवा मांसरस भरपेट पिला दें। उसके बाद रोग के अनुसार उसका कोष्ठ मुटु है या क्रूर है, इसका विचार करके मद्य तथा संधानमक मिलाकर किसी वमनकारक औषध को ' ब्रह्मदक्षायिबि' इत्यादि मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर रोगी का पूर्व की ओर मुख कराकर उसे औषध पिला दें॥ १२-१७॥

मन्त्रार्थ —'ब्रह्मा, दक्षप्रजापति, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्र, सूर्य, वायु, अग्नि, औषधिसमूह सहित समस्त ऋषिगण, पंच महाभूत आप सब की रक्षा करें। जिस प्रकार महर्षि च्यवन आदि महर्षियों के लिए रसायन, देवताओं के लिए जैसे अमृत और जैसे उत्तम नागों के लिए सुधा ( विष ) हितकर होता है, उसी प्रकार यह औषध तुम्हारे लिए हितकर हो'।

वक्तव्य —'ब्रह्मरुद्राश्वि'...तै'। ( च.क. ११४ ) ये दोनों श्लोक महर्षि वामभट ने अविकलरूप से चरक से लिये हैं। इनकी विस्तृत व्याख्या का अवलोकन 'चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी' से प्रकाशित चन्द्रिका व्याख्यायुक्त चरकसंहिता-उत्तरार्ध में देखें।

—पीतो मूर्हतमनुपालयेत्। तस्मनाः—

वमन की प्रतीक्षा—इस प्रकार वमनकारक औषध को पीकर उसी की ओर मन लगाकर कुछ देर तक वमन होने की प्रतीक्षा करें।

—जातहूल्लासप्रसेकच्छद्वयेतः॥ १८॥

अङ्गुलिभ्यामनायस्तो नालेन मुदनाऽथवा। गलतात्वरुजन् बेगानप्रवृत्तान् प्रवर्तयन्॥ १९॥ प्रवर्तयन् प्रवृत्तांश्च जानुतुल्यासने स्थितः। उभे पार्श्वे ललाटं च वमत्श्यास्य धारयेत्॥ २०॥ प्रपीडयेत्तथा नाभिं पृष्ठं च प्रतिलोमतः।

वमनकारक यत्न—जब जी मिचलाने लगे, मुख से लार गिरने लगे तब वमन करें। यदि वमन भलीभांति न हो रहा हो तो बिना बल लगाये दो अँगुलियों को मुख में डालकर अथवा कोमल एरण्ड की पत्ती की नली को मुख में डालकर गला तथा तालु प्रदेश को बिना पीड़ित करते हुए जो वमन के वेग नहीं आ रहे हैं उन्हें प्रवृत्त करें और जो वेग प्रवृत्त हैं उन्हें भी अधिक प्रवृत्त करें, जिससे पूर्ण रूप से वमन हो जाय। ये सभी क्रिया-कलाप जानुभर ऊँचे आसन ( कुर्सी आदि ) पर बैठकर करने चाहिए। जब वमन के वेग आ रहे हों, उस समय उसका सहायक ( परिचारक ) उसकी दोनों पसलियों तथा सिर को दबाता रहे और वमन करने वाले की नाभि तथा पीठ को दबाता रहे॥ १८-२०॥

कफे तीक्ष्णोष्णकटुकैः पिप्ते स्वादुहिमैरिति॥ २१॥

वमेत् स्निग्धाम्ललवणैः संसृष्टे मरुता कफे।

वमन में औषध-प्रयोग—कफजनित रोगों में तीक्ष्ण, उष्णवीर्य तथा कटुरस वाले औषधद्वयों से वमन कराना चाहिए, पिप्तजनित रोगों में मधुर तथा शीतवीर्य द्रव्यों से और वातजनित रोगों में स्निग्ध, अम्ल एवं लवण रसयुक्त द्रव्यों से तैयार किये गये वामक द्रव्यों का प्रयोग करें॥ २१॥

२२२

अष्टाङ्गहृदये

पित्तस्य दर्शनं यावच्छेदो वा श्लेष्मणो भवेत् ॥ २२ ॥

वमन की अवधि—वमन के सम्यग् योग का लक्षण यह है कि जब तक उसमें पित्त के दर्शन न हो जायें। यह पित्त देखने में हरा या पीला दिखता है और स्वाद में खट्टा या कड़वा होता है तथा कफ कट-कट कर या लच्छे के रूप में दिखलायी पड़े, यही पित्तदोष तथा कफदोष के निर्हरण की अन्तिम अवधि है। इन लक्षणों को देखकर वमन का सम्यक् योग समझ लेना चाहिए ॥ २२ ॥

हीनवेगः कणाधात्रीसिद्धार्थलवणोदकैः । वमेल्युनःपुनः—

हीनयोग में औषध-प्रयोग—यदि वमन के वेग कम मात्रा में आ रहे हों तो पिप्ली, आंवला, पीली सरसों तथा नमक को पीसकर जल में मिलाकर या क्वाथ बनाकर पीयें। इसको पीकर बार-बार तब तक वमन करे जब तक पित्तदोष अथवा कफदोष के दर्शन न हो जायें।

—तत्र वेगानामप्रवर्तनम् ॥ २३ ॥

प्रवृत्तिः सविबन्धा वा केवलस्यौषधस्य वा । अयोगस्तनं तिष्ठीवकण्ठूकोठञ्चरादयः ॥ २४ ॥

वमन का हीनयोग—वमनकारक औषध का पान करने पर भी वमन का न होना अथवा रुक-रुककर होना अथवा केवल पिलाये गये औषधद्वयों का ही निकल जाना—ये लक्षण वमन के अयोग में होते हैं। इसके कारण मुख से लार का चूना, शरीर में खुजली का होना, चकत्तों का निकलना तथा ज्वर आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २३-२४ ॥

निर्विबन्धं प्रवर्तन्ते कफपित्तानिलाः क्रमात् ।

( मनःप्रसादः स्वास्थं चावस्थानं च स्वयं भवेत् । वैपरीत्यमयोगानां न चातिमहती व्यथा ॥ )

सम्यग्योगे—

वमन का सम्यक् योग—वमन का सम्यक् ( ठीक-ठीक ) योग ( प्रयोग ) हो जाने पर कफ, पित्त तथा वात दोषों की प्रवृत्ति स्वयं क्रम से होती है और मन का प्रसन्न होना, स्वस्थता, स्वयं स्थिरता का अनुभव होना, वमन के अयोगों में होने वाले लक्षणों से विपरीत लक्षणों की उत्पत्ति तथा विशेष कष्ट का न होना—ये लक्षण होते हैं। यहाँ दोषों का क्रम परिवर्तन दिख रहा है, उसका आधार वमन होने की अपनी प्रक्रिया है।

—अतियोगे तु फेनचन्द्रकरक्तवत् ॥ २५ ॥

वमितं क्षामता दाहः कण्ठशोषस्तमो भ्रमः । घोरा वाक्वायमाया मृत्युर्जीवशोणितनिर्गमात् ॥ २६ ॥

वमन का अतियोग—वमन का अतियोग हो जाने पर वमन में झग निकलने लगता है, उसमें कुछ चमक तथा रक्त के कण दिखलायी पड़ते हैं, वमनकर्ता को दुर्बलता, दाह, गला का सूखना, आँखों के सामने आँधेरा दिखलायी देना, चक्करों का आना, अत्यन्त कष्टदायक वातव्याधियों पैदा हो जाती हैं और वमन में जीवरक्त के निकलने के कारण रोगी की मृत्यु भी हो जाती है ॥ २५-२६ ॥

सम्यग्योगेन वमितं क्षणमाभ्यास पाययेत् । धूम्रत्रयस्यान्यतमं स्नेहाचारमथादिशेत् ॥ २७ ॥

वमन के पश्चात् कर्म—समुचित विधि से जिसे भलीभाँति वमन हो गये हों, उसे कुछ समय तक आश्वस्त कराकर अथवा आराम करा कर तीन प्रकार के धूम्रपानों में से कोई एक धूम्रपान कराये ( इसके निर्णय का भार चिकित्सक पर होता है ) और इसके बाद उसे स्नेहपान कराना चाहिए अथवा उसे स्नेहपान करने का आदेश देना चाहिए ॥ २७ ॥

वक्तव्य—उक्त पद्य में आचार्य ने सूत्र रूप में धूम्रपान तथा स्नेहपान करने का संकेत किया है। इनका विवरण यहाँ दिया जा रहा है। धूम्रपान तीन प्रकार का होता है—१. लैहिक धूम्रपान, २. वैचनिक धूम्रपान तथा ३. उपशमनीय धूम्रपान। इनमें पहला धूम्रपान वातरोगों में हितकारक होता है, दूसरा वातकफज विकारों में और तीसरा केवल कफज विकारों को दूर करता है। इसका विवरण आगे २१वें अध्याय में विस्तार से देखें। स्नेहाचार—इसका वर्णन पिछले १६वें अध्याय में कर दिया गया है। आप देखें—श्लोक २६ से ३० तक।

वमनविरचनविधिरध्यायः १८ ]

सूत्रस्थानम्

२२३

ततः सायं प्रभाते वा भुद्धान् स्नातः सुखास्व्नुना । भुञ्जानो रक्तशाल्यन्त्रं भजेत्येयादिकं क्रमम् ॥

स्नान एवं भोजनविधि—भूलीभाति वमन हो जाने के बाद उसी दिन सायंकाल अथवा दूसरे दिन प्रातःकाल समुचित प्रकार से भूख लगने पर गुनगुने जल से स्नान करके पेया आदि के क्रम से लालशालि के चावलों द्वारा निर्मित भोजन करे ॥ २८ ॥

वक्तव्य—इस विषय पर मधुत का दृष्टिकोण—‘ततोऽपराह्ने’...‘भोजयेत्तम्’ । ( सु.चि. ३३।११ ) अर्थात् वमन अथवा विरचन कराने से शरीर के शुद्ध हो जाने पर गरम जल से स्नान कराकर कुलथी, मूँग या अरहर की दाल के यूप ( जूस ) के साथ अथवा जांगल प्राणियों के मांसरस से तथा लाल शालि-चावलों के योग से बनायी गयी पेया, विलेपी आदि को खिलायें। यहाँ जो वाग्भट ने रक्तशालिधान्य का ग्रहण किया है, इस सम्बन्ध में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है—‘लोहितशाल्यः शुक्लाध्यान्यां पय्यतमत्वे श्रेष्ठतमाः’ । ( च.सू. २५।३८ ) अर्थात् लालशालि के चावल स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिए हितकर होते हैं।

पेयां विलेपीमकृतं कृतं च यूपं रसं त्रीनुभयं तथैकम् ।

क्रमेण सेवेत नरोऽन्नकालान् प्रधानमध्यवारशुद्धिशुद्धः ॥ २९ ॥

पेया आदि क्रम-निर्देश—प्रधान, मध्य तथा अवर भेद से शरीर-शुद्धि तीन प्रकार की होती है। सामान्य रूप से दो अन्नकाल ( भोजन के समय ) होते हैं—१. प्रातःकाल तथा २. सायंकाल। वमन-विरचन से शुद्ध किये गये पुरुष के आहार-भेद छः होते हैं—१. पेया, २. विलेपी, ३. अकृतयूप, ४. कृतयूप, ५. अकृत-मांसरस तथा ६. कृतमांसरस। प्रधानशुद्धि-विधि से शुद्ध पुरुष ३-३ अन्नकालों में ऊपर कही गयी पेया, विलेपी आदि का सेवन करता हुआ इस कल्प के पूरा होने पर अर्थात् १८वें दिन के बाद स्वाभाविक रूप से भोजन करे। मध्यशुद्धि-विधि से शुद्ध पुरुष २-२ अन्नकालों में उक्त पेया आदि का सेवन कर लेने पर १२वें दिन के बाद स्वाभाविक भोजन करे और अवरशुद्धि-विधि से शुद्ध पुरुष १-१ अन्नकाल में पेया आदि का छः दिनों तक सेवन करने के बाद स्वाभाविक भोजन करे ॥ २९ ॥

वक्तव्य—आचार्य वाग्भट ने उक्त श्लोक को चरकसंहिता-सिद्धिस्थान १।११ से लिया है। पेया, विलेपी, यवागु, यूप आदि का वर्णन शास्त्रसंहिता म.खं. २।१६४-१७४ में भी देखें। ‘अकृत’ उन्हें कहा जाता है, जिन्हें न छोँका जाता है और न जिनमें सोठ, नमक आदि मसाले डाले जाते। इसके विपरीत गुणों वाले भोजन को ‘कृत’ कहते हैं।

यथाऽगुरग्रिस्तृणगोमयाद्यैः सन्धुभ्यमाणो भवति क्रमेण ।

महान् स्थिरः सर्वपचस्तथैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तराग्निः ॥ ३० ॥

पेया आदि से लाभ—जैसे अप्रिकण को तृण ( घास-फूस ) तथा गोमय ( गोहरी, कण्डा, बनोपल ) आदि के संयोग से सुलगाने ( प्रज्वलित करने ) से वह अग्नि महान् ( पहले की तुलना में बड़ा ), स्थिर तथा सब पदार्थों को पकाने या पचाने वाला होता है; ठीक वैसे ही पेया, विलेपी आदि सुपचभय्यों के सेवन करने से जठराग्नि भी सशक्त ( खाये हुए भोजन को पचाने में समर्थ ) हो जाता है ॥ ३० ॥

जघन्यमध्यप्रवरे तु वेगाश्वत्वार इष्टा वमने षडष्टी ।

दशैव ते द्वित्रिगुणाविरके प्रस्थस्तथा स्यादद्विचतुर्गुणश्च ॥ ३१ ॥

वमन-विरचन के वेग एवं परिमाण—जघन्य ( हीन ), मध्यम तथा प्रवर ( प्रधान ) भेद से क्रमशः ४, ६ एवं ८ वेग वमनों में होते हैं तथा विरचनों में वे वेग क्रमशः १०, २० तथा ३० होते हैं। इन विरचनों में निकलने वाले मल का क्रमशः भार जघन्य विरचन में १ प्रस्थ, मध्यम विरचन में २ प्रस्थ तथा प्रवर विरचन में ४ प्रस्थ बतलाया गया है ॥ ३१ ॥

पित्तावसानं वमनं विरेकादर्द्धं, कफान्तं च विरेकमाहुः ।

२२४

अष्टाङ्गहृदये

वमन-विरेचन की अवधि एवं मान—पित्त के निकलने तक वमन कराना चाहिए। इस वमन द्रव का मान विरेचनों में निकले मल के भार से आधा होना चाहिए। इसमें भी जघन्य, मध्य, प्रवर भेद से भार का निर्धारण कर लेना चाहिए और विरेचन को तब पूर्ण समझें जब उसके अन्त में कफ निकल जाय।

द्विजान् सविट्कानपनीय वेगान् मेयं विरेके, वमने तु पीतम् ॥ ३२ ॥

भारमापन-विधि—यह भार तीलने की प्रक्रिया मल के दो अथवा तीन वेगों के निकल जाने के बाद में करनी चाहिए। वमन में पहले पिलये या पीये गये मद्य आदि द्रव पदार्थों अथवा वमनकारक क्वाथ की मात्रा को छोड़ कर ही तीलना चाहिए ॥ ३२ ॥

वक्तव्य—श्रीवाग्भट ने ब.सि. १।१४ से उक्त श्लोक को अविकल उद्धृत किया है। बरक में भलीभाँति कराये गये विरेचन के ये लक्षण दिये हैं—‘म्रीतों की शुद्धि, इन्द्रियों की निर्मलता, शरीर में हलकापन, उत्साहशक्ति की प्राप्ति, अग्नि का प्रदीप्त होना, नीरोगता, क्रमशः मल, पित्त, कफ तथा अपानवायु का निकलना’ ॥ देखें—ब.सि. १।१७। ध्यान दें—कभी-कभी पित्तान्त एवं कफान्त में भले ही भ्रम हो जाय परन्तु सम्यक् वान्त तथा सम्यक् विरिक्त के जो लक्षण कहे गये हैं, उनके दर्शन होने पर वमन-विरेचन का सम्यक् योग हो गया है, ऐसा समझें।

अथैनं वामितं भूयः स्नेहस्वेदोपपादितम्। श्लेष्मकाले गते ज्ञात्वा कोष्ठं सम्यग्विरेचयेत् ॥ ३३ ॥

वमन के बाद विरेचन—वमन कराने के बाद पुनः विधिपूर्वक स्नेहन-स्वेदन कराकर श्लेष्मकाल (प्रातःकाल) के बीत जाने पर रोगी अथवा स्वस्थ पुरुष के कोष्ठ (मुहु, मध्य, कूर भेद से) का विचार करके विरेचनोपयोगी औषधि का प्रयोग करा कर उसे विरेचन कराये ॥ ३३ ॥

वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने वमन के बाद विरेचन कराने की विधि का समुचित वर्णन ब.सू. १५।१७ में किया है, प्रसंगवश इसका अवलोकन कर लें।

बहुपित्तो मुहुः कोष्ठः क्षीरेणापि विरिच्यते।

मुहुकोष्ठ का वर्णन—जिस पुरुष के शरीर में पित्तदोष की प्रधानता होती है, उसे ‘मुहुकोष्ठ’ वाला कहते हैं। ऐसे पुरुषों को गरमा-गरम दूध पीने मात्र से विरेचन हो जाता है।

प्रभूतमास्तः कूरः कृष्णशुष्कचामादिकैरपि ॥ ३४ ॥

कूरकोष्ठ का वर्णन—जिस पुरुष के शरीर में वातदोष की प्रधानता होती है, उसे ‘कूरकोष्ठ’ वाला कहते हैं। ऐसे पुरुषों को काली निशोथ, जो तीक्ष्ण विरेचक होती है, के प्रयोग से भी बड़े कष्ट के साथ विरेचन हो पाता है ॥ ३४ ॥

कर्पायमधुरैः पित्ते विरेकः, कटुकैः कफे। स्निग्धोष्णलवणैर्वायी—

दोषानुसार विरेचन—पित्तज विकारों में कषाय तथा मधुर रस-प्रधान द्रव्यों द्वारा विरेचन देना चाहिए। कफज विकारों में कटुस-प्रधान द्रव्यों से विरेचन दें और वातज विकारों में स्निग्ध तथा उष्णवीर्य द्रव्यों में लवण मिलाकर विरेचन देना चाहिए।

—अप्रवृत्ती तु पाययेत् ॥ ३५ ॥

उष्णाम्बु, स्वेदयेदस्य पाणितापेन चोदरम्।

विरेचक-उपाय—यदि उक्त औषध-प्रयोग करने पर भी विरेचन न हो रहा हो तो उसे गुनगुना जल पिलाया चाहिए और हाथों को सेंक कर उसके पेट को सेंकें। इन उपायों से विरेचन हो जाता है ॥ ३५ ॥

उत्थानेऽल्पे दिने तस्मिन्भुक्त्वाऽन्येद्युः पुनः पिबेत् ॥ ३६ ॥

अदृढस्तेहकोष्ठस्तु पिबेदूर्ध्वं दशाहतः। भूयोऽप्युपकृतततनुः स्नेहस्वेदविरेचनम् ॥ ३७ ॥

यौगिकं सम्यगालोच्य स्मरन्पूर्वमतिक्रमम्।

वमनविरचनविधिरध्यायः १८ ]

सूत्रस्थानम्

२२५

पुनःविरचन-प्रयोग —इस विधि से यदि अल्पमात्रा में भी विरचन हो तो उस रात्रि में उसे थोड़ा-सा हलका आहार ( दलिया, खिचड़ी आदि ) खिलाकर दूसरे दिन फिर उसे विरचक औषधि पिलायी जाय। उदरप्रदेश का भलीभाँति स्नेहन न होने के कारण यदि विरचन न हुआ हो तो उसे फिर दस दिन के बाद विरचन करने के लिए औषध-सेवन कराये। इसके पूर्व स्नेहन-स्वेदन का प्रयोग भी अवश्य करें। इस बार भी औषधयोग का समुचित विधान तथा उसे अभिमन्त्रित कर तभी उसका सेवन करना चाहिए॥ ३६-३७॥

हल्कुक्ष्यशुद्धिरुचिहल्कृत्वेः श्लेष्मपित्तयोः ॥ ३८ ॥

कण्डूविदाहः पिटिकाः पीनसो वातविड्ग्रहः । अयोगलक्षणम्—

हीनयोग ( अयोग ) के लक्षण —हृदय एवं उदर की ठीक प्रकार से शुद्धि का न होना, अतएव भारीपन की प्रतीति, अरुचि, कफ तथा पित्त के उभड़ जाने से जी मिचलाने की जैसी प्रतीति का होना, खुजली, जलन, शरीर में पिड़काओं की उत्पत्ति, पीनस ( प्रतिशय ), अपानवायु, मूत्र एवं पुरीष की प्रवृत्ति में हकावट का होना—ये लक्षण होते हैं॥ ३८ ॥

—योगो वैपरीत्ये यथोदितात् ॥ ३९ ॥

समयोग के लक्षण —ऊपर कहे गये हीनयोग के लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना समयोग कहा जाता है। यह तन्त्रकार द्वारा सूत्ररूप में निर्देश है॥ ३९ ॥

विद्विपित्तकफवातेषु निःसृतेषु क्रमात्मवेत् । निःश्लेष्मपित्तमुदकं श्वेतं कृष्णं सलोहितम् ॥ ४० ॥

मांसधवनतुल्यं वा भेदःखण्डभसेव वा । गुदनिःसरणं तृष्णा भ्रमो नेत्रप्रवेशनम् ॥ ४१ ॥

भवन्त्यतिविरिक्तस्य तथाऽतिवमनामयाः ।

अतियोग के लक्षण —इस प्रकार के विरचन में पहले पुरीष ( मल ), फिर पित्त, कफ तथा अपान-वायु के निकल जाने पर भी कफ एवं पित्त रहित मलद्वार से सफेद, काला तथा लाल अथवा मांस को घोने से जैसा वर्ण जल का हो जाता है, वैसा जल निकलने ल्याता है अथवा भेदस् के टुकड़ों का घ्राव होता है, गुदभ्रंश ( कौंच का निकलना ), बार-बार प्यास का लगना, चक्करों का आना, आँखों का भीतर की ओर को धँस जाना तथा विरचन के अतियोग होने पर वमन के अतियोग के लक्षण भी दिखलायी देने लगते हैं॥ ४०-४१ ॥

वक्तव्य —वमन के अतियोग के लक्षण इसी अध्याय के २६वें श्लोक में देखें। अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान अध्याय ८ में आमविष के लक्षणों से वमन तथा विरचन के अतियोग लक्षणों का मिलान करें। इसी 'आमविष' के कारण ही विस्मृत्तिका की उत्पत्ति होती है।

सम्यग्विरिक्तमेव च वमनोक्तेन योजयेत् ॥ ४२ ॥

धूमवर्ज्येन विधिना—

समयोग में पश्चातुक्तम् —विरचन-विधि का सम या सम्यक् योग हो जाने पर धूमपान-विधि के बिना वमनोत्तर विधि के उपचारों से इसे जोड़ें अर्थात् इसे स्नेहाचार कराये॥ ४२ ॥

—ततो वसितवानिव । क्रमेणान्नानि भुञ्जानो भजेत्कृतिभोजनम् ॥ ४३ ॥

समयोग में भोजन-विधि —स्नेहन करने के बाद समुचित वमन कराये गये पुरुष के समान लाल शालिचावलों की पेया, विलेयी आदि का भोजनकाल में सेवन करता हुआ वह बाद में स्वाभाविक भोजन का सेवन करें॥ ४३ ॥

मन्दवहिमतंशुद्रमक्षमं दोषदुर्बलम् । अदृष्टजीर्णलिङ्गं च लङ्घ्येत्पीतभेषजम् ॥ ४४ ॥

लंघन-निर्देश —विरचन करने के बाद यदि अग्नि मन्द पड़ गया हो, भलीभाँति संशोधन न हो सका हो, रोगी दुर्बल न हो, दोषों की वृद्धि से दुर्बलता आ गयी हो अथवा अपच के लक्षण दिखलायी दे रहे हों तो इन सभी स्थितियों में विरचक औषध का पान किये हुए रोगी पुरुष को लंघन कराये॥ ४४ ॥

स्नेहस्वेदौषधोत्कृत्तेशसङ्घैरिति न बाध्यते ।

१५ अ० ह०

२२६

अष्टाङ्गहृदये

लंघन का फल—लंघन या उपवास करने से स्नेहन तथा स्वेदन विधियों का सेवन करने के कारण जो मिचलाने से तथा मल-मूत्र आदि मलों की स्कावट से उत्पन्न होने वाली किसी प्रकार की बाधा से पीड़ित नहीं होता।

संशोधनासविद्यावस्नेहयोजनलङ्घनैः ॥४५॥

यात्यग्रिमन्दतां तस्मात् क्रमं पेयादिमाचरेत्।

पेया आदि की आवश्यकता—वमन, विरेचन, रक्तप्रावण, स्नेहपान तथा लंघन करने के बाद प्रायः जठराग्नि मन्द पड़ जाती है, अतः पेया आदि का आचरण ( सेवन ) करना चाहिए॥ ४५॥

सुताल्पपित्तश्लेष्माणं मद्यपं वातपैतिकम्॥४६॥

पेयां न पाययेत्तेषां तर्पणादिक्रमो हितः।

पेया-सेवन का निषेध—जिसका पित्त तथा कफ थोड़ा-सा निकला हो, जो मद्यपान का अभ्यासी हो, जो वातपित्तज विकारों से पीड़ित हो—इन सभी को पेया का सेवन न करायें। इनके लिए तर्पण ( सन्तर्पण ) चिकित्सा लाभदायक होती है॥ ४६॥

वक्तव्य—च.सू.अ. २३ सम्पूर्ण में तथा अष्टांगहृदय १४८-९ में इस विषय को देखें।

अपक्वं वमनं दोषान् पच्यमानं विरेचनम्॥४७॥

निर्हरिद्रमनस्यातः पाकं न प्रतिपालयेत्।

वमन-विरेचन की प्रतीक्षा—वमनकारक औषधद्रव्य सेवन करने के पश्चात् बिना पचे ही दोषों को निकाल देते हैं और विरेचनकारक औषधद्रव्य पचते हुए अर्थात् कुछ देर से दोषों को निकालते हैं। अतएव वमनकारक औषधद्रव्य की देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए॥ ४७॥

वक्तव्य—उक्त ४७वाँ श्लोक श्रीवामभट ने च.क. १२६२ से अविकल रूप में उद्घुट करने पर भी 'दोष' के स्थान पर 'दोषान्' पाठभेद किया है।

दुर्बलो बहुदोषश्च दोषपाकेन यः स्वयम्॥४८॥

विरिच्यते भेदनीयेभोज्येस्तमुपादयेत्।

वमन-विरेचन की चिकित्सा—यदि उदर सम्बन्धी दोष अधिक हों और रोगी दुर्बल हो, ऐसी स्थिति में दोषों का पाक हो जाने के कारण औषधद्रव्यों के प्रयोग किये बिना यदि स्वयमेव विरेचन हो रहे हों तो उसे मलभेदक आहारों का प्रयोग कराना चाहिए॥ ४८॥

वक्तव्य—स्वयमेव होने वाले वमन या विरेचन को तत्काल रोकने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए, अपितु उनकी गतिविधि की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि वे दोष निकल जाने पर स्वयं शान्त हो जाते हैं, तो इसे ईश्वर की कृपा समझें। यदि इनका क्रम चालू रह जाता है तो इनकी चिकित्सा करें।

दुर्बलः शोथितः पूर्वमल्पदोषः कुशो नरः॥४९॥

अपरिज्ञातकोष्ठश्च पिबेन्मृदुल्पमौषधम्।

मृदु विरेचन का निर्देश—जो सम्प्रति दुर्बल हो, जिसे पहले संशोधन कराया जा चुका हो, जिसके उदरप्रदेश में थोड़ा दोष शेष रह गया हो, जो मनुष्य कुश हो और जिसके कोष्ठ के सम्बन्ध में भलीभाँति जानकारी न हो कि यह व्यक्ति क्रूर कोष्ठ वाला है या मृदु कोष्ठ वाला है, उसे वमन या विरेचन कारक पहले मृदु औषध अल्प मात्रा में दें॥ ४९॥

वरं तदसकृत्पीतमन्यथा संशयावहम्॥५०॥

हरेद्रहृंश्चलान्दोषानल्पानल्पान् पुनःपुनः।

औषध-प्रयोग में सावधानी—वमन या विरेचनकारक औषधि को थोड़ा-थोड़ा बार-बार पीना अच्छा ( समझदारी ) है और एक साथ अधिक मात्रा में औषध का सेवन करना हानिकारक हो सकता

वमनविरचनाविधिरध्यायः १८ ]

सूत्रस्थानम्

२२७

है। अतएव अधिक दोषों को अथवा स्वयं निकलने वाले दोषों को थोड़ा-थोड़ा बार-बार निकल जाने देना चाहिए ॥५०॥

दुर्बलस्य मृदुद्वयैरल्पात् संशमयेत् तान् ॥५१॥

दुर्बल के दोषों पर विचार—दुर्बल (कमजोर) पुरुष के थोड़े दोषों को मृदुविरचक द्रव्यों द्वारा यथासम्भव शमन-चिकित्सा द्वारा शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिए ॥५१॥

क्लेशयन्ति चिरं ते हि हन्युर्वैनमनिर्हृताः ।

दोषनिर्हरण की आवश्यकता—यदि स्ल्पमात्रा में बचे हुए वे दोष शोघन-विधि से नहीं निकाले जाते तो वे उस पुरुष को चिरकाल तक कष्ट देते रहते हैं अथवा इसे मार डालते हैं।

वक्तव्य—इसी विषय को दृष्टि में रखकर भगवान् पुनर्वसु ने भी कहा है—‘दुर्बलोऽपि महादोषो विरच्यो बहुशोऽल्पशः । मृदुभिर्भेषजैर्दोषा हन्युर्वैनमनिर्हृताः’ ॥ (च.क. १२।६९)

मन्दाग्निं कूरकोष्ठं च सक्षारलवणैर्घृतैः ॥५२॥

सन्धुक्षिताग्निं विजितकफवार्तं च शोधयेत् ।

पुनः शोघन-निर्देश—मन्दाग्नि तथा कूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को जवाखार तथा लवण मिले हुए घी का सेवन कराकर उनकी जठराग्नि को प्रदीप्त करे और उसके कफ एवं वार्त दोष पर विजय प्राप्त करें, तदनन्तर उनका संशोधन करें ॥५२॥

रूक्षबह्निरलिकूरकोष्ठव्यायामशीलिनाम् ॥५३॥

दीप्ताग्निनां च भेषज्यमविरच्यैव जीर्यति । तेष्यो बस्तिं पुरा दद्यात्ततः स्निग्धं विरेचनम् ॥५४॥

शकुन्त्रिर्हृत्य वा किञ्चित्तीक्ष्णाभिः फलवर्तिभिः । प्रवृत्तं हि मलं स्निग्धो विरेको निहरैत्सुखम् ॥

विरचन में विविध विचार—जिनका कोष्ठ रूक्ष (रूखा) है, वातदोष अवरुद्ध है, जिनका कोष्ठ कूर है, जो निरन्तर व्यायाम किया करते हैं तथा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त है; इस प्रकार के व्यक्तियों को दी गयी विरेचनकारक औषधि बिना अपना कार्य (विरचन) किये ही पच जाती है। ऐसे पुरुषों को विरेचक औषध देने से पहले अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए अथवा तीक्ष्ण विरेचक द्रव्यों द्वारा बनायी गयी फलवर्ति का गुद में प्रवेश कराये। इससे जब थोड़ा मल निकल जाय तब स्निग्ध विरेचन देना चाहिए, इस विधि से मल सुखपूर्वक निकल आता है ॥५३-५५॥

विषाभिघातपिटिकाकुष्ठशोफविसर्पिणः । कामलापाण्डुमेहार्तात्रातिस्निग्धान् विशोधयेत् ॥

शोघन के अयोग्य रोगी—विषविकार, अभिघात, पिडका, कुष्ठ, शोथ, विसर्प, कामला, पाण्डुरोग तथा प्रमेहरोग से पीड़ित व्यक्तियों को थोड़ा-सा स्नेहन कराकर तभी विरेचन-औषधि का प्रयोग कराना चाहिए। विरेचन-देने के पहले स्नेहन कराना आवश्यक है किन्तु जिन्हें स्नेहन-प्रयोग कराया गया है, उन्हें रूक्ष विरेचन देना हितकर होता है ॥५६॥

सर्वान् स्नेहविरैकैश्च, रूक्षैस्तु स्नेहभावितान् ।

शोघन के भेद—जिनका थोड़ा-सा स्नेहन किया गया है, विष-सेवन से पीड़ित जो थोड़े रूक्ष हैं इनका स्नेहयुक्त विरेचक औषधों द्वारा शोघन करना चाहिए और जिनका भलीभाँति स्नेहन किया गया हो उनका रूक्ष विरेचक पदार्थों द्वारा शोघन करना चाहिए।

कर्मणां वमनादीनां पुनरप्यन्तेऽन्तेरे ॥५७॥

स्नेहस्वेदी प्रयुज्जीत, स्नेहमन्ते बलाय च ।

स्नेहन-स्वेदन प्रयोग—वमन तथा विरेचन जब कराये जा रहे हों उस काल में इनके बीच-बीच में बार-बार स्नेहन एवं स्वेदन प्रयोग कराते रहने चाहिए। ऐसा न तोच लें कि प्रारम्भ में तो स्नेहन-स्वेदन करा दिये थे, वे ही पर्याप्त हैं। प्रत्येक प्रकार की चिकित्सा-विधि के अन्त में रोगी का बल बढ़े, इस सदिच्छा से उसे स्नेहन कराना चाहिए ॥५७॥

२२८

अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य —भगवान् धन्वन्तरि ने स्नेह को जीवनोंपयोगी बतलाते हुए इस प्रकार कहा है—‘स्नेहसारोऽयं पुरुषः’...‘द्योज्यः’। (सु.चि. ३१।३) अर्थात् यह पुरुष स्नेह के सहारे ही स्वस्थ रह पाता है और प्राणों का भी मुख्य आधार स्नेह ही है। प्रायः रोग भी स्नेहसाध्य होते हैं, अतः स्नेह का प्रयोग पीने, अनुवासन, शिरोविरेचन, शिरोबस्ति, उत्तरबस्ति, तस्य, कर्णपूरण (कान में डालने), शरीर पर मालिश करने तथा भोजन के साथ किया जाता है।

मलो हि देहादुत्कलेश्य ह्रियते वासतो यथा ॥५८॥

स्नेहस्वेदेस्तथोत्किल्लघ्वः शोध्यते शोधनैर्मलः।

मलों का उत्कलेशन —जिस प्रकार कपड़ा पर जमी हुई मैल को स्नेहन (स्नेह तथा क्षार प्रधान पदार्थ साबुन) तथा स्वेदन (गरम पानी) द्वारा उभाड़ कर निकाला जाता है, उसी प्रकार शरीर स्थित मलों को स्नेहन एवं स्वेदन विधियों से उत्कलेशन (उभाड़) कर वमन एवं विरेचन नामक शोधनों से बाहर निकाल दिया जाता है ॥५८॥

स्नेहस्वेदावनभ्यस्य कुर्यात्संशोधनं तु यः ॥५९॥

द्वार शुष्कमिवानामे शरीरं तस्य दीर्यते।

स्नेहन-स्वेदन के लाभ —स्नेहन तथा स्वेदन का अभ्यास (निरन्तर सेवन) किये बिना जो रोगी संशोधन का प्रयोग करता है, उसका शरीर उस प्रकार फट जाता है जैसे स्नेहन तथा स्वेदन किये बिना झुकाने का प्रयत्न करने पर सूखी लकड़ी टूट या फट जाती है ॥५९॥

बक्तव्य —सामान्य रूप से स्नेहन-स्वेदन किये कराये बिना वमन तथा विरेचन होते भी हैं और कराये भी जाते हैं। यहाँ जो प्रमुख रूप से स्नेहन-स्वेदन की चर्चा है, वह पञ्चकर्म-विधि को ध्यान में रखकर ही की गयी है।

बुद्धिप्रसादं बलमिन्द्रियाणां धातुस्थिरत्वं ज्वलनस्य दीपितम्।

चिराच्च पाकं वयसः करोति संशोधनं सम्यगुपास्यमानम् ॥६०॥

इति श्रोवैद्यपतिसिंहगुप्तसुश्रुतमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने वमनविरेचनविधिर्नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥


संशोधन से लाभ —शास्त्रोक्त विधि द्वारा सेवन किया गया संशोधन (वमन-विरेचन) बुद्धि को निर्मल करता है, इन्द्रियों को बल प्रदान करता है, रस-रक्त आदि धातुओं में स्थिरता ला देता है, ज्वलन (जठराग्नि) को प्रदीप्त कर देता है और चिरकाल तक वृद्धावस्था को समीप नहीं आने देता। ये ही भाव जीवन में अपेक्षित होते हैं ॥६०॥

बक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने संशोधन-विधियों की प्रशंसा इस प्रकार की है—‘दोषाः कदाचित् कुर्यान्ति जिता लङ्घनपाचनैः। जिताः संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भवः’ ॥ (च.सु. १६।२०) अर्थात् लंघन एवं पाचन विधियों से शान्त किये वात आदि दोष कभी-कभी फिर भी कुपित हो जाते हैं, किन्तु संशोधन-विधि से जिनका निर्हरण कर दिया जाता है, उनकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती। यही संशोधन-विधि की प्रमुखता है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

वमन-विरेचनविधि नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८॥


एकोनविंशोऽध्यायः

अथातो बस्तिविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह् स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से बस्तिविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले १८वें अध्याय में वमन-विरेचन विधियों से मलों के निर्हरण-विधि का वर्णन किया गया था। बस्ति के प्रयोग से भी मल का निर्हरण किया जाता है, अतएव यहाँ वमन-विरेचन के वर्णन करने के बाद तदनुरूप बस्तिविधि का उपदेश किया जा रहा है।

बस्ति या बस्ति शब्द पर विचार —अमरकोश की रामाश्रमी टीका में 'बस्ति' शब्द की निरुक्ति—'वस निवासे' तथा 'वस आच्छादने' धातुओं से की गयी है। यहाँ वस धातु से 'वसेस्तिः' (उ. ४।१८०) सूत्र के अनुसार 'ति' प्रत्यय का योग होने से उक्त शब्द की निष्पत्ति हुई है। इसका अर्थ है—'वसति मूत्रम् अत्र', जो सर्वथा प्रसंगोचित अर्थ है। तदाकार इस यन्त्र के होने के कारण इसे भी 'बस्तियन्त्र' कहा जाता है।

बस्ति —बी.एस. आटे ने अपने कोश में 'बस्त + षच्' = बकरा, ऐसा विवरण दिया है। जहाँ बस्ति के लिए अनेक प्राणियों के चर्म आदि को लेने का विधान किया है, वहाँ अन्त में उल्लिखित 'बस्त' का ग्रहण कर उसके नाम के अनुसार इसका नाम 'बस्ति' स्वीकार कर लेना अधिक समीचीन प्रतीत नहीं होता। देखें बस्ति-निर्माण के लिए उपयोगी चर्म—सु.चि. ३५।१३ तथा च.सि. ३।१०-११। इसके बाद भी चरक-सुश्रुत आदि संहिताओं में बस्ति शब्द में 'ब' के स्थान पर 'ब' का ही प्रयोग अधिकांश देखा जाता है। आचार्य पुरुषोत्तमदेव ने स्वरचित 'बर्णदेशना' नामक ग्रन्थ में ब, व; न, ण; य, ज; श, स आदि के औचित्य पर संक्षेप में विचार किया है, आप भी उसका अनुशोल्न करें।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सि. १, २, ३; सु.चि. ३५, ३७ तथा ३८; अ.सं.सू. २८ में देखें।

वातोल्बणेषु दोषेषु वाते वा बस्तिरिष्यते। उपक्रमानां सर्वेषां सोऽग्रणीस्त्रिविधस्तु सः ॥ १ ॥ निरुहोऽन्वासनं बस्तिरुत्तरः—

बस्ति का प्रयोग —वात-प्रधान दोषों में अथवा केवल वातदोष में भी बस्ति का प्रयोग करना चाहिए। बस्ति को सभी उपक्रमों (चिकित्साविधियों) में अग्रगण्य (प्रमुख) माना जाता है। यह विधिभेद से तीन प्रकार की होती है—१. निरुह या निरुहण या आस्थापन, २. अन्वासन (अनुवासन) तथा ३. उत्तरबस्ति ॥ १ ॥

बक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने बस्ति-प्रयोग की उपयोगिता को देखकर अपना तथा दूसरों का मत इस प्रकार उपस्थापित किया है—'तस्मात् चिकित्साधर्मिति ब्रुवन्ति सर्वा चिकित्सामपि बस्तिमेके' ॥ (च.सि. १४०) अर्थ स्पष्ट है।

—तेन साध्येत्। गुल्मानाहवुडफ्फ्हीहशुद्धातीसारशूलिनः ॥ २ ॥

जीर्णज्वरप्रतिशयायशुक्रानिलमलग्रहान्। वधर्माश्रमीरजोनाशान् दारुणांश्वानिलामयान् ॥ ३ ॥

बस्ति-प्रयोग से लाभ —निरुहणबस्ति के प्रयोग से गुल्म, आनाह, खुडरोग (वातरक्तरोग)—वै. निघण्टु), प्लीहविकार, शुद्धातिसार (आमदोषप्रहित अतिसार), शूल, जीर्णज्वर, प्रतिशयाय, शुक्रग्रह (शुक्र की रुकावट या शुक्रोदावर्त), वातग्रह, मलग्रह, वृद्धिरोग, अश्रमी (पथरी हो जाने पर कभी-कभी जो मूत्र में रुकावट आ जाती है), रजोरोध तथा वातज भीषण रोग शान्त हो जाते हैं ॥ २-३ ॥

२३०

अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य —भगवान् धन्वन्तरि ने बस्तियों को दो भागों में बाँटा है। यथा—१. निरुहण तथा २. स्नेहन। आस्थापन और निरुहण ये नैरुहिक बस्ति के पर्यायवाची नाम हैं। इसी का भेद है—माधुवैलिकबस्ति और इसके पर्याय हैं—यापनाबस्ति, युक्तस्थबस्ति एवं सिद्धबस्ति। शरीर से दोषों को निकालने अथवा शरीर का रोहण करने के कारण इसे निरुहणबस्ति कहते हैं। आयु (यौवन) को स्थिर रखने के कारण इसी को आस्थापनबस्ति कहते हैं। माधुवैलिकबस्ति का वर्णन आगे निरुहण-चिकित्सा प्रसंग में कहा जायेगा। यथाप्रमाण कही हुई बस्ति के परिमाण में से चौथा भाग निकालने पर स्नेहबस्ति का ही भेद अनुवासनबस्ति नाम से कहा जाता है। शरीर के भीतर रह जाने पर भी जो दूषित नहीं होती अथवा जिसका प्रयोग प्रतिदिन किया जा सकता है, अतएव इसे 'अनुवासनबस्ति' कहते हैं। इसी का एक भेद है—'मात्राबस्ति'। इसमें आधे से भी आधी मात्रा ली जाती है। इसमें किसी प्रकार के परिहार की आवश्यकता नहीं होती है। देखें—सु.चि. ३५।१८।

बस्ति-परिचय —अनुवासनबस्ति की परिभाषा तो ऊपर दी गयी है। यथा—'अनुवसन् अपि न दुष्यति' अथवा 'अनुद्विसं दीयते इति अनुवासनः'। अर्थ ऊपर दिया है। यह अनुवासनबस्ति की उत्तम परिभाषा है। यापनाबस्ति —जिन बस्तियों के प्रयोग से मानव तथा स्त्री को दीर्घकाल तक युवा-युवती बनाये रखा जा सके, उन्हें 'यापनाबस्ति' कहते हैं। युक्तस्थबस्ति —आचार्य चक्रपाणि ने उक्त बस्ति का परिचय इस प्रकार दिया है—घोडे जुते हुए स्थ में बैठकर तत्काल जाने वाले व्यक्ति को भी किसी प्रकार की तैयारी किये बिना भी यह बस्ति दी जा सकती है और देने के बाद किसी प्रकार का परहेज भी इसमें नहीं करना पड़ता, यही उक्त नाम की सार्थकता है। मात्राबस्ति —'षट्पल्लौ तु भवेच्छ्रेष्ठा मध्यमा त्रिपल्ली भवेत्। कनीयस्यध्यर्धपला विधा मात्राऽनुवासनं'॥ अर्थात् चौबीस पल में से चतुर्थश (६ पल) स्नेह लेने से अनुवासनबस्ति की उत्तम मात्रा होती है। तीन पल की मध्यम मात्रा और डेढ़ पल की कनीयसी मात्रा होती है। भगवान् पुनर्वसु का कथन है —'निरुहपादांशमेन तैलम्' अर्थात् चौबीस पल निरुहद्रव्य के होने पर छः पल स्नेह की मात्रा चतुर्थश होती है, यह उत्तम मात्रा है। इसी क्रम में मध्यम तथा कनीयसी मात्रा को भी समझे। आचार्य गयी के अनुसार —६ पल स्नेहबस्ति में, ३ पल अनुवासनबस्ति में और १३ पल मात्राबस्ति में स्नेह की मात्रा होती चाहिए। उत्तरबस्ति—जो बस्ति स्त्री अथवा पुरुष के मूत्रमार्ग में दी जाती है, उसे उत्तरबस्ति कहते हैं। इसके भी निरुहण तथा अनुवासन नाम से दो भेद होते हैं।

अनास्थाप्यास्त्वत्तिस्निग्धः क्षतोरस्को भृशं कुशः। आमातिस्तारी बमिमान् संशुद्धो दत्तनावनः॥

श्वसकासप्रसेकाशौहिध्याध्मानाल्यवहयः। शूनपायः कूताहारो बद्धच्छिद्रादकोदरी॥५॥

कुष्ठी च मधुमेही च मासान् सप्त च गर्भिणी।

निरुहण के अयोज्य —जिसे अधिक स्नेहपान कराया गया हो, उःक्षत का रोगी, अत्यन्त कुश (दुर्बल), आमज अतिसार का रोगी, छर्दि ( वमन ) का रोगी, वमन-विरचन कराने के तत्काल बाद, जिसे नस्य का प्रयोग कराया गया हो, श्वासरोगी, कासरोगी, प्रसेक ( कफदोष की वृद्धि के कारण जिसके मुख से लार निकल रही हो ) का रोगी, अशौरिणी, हिचकी का रोगी, आध्यान, मन्दाग्नि, जिसके गुदप्रदेश में सूजन हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, बद्धगुदोदर, छिद्रोदर तथा जलोदर का रोगी, कुष्ठरोगी, मधुमेह का रोगी और जिसके गर्भ को सात मास हो गये हों ऐसी स्त्री को भी आस्थापन ( निरुहण ) बस्ति का प्रयोग नहीं कराना चाहिए॥४-५॥

बक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने व.सि. २।१४ में जिन रोगियों को अनास्थाप्य कहा है, उनका परिगणन तो श्रीवाग्भट ने उक्त श्लोकों में प्रायः कर दिया है, किन्तु जिन्हें चरक ने सि. २।१४-१५में गद्य द्वारा कहा है उनका उल्लेख नहीं किया। अस्तु, उन्हें आप चरक के उक्त सन्दर्भ में देख लें। जिसे श्रीवाग्भट ने 'मासान् सप्त च गर्भिणी' कहा है, उसके स्थान पर चरक में 'आमप्रजाता' पाठ है, आप ऐसी स्थिति में भी निरुहणबस्ति का प्रयोग न करें।

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३१

आस्थाप्य एव चान्वास्या विशेषादतिबहव्यः ॥६॥

रूक्षाः केवलवातार्ताः—

निरुहण एवं अनुवासन के योग्य—जो व्यक्ति आस्थापन (निरुहण) बस्ति के योग्य होते हैं वे ही अनुवासनबस्ति के योग्य भी होते हैं। विशेष करके जिनकी जठराग्नि अत्यधिक तीव्र हो, जो रुक्षशरीर वाले हों और जो केवल वातदोष से पीड़ित हों उन्हें अनुवासनबस्ति का प्रयोग करना चाहिए ॥६॥

—नानुवास्यास्त एव च। येऽनास्याप्यास्तथा पाण्डुकामलामेहपीनसाः ॥७॥

निरन्तर्प्लीहविद्भिर्दुर्गुणैर्कोष्ठकफोदराः । अभिष्यन्दिभृशस्थूलकृमिकोष्ठाद्वचमारुताः ॥८॥

पीते विषे गरेऽपच्यां श्लीपदी गलगण्डवान्।

निरुहण एवं अनुवासन के अयोग्य—जो रोगी आस्थापन (निरुहण) बस्ति के अयोग्य होते हैं, वे अनुवासनबस्ति के भी अयोग्य होते हैं, क्योंकि दोनों बस्तियों का प्रयोग साथ-साथ किया जाता है। उनकी गणना पाण्डुरोगी, कामलाशोगी, प्रमेह, पीनस, निरन्त (जिसने लंघन किया हो या भूखा हो), प्लीहा-रोगी, अतिसार, पेट का भारीपन, कफोदर, अभिष्यन्द, कृश, स्थूल, जिसके पेट में क्रिमि हों, ऊरुरक्तम्भ, विषपान कर लेने पर, गर-विषयुक्त, अपची, श्लीपद (फीलपीप) तथा गलगण्ड का रोगी—ये सभी अनुवासनबस्ति-प्रयोग के योग्य नहीं होते हैं ॥७-८॥

तयोस्तु नेत्रं हेमादिधातुदार्बस्थिवेणुजम् ॥९॥

गोपुच्छाकारमच्छिद्रं श्लक्ष्णजुं गुलिकामुखम्।

बस्तिनेत्र-परिचय—उन दोनों (निरुहण एवं अनुवासन) बस्तियों के नेत्रों को सोना आदि धातु का, लकड़ी का, हड्डी का अथवा बाँस का बनवाना चाहिए। इन नेत्रों का आकार गाय की पूँछ के सदृश (नीचे की ओर को क्रमशः मोटा और आगे की ओर क्रमशः पतला), पतले छेद से युक्त, चिकना, सीधा तथा उसका मुख (अगला) भाग गोलाकार होना चाहिए ॥९॥

बक्तव्य—बस्तिनेत्र (नली) को 'अच्छिद्र' कहा गया है, किन्तु इस नली के अगले भाग में भीतर हो भीतर एक छिद्र होता है, जो बस्तिपुट से लेकर आगे तक होता है। इसी छिद्र से वह द्रव पदार्थ गुद आदि प्रदेशों में पहुँचाया जाता है। ऊपर जो अच्छिद्र कहा गया है उसका तात्पर्य है—उस नली के अगल-बगल छिद्र न हों। आज का अनीमा यन्त्र इसी का प्रतिनिधि है। इस 'अच्छिद्र' का अर्थ श्रीजरुणदत्त 'निर्विवरम्' कहते हैं और श्रीहेमादि मोन है। जब कि बस्तिनेत्र में भीतर-ही-भीतर आदि से अन्त तक छिद्र होना परम आवश्यक है, अतः यहाँ 'अच्छिद्र' का अर्थ सूक्ष्मच्छिद्र युक्त कर लेना चाहिए; क्योंकि नञ्जसमस्त पद का अर्थ 'तदत्युत्त' भी होता है। देखें—'तत्सादृश्यमभावश्च तदत्यन्तं तदप्यता। अप्राशस्यं विरोध्यश्च नग्रथाः षट् प्रकीर्तिताः' ॥ (नञ्प्रकरण-मनोरमाटीका) प्राचीन तन्त्रकारों के बचनों की संगति बैठाना ही व्याख्याकार की योग्यता है, अपनी अयोग्यता का भार तन्त्रकार पर डालना यह उसकी उन्मूल्यता है।

नेत्र-निरुक्ति—'णीञ् प्रापणे' धातु से 'ष्टन्' प्रत्यय करके 'नेत्र' शब्द की निष्पत्ति होती है। इसका व्युत्पत्तिलक्ष्य अर्थ है—'नयति, नीयते वा अनेन बस्तिकर्माचित् द्रव्यम्'। अर्थात् इस नेत्रयन्त्र के माध्यम से बस्ति में रखे हुए द्रव्य को गुद के मूत्रमार्ग से भीतर तक पहुँचाया जाता है, अतएव इसे नेत्र कहते हैं।

ऊनेऽस्वे पञ्च, पूर्णोऽस्मिन्नासप्तभ्योऽङ्गुलानि षट् ॥१०॥

सप्तमे सप्त, तान्यष्टौ द्वादशे, षोडशे तव। द्वादशेव परं विश्वादीक्ष्य वर्णन्तरेषु च ॥११॥

वयोबलशरीराणि

प्रमाणमभिवद्ध्वेत।

नेत्र का आकार—नेत्र की लम्बाई किस अवस्था में कितनी होनी चाहिए, इसका विवरण दिया जा रहा है—एक वर्ष से कम अवस्था वालों में उनके अंगुलों के प्रमाण से ५ अंगुल, एक वर्ष से लेकर सात वर्ष के पहले तक की अवस्था वालों में ६ अंगुल, सातवें वर्ष में ७ अंगुल, बारहवें वर्ष में ८ अंगुल,

२३२

अष्टाङ्गहृदये

सोलहवें वर्ष में ९ अंगुल तथा बीस वर्ष पूरा होने से लेकर अगले वर्षों में भी नेत्र का प्रमाण १२ अंगुल होना चाहिए। इनके अतिरिक्त जिन वर्षों का उल्लेख ऊपर नहीं किया गया उन (९, १०, ११ आदि) वर्षों में वयस (अवस्था), शारीरिक बल तथा शरीर की स्थिति (नाटा, लम्बा, दुबला, मोटा आदि) का विचार कर उक्त नेत्र के परिमाण को बढ़ाया भी जा सकता है॥ १०-११॥

वक्तव्य —श्रीवाग्भट ने 'वयोबलशरीराणि' का जो निर्देश दिया है, वह चिकित्सक के लिए है, वह देखे कि जिसे बस्ति-प्रयोग कराना है उसकी अवस्था, बल तथा शारीरिक स्थिति कैसी है, तदनुसार नेत्र की लम्बाई का निर्धारण करे। ऊपर जो नेत्र की लम्बाई के प्रमाण दिये हैं, वे सामान्य हैं। 'आसप्तभ्यः'—यहाँ पर 'आहू' उपसर्ग का प्रयोग 'मर्यादा' अर्थ में किया गया है, न कि 'अभिविधि' अर्थ में। वयस, बल और शरीर की अनुकूल स्थिति को देखकर नेत्र का प्रमाण बढ़ाया जा सकता है, तो विपरीत स्थिति में वह घटाया भी जा सकता है।

स्वाङ्गुष्ठेन समं मूले स्थौल्येनाग्रे कनिष्ठया॥ १२॥

नेत्र की मोटाई—बस्तिनेत्र के मूल भाग की मोटाई जिसे बस्तिप्रयोग कराया जा रहा हो उसके अँगूठा के समान मोटी और उसके अगले भाग की मोटाई उसके कनिष्ठिका अंगुली के समान पतली होनी चाहिए॥ १२॥

पूर्णेऽब्देऽङ्गुलमादाय तददर्शद्विप्रवर्द्धितम्। श्यङ्गुलं परमं छिद्रं मूलेऽग्रे वहते तु यत्॥ १३॥ मुद्रं माषं कलायं च किल्लं कर्कन्धुकं क्रमात्।

बस्तिनेत्र का छिद्र—बस्तिनेत्र का छेद (जिससे बस्ति में रक्ता हुआ द्रव भीतर प्रवेश कराया जाता है) एक वर्ष की अवस्था पूरी हो जाने पर १ अंगुल से लेकर उसके आधे का आधा अर्थात् चौथाई अंगुल के क्रम से क्रमशः अवस्थानुसार बढ़ाया गया परम (बड़े से भी बड़ा) तीन अंगुल प्रमाण का होना चाहिए। नेत्रछिद्र का यह परिमाण मूल भाग (जो बस्ति के साथ जुटा रहता है, उस) में होना चाहिए। ऊपर कहे गये विषय को इस प्रकार समझें—१ वर्ष से ६ वर्ष तक १ अंगुल छिद्र, ७ से ११ वर्ष तक १ १/२ (सवा) अंगुल, १२ से १५ वर्ष तक १ १/३ (डेढ़) अंगुल, १६ वर्ष में १ ३/४ (पौने दो) अंगुल, १७ वर्ष में २ अंगुल, १८ वर्ष में २ १/४ (सवा दो) अंगुल, १९ वर्ष में २ १/२ (अर्दाई) अंगुल, २० वर्ष में २ ३/४ (पौने तीन) अंगुल, तदनन्तर ३ अंगुल का छिद्र होना चाहिए।

बस्तिनेत्र के अगले भाग का छिद्र क्रमशः मूँग के बराबर (१ वर्ष से ६ वर्ष तक के लिए), उड़द के बराबर (७ वर्ष से ११ वर्ष तक के लिए), कलाय (मटर) के बराबर (१६ वर्ष से २० वर्ष तक के लिए) और कर्कन्धु (झडवेर) के बराबर (२० वर्ष से अन्त तक के लिए) होना चाहिए, जिससे गीले, कच्चे या हरे मूँग आदि आसानी से निकल सकें॥ १३॥

वक्तव्य —'स्वाङ्गुष्ठेन'-'श्यङ्गुलं परमं छिद्रम्'। उपर्युक्त पद्यभाग पर आप विचार करें, इसके लिए सु.चि. ३५।७, ८, ९ उद्धरणों में जो कुछ कहा गया है उससे सहायता लें।

मूलच्छिद्रप्रमाणेन प्रान्ते घटितकर्णिकम्॥ १४॥

वर्त्याऽग्रे पिहितं, मूले यथास्वं दृष्टङ्गुलान्तरम्। कर्णिकाद्वितयं नेत्रे कुर्यात्—

कर्णिका का वर्णन—बस्तिनेत्र के मूल छिद्र के प्रमाण से उसके प्रान्त (अन्तिम) भाग में कर्णिका (कैंगनी) बनानी चाहिए। नेत्र के मूल में दो अंगुल की दूरी पर दो-दो कर्णिकाएँ बनायें। इस समय नेत्र के अगले छिद्र में वस्त्र या रूई की बत्ती डालकर उस छिद्र को बन्द कर लें॥ १४॥

—तत्र च योजयेत्॥ १५॥

अजाविमहिषादीनां बस्तिं सुमुदितं दृढम्। कषायरक्तं निश्छिद्रग्रन्थिगन्धशिरं तनुम्॥ १६॥

ग्रथितं साधु सूत्रेण सुखसंस्थाप्यभेषजम्।

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३२

बस्तिपुट का वर्णन—नेत्र के अन्तिम भाग में जहाँ कर्णिका बनायी गयी थी, वहाँ बस्तिपुट को बाँधें। यह बस्तिपुट बकरा, भेड़ा, भैंसा आदि के मूत्राशय की जो बस्ति होती है उसे भलीभाँति मलकर बना लिया जाता है, यह मजबूत होती है। बबूल आदि कषायरस-प्रधान द्रव्यों के रस से रंगा गया हो, उसमें कोई छिद्र न हो, कोई गीठ न हो, दुर्गन्ध न हो, सिराओं से रहित हो, वह चर्म पतला हो तथा वह इतना बड़ा हो जिसमें औषध द्रव भलीभाँति रखे जा सकें, तदनन्तर वह अच्छी तरह से मजबूत धागे से सिली गयी हो ॥ १५-१६ ॥

बस्यभावेऽङ्गुपादे वा न्यसेद्वासोऽथवा घनम् ॥ १७ ॥

अन्य-बस्तिपुट-विधान—यदि ऊपर कहे गये बकरा आदि के मूत्राशय उपलब्ध न हो सकें तो बकरे के ऊरुचर्म या पादचर्म या ऐसा वस्त्र जिसमें से पानी न चूता हो अथवा वस्त्र में मोम धिसकर उससे बस्तिपुट का निर्माण कर लें ॥ १७ ॥

निरुहमात्रा प्रथमे प्रकुञ्चो वत्सरे परम्। प्रकुञ्चवृद्धिः प्रत्यब्दं यावत्यस्पृसुतास्ततः ॥ १८ ॥

प्रसृतं बर्द्धयेदूर्ध्वं द्वादशाष्टादशस्य तु। आसप्ततेरिदं मानं, दक्षैव प्रसुताः परम् ॥ १९ ॥

निरुहणबस्ति की मात्रा—निरुहण (आस्थापन) बस्ति में दिये जाने वाले औषध द्रव की मात्रा प्रथम वर्ष में १ प्रकुञ्च (१ पल = ४ कर्ष = ४ तोला) होनी चाहिए। एक वर्ष के बाद प्रतिवर्ष १-१ प्रकुञ्च के अनुपात से मात्रा तब तक बढ़ानी चाहिए जब तक वह ६ प्रसृत (११ प्रकुञ्च = ४८ तोला) न हो जाय। तदनन्तर १-१ प्रसृत के प्रमाण से मात्रा बढ़ानी चाहिए। इस प्रकार १८ वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के लिए यह मात्रा १२ प्रसृत (२४ प्रकुञ्च = ९६ तोला) हो जाती है। इसके बाद ७० वर्ष की अवस्था तक यही मात्रा उचित होती है। उसके बाद १० प्रसृत (२० प्रकुञ्च = २० पल = ८० तोला) की मात्रा होनी चाहिए ॥ १८-१९ ॥

यथायथं निरुहस्य पादो मात्राऽनुवासने।

अनुवासनबस्ति की मात्रा—उक्त निरुहणबस्ति के क्रम से बढ़ाते हुए अनुवासनबस्ति में दिये जाने वाले स्नेहन-द्रव्यों की मात्रा चौथाई भाग होनी चाहिए। अर्थात् निरुहणबस्ति में जहाँ द्रव मात्रा एक पल कही गयी है, वहाँ उस अवस्था में अनुवासन द्रव की मात्रा १ कर्ष होनी चाहिए।

आस्थाप्यं स्नेहितं स्विन्नं शुद्धं लब्धबलं पुनः ॥ २० ॥

अन्वासानर्हं विज्ञाय पूर्वमेवानुवासयेत्। शीते वसन्ते च दिवा रात्रौ केचित्ततोऽन्यदा ॥ २१ ॥

अस्यक्तस्नातमुचितात्पादहीनं हितं लघु। अस्मिन्धरुक्षमशितं सानुपानं द्रवादि च ॥ २२ ॥

कृतचङ्क्रमणं मुरुविमृन्नं शयने सुखे। नात्युच्छिन्ने न चोच्छीर्षं संविष्टं वामपार्श्वतः ॥ २३ ॥

सङ्कोच्च्य दक्षिणं सक्रियं प्रसारय च ततोऽपरम्।

बस्ति देने की विधि—निरुहणबस्ति देने योग्य पुरुष को पञ्चकर्मविधि के अनुसार स्नेहन-स्वेदन कराने के बाद वमन तथा निरेचन कराकर उसे शुद्ध करें। जब वह भलीभाँति स्वाभाविक रूप से बलवान् हो जाय तब उसे देखे कि यह अनुवासनबस्ति देने योग्य है, तब उसे पहले अनुवासनबस्ति देनी चाहिए। कुछ आचार्यों का मत है कि यह अनुवासनबस्ति शीतकाल (हेमन्त तथा शिशिर काल) में एवं वसन्त ऋतु में दिन में देनी चाहिए। इनके अतिरिक्त कालों (ग्रीष्म, प्रावृद्द, शरद् ऋतुओं) में रात्रि के समय बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए।

इस प्रकार काल तथा दिन-रात्रि का निर्णय कर लेने पर जिस दिन बस्ति-प्रयोग कराना हो, उस दिन अश्व्यंग कराकर उस व्यक्त को स्नान कराये। आहारमात्रा से चतुर्थांश, हितकर, लघु (सुपच), न अतिसिन्ध, न अतिरुक्ष तथा उचित अनुपान के साथ द्रव आदि दें। भोजन करने के बाद वह थोड़ा भ्रमण करे। मल-मूत्र का त्याग करके सुखद शय्या पर, जो न अधिक ऊँची हो और न उसमें अधिक ऊँचा सिरहाना ही हो, ऐसी शय्या पर उसे बायीं करवट लेटा दें। उसकी दाहिनी टाँग को मोड़कर तथा बायीं टाँग को सीधी करा दें ॥ २०-२३ ॥

२३४

अष्टाङ्गहृदये

अथास्य नेत्रं प्रणयेत्तिनग्धे स्निग्धमुखं गुदे॥ २४॥

उच्छ्वास्य बस्तेर्वदेन बद्धे हस्तमकम्पयन्। पृच्छवंशं प्रति ततो नातिदूतविलम्बितम्॥ २५॥

नातिवेगं न वा मन्दं सकृदेव प्रपीडयेत्। सावशेषं च कुर्वीत वायुः शेषे हि तिष्ठति॥ २६॥

बस्तिनेत्र के प्रवेश की विधि—उसके बाद औषधद्रव से भरी हुई बस्ति के मुख को चिकना करके चिकना किये गये गुदद्वार में इसका प्रवेश कराना चाहिए। औषधद्रव भरने के पहले बस्तिपुट को दबाकर उसके भीतर जो हवा भरी हुई थी उसे निकाल कर तब उसमें औषधद्रव भरे। बस्तिनेत्र का प्रवेश पीठ की ओर न अधिक शीघ्रता से और न अधिक विलम्ब से करे और औषधद्रव को भीतर प्रवेश कराने की इच्छा से बस्तिपुट को न अधिक वेग से और न अधिक धीरे से दबाये अर्थात् उसे एक बार दबाकर औषधद्रव को भीतर प्रवेश करा दें। यदि कुछ औषधद्रव रह गया हो तो पुनः उसे भीतर प्रवेश न कराये, क्योंकि जो शेष बच जाता है उसमें वायु का प्रवेश हो जाता है। अतः उस बस्तिनेत्र को धीरे-धीरे गुद से बाहर निकाल लें॥ २४-२६॥

दत्ते तूतानदेहस्य पाणिना ताडयेत्स्फिजौ। तत्यार्णिभ्यां तथा शय्यां पादतश्च ब्रिहत्स्फिपेत्॥ २७॥

ततः प्रसारिताङ्गस्य सोपधानस्य पार्णिके। आह्वान्मृष्टिनाङ्गं च स्नेहोऽतिष्ठन्कार्यकृत॥

वेदनातीर्मिति स्नेहो न हि शीघ्रं निवर्तते। योज्यः शीघ्रं निवृत्तेऽस्यः स्नेहोऽतिष्ठन्कार्यकृत॥

बस्ति के पश्चात् कर्म—इस प्रकार बस्तिकर्म कर लेने के बाद उस व्यक्ति को पीठ के बल से चित लिटा दें। उसके बाद उसके स्फिजों (चूतड़ों) को थपथपाये अथवा उससे कहें कि वह अपनी एड़ियों से स्वयं चूतड़ों को थपथपाये तथा उसकी शय्या (पलंग या चारपायी) को धीरे-धीरे तीन बार ऊपर की ओर उठा-उठाकर पटके। तदनन्तर जब वह व्यक्ति तर्किया लगाकर और हाथ-पैर फैलाकर लेटा हो तब उसकी एड़ियों को और पसलियों को मुड़ी से थपथपाये, शरीर पर तेल लगाकर उसके वेदना वाले अंग को विशेष करके मले, ऐसा करने से बस्ति द्वारा दिया गया स्नेह जल्दी नहीं लौट आता। यदि स्नेह लौटकर बाहर निकल आया हो तो शीघ्र ही दूसरी स्नेहबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। क्योंकि बस्ति द्वारा भीतर प्रवेश कराया गया स्नेह यदि कुछ समय तक मलाशय के भीतर नहीं रुकता तो वह अपना कार्य (लाभ) नहीं करता है॥ २७-२९॥

दीप्ताग्निं त्वागतस्नेहं सायाहे भोजयेत्प्लु।

स्नेह के लौट आने पर आहार—स्नेहद्रव के लौट आने पर यदि उस व्यक्ति की जठराग्नि प्रदीप्त हो तो उसे लघु (सुपच) आहार खाने के लिए देना चाहिए।

निवृत्तिकालः परमस्वयो यामास्ततः परम्॥ ३०॥

अहोरात्रमुपेक्षेत, परतः फलवर्तिभिः। तीक्ष्णेर्वा बस्तिभिः कुर्याद्यत्नं स्नेहनिवृत्तये॥ ३१॥

स्नेह के न लौटने पर चिकित्सा—स्नेह के स्वाभाविक रूप से लौट आने का समय तीन प्रहर (९ घण्टे) होते हैं, किन्तु आप एक दिन एक रात अर्थात् ८ प्रहर (२४ घण्टे) प्रतीक्षा कर लें। इतने समय तक भी यदि वह स्नेह नहीं लौटता है, तब उसे फलवर्तियों के प्रयोग से अथवा तीक्ष्ण (निरुहण) बस्तियों द्वारा लौटाने का प्रयत्न करें॥ ३०-३१॥

अतिरीक्ष्यादनागच्छन्न चेन्नान्द्र्यादिवोषकृत। उपेक्षेतैव हि ततोऽध्युपितश्च निशां पिबेत्॥

प्रातर्नागरधान्याम्भः कोष्णं, केवलमेव वा।

बिशेष चिकित्सा—यदि मलाशय की अत्यन्त रुक्षता के कारण स्नेह लौटकर न आ रहा हो और उसके न आने से शरीर पर जड़ता आदि दोष भी नहीं दिखलाये दे रहे हों तो उसकी उपेक्षा करें अर्थात् उस स्नेह को लौटाने का प्रयत्न ही न करें। अपितु रात्रिभर विराम कर लेने के बाद प्रातःकाल सोठ तथा धनियां डालकर उबाला हुआ जल अथवा केवल गुनगुना जल वह पीये॥ ३२॥

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३५

अन्वासयेतुतीयेऽहि पञ्चमे वा पुनश्च तम् ॥ ३३ ॥

यथा वा स्नेहपक्तिः स्यादतोऽत्युल्लक्षणमास्तात् ।

व्यायामनित्यान् दीप्ताग्नीन् रूक्षांश्च प्रतिवासरम् ॥ ३४ ॥

पुनः अनुवासन-प्रयोग—तदनन्तर उस व्यक्ति को तीसरे अथवा पाँचवें दिन पुनः अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। अथवा जैसे-जैसे स्नेह का पाचन होता जाय वैसे-वैसे अनुवासनबस्ति देते रहना चाहिए। यही कारण है कि जिनके शरीरों में वातदोष की अधिकता हो, जो प्रतिदिन व्यायाम करते हों, जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हों तथा जो हृष्ट हों, उन्हें प्रतिदिन अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराया जा सकता है ॥ ३३-३४ ॥

इति स्नेहैस्त्रिचतुरैः स्निग्धे घ्रोतोविशुद्धये । निरुहं शोधनं युज्यादस्निग्धे स्नेहनं तनोः ॥ ३५ ॥

निरुहणबस्ति-प्रयोग—इस प्रकार तीन या चार बार दी गयी स्नेहबस्तियों द्वारा शरीर के स्निग्ध हो जाने पर घ्रोतों को शुद्ध करने के लिए शोधनकारक निरुहणबस्ति का उपयोग करना चाहिए। यदि उतने पर भी शरीर का भलीभाँति स्नेहन न हो पाया हो तो स्नेहपान आदि विधियों से शरीर को स्निग्ध कर लेना चाहिए ॥ ३५ ॥

पञ्चमेऽथ तृतीये वा दिवसे साधके शुभे । मध्याहे किञ्चिदावृते प्रयुक्ते बलिमङ्गले ॥ ३६ ॥

अभ्यरुस्वेदितोत्सुष्टमलं नातिबुभुक्षितम् । अवेक्ष्य पुरुषं दोषभेजदादीनि चादरात् ॥ ३७ ॥

बस्तिं प्रकल्पयेद्वैघस्तद्विर्बहुभिः सह ।

निरुहण-प्रयोगविधि—अनुवासनबस्ति का प्रयोग कर लेने के बाद तीसरे या पाँचवें दिन अथवा जो कार्य में सफलता दिलाने वाला ( ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ) दिन हो, मध्याह्नकाल जब कुछ दिन ढल जाय बलिदान तथा मंगलकार्य करके, उस व्यक्ति को अभ्यंग तथा स्वेदन कराकर जिसने मल-मूत्र का त्याग कर लिया हो, जो अधिक भूखा न हो तथा वात आदि दोषों एवं औषध-द्रव्यों का भलीभाँति विचार करके, बस्तिकर्मकुशल अन्य अनेक चिकित्सकों के साथ विचार-विमर्श करके बस्ति में प्रयुज्यमान द्रव का निर्माण ( कल्पना ) करें ॥ ३६-३७ ॥

क्वाथयेद्विशतिपलं द्रव्यस्याष्टो फलानि च ॥ ३८ ॥

ततः क्वाथाच्छतुर्थ्यां स्नेहं वाते प्रकल्पयेत् । पिते स्वस्थे च षष्ठांशमष्टमांशं कफेऽधिके ॥ ३९ ॥

सर्वत्र चाष्टमं भागं कल्काद्भवति वा यथा । नात्यच्छसान्द्रता बस्तेः पलमात्रं गुडस्य च ॥ ४० ॥

मधुपद्मादिशेषं च युक्त्या—

बस्तिद्रव-निर्माणविधि—( निरुहणोपयोगी द्रव्यों को आगे कल्पस्थान अध्याय ४ के प्रारम्भ में देखें, क्योंकि यहाँ द्रव्यों का उल्लेख श्रीवाग्भट ने नहीं किया है, केवल बस्तिद्रवकल्पनाविधि का निर्देश किया है। ) २० पल = ८० तोला परिमाण में यथोचित द्रव्यों को लेकर और उसमें ८ मैनफलों का चूर्ण करके ८ गुना जल में पकाकर अष्टमांश जल शेष रहने पर उतार कर छान लें। यदि वातदोष की अधिकता हो तो क्वाथ से चतुर्थ्या उसमें स्नेह ( एरुण्ड आदि का समुचित तेल ) मिलायें, पित्त की अधिकता होने पर और वात आदि दोषों की समान स्थिति होने पर छठा भाग स्नेह मिलायें और यदि कफदोष की अधिकता हो तो आठवें भाग स्नेह मिलायें। इसके अतिरिक्त सभी स्थितियों में कल्क का आठवों भाग अथवा उतना कल्क ( चटनी की भाँति पिसा हुआ द्रव्य ) मिलायें, जिससे ऊपर कहा गया क्वाथ न अधिक पतला हो जाय और न अधिक गाढ़ा। उसमें गुड़ एक पल, मधु तथा लवण आदि शेष द्रव्यों का युक्तिपूर्वक मिश्रण करना चाहिए ॥ ३८-४० ॥

—सर्वं तदेकतः । उष्णाम्बुकुम्भीबाष्पेण तत्पं खजसमाहतम् ॥ ४१ ॥

प्रक्षिप्य बस्तीं प्रणयेत्यायो नात्युष्णशीतलम् । नातिसिग्धं न वा रूक्षं नातितौक्षणं न वा मृदु ॥

नात्यच्छसान्द्रं नोनातिमात्रं नापटु नाति च । लवणं तद्द्वदमलं च—

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अष्टाङ्गहृदये

उक्त सभी द्रव्यों को एक पात्र ( बर्तन ) में मिलाकर खोलते हुए जल में डालकर उसे भलीभाँति मथानी से मथें। तैयार हो जाने पर तथा गुनगुना होने पर इसे बस्तिपुट में भरें। भरने के पहले इस द्रव को देख लें—यह न अधिक स्निग्ध हो, न अधिक रूक्ष हो, न अधिक तीक्ष्ण हो, न अधिक मृदु हो, न अधिक अच्छ ( स्वच्छ द्रव के आकार का ) हो, न अधिक गाढ़ा हो, न मात्रा में कम हो, न अधिक हो, न अधिक लवण युक्त हो, न लवण से सर्वथा रहित हो, न अधिक अम्ल ( खट्टा ) हो और न अम्लरहित हो हो; ऐसे गुनगुने द्रव पदार्थ द्वारा बस्ति दें ॥ ४१-४२ ॥

—पठन्त्यप्ये तु तद्विदः ॥ ४३ ॥

मात्रां त्रिपलिकां कुर्यात्स्नेहमाक्षिकयोः पृथक् । कर्पाई माणमन्यस्य स्वस्ये कल्कपलद्रवम् ॥

सर्वद्रवणां शेषाणां पलानि दश कल्पयेत् ।

अन्य आचार्यों का मत—इस सम्बन्ध में बस्तिविशेषज्ञ दूसरे आचार्यों का मत इस प्रकार है—इसमें स्नेह तथा मधु की मात्रा ३-३ पल ( १२-१२ तोला ), माणिमन्य ( संघानमक ) आधा कर्ष, कल्क २ पल ( ८ तोला ), इनके अतिरिक्त ऊपर जो-जो द्रव पदार्थ कहे गये हैं, उन्हें तथा क्वाथद्रव सहित १० पल ( ४० तोला ) लें। यह प्रमाण स्वस्थ ( पूर्ण ) पुरुष के लिए कहा गया है ॥ ४३-४४ ॥

माक्षिकं लवणं स्नेहं कल्कं क्वाथमिति क्रमात् ॥ ४५ ॥

आवपेत निरुहाणामेष संयोजने विधिः ।

बस्तिद्रव्य-मिश्रणविधि—बस्ति में प्रयोग किये जाने वाले द्रव्यों को मिलाने की विधि—पात्र-विशेष में सबसे पहले क्रमशः मधु, लवण ( नमक ), स्नेह, कल्क, क्वाथ किया हुआ द्रव आदि डालते जाय और मथानी से इन्हें मथता जाय। यह बस्ति में डालने से पहले द्रव्यों को मिलाने की विधि है ॥ ४५ ॥

उत्तानो दत्तमात्रे तु निरुहे तन्मना भवेत् ॥ ४६ ॥

कृतोपधानः सज्जातवेगश्लोक्तकः सूजेत् ।

निरुहण का पश्चात् कर्म—जिसे निरुहणबस्ति दी गयी हो, वह बस्ति-प्रयोग के तत्काल बाद तफिया लगाकर कब निरुह द्रव्यों का वेग लौट आता है, इसका ध्यान रखता हुआ लेटा रहे और वेग की प्रतीति होते ही पाँवों के बल बैठकर ( इसी को उल्कट आसन = उकड़ूँ बैठना कहते हैं ) मल का त्याग कर दें ॥ ४६ ॥

आगतौ परमः कालो मुहूर्तो मृत्यवे परम् ॥ ४७ ॥

तत्रानुलोकिकं स्नेहक्षारमूत्रास्मलकल्पितम् । त्वरितं स्निग्धतीक्ष्णोष्णं बस्तिमन्यं प्रपीडयेत् ॥ ४८ ॥

विदद्यात्फलवर्ति वा स्वेदनोत्पासनादि च ।

बस्ति के लौटने की अवधि—निरुहणबस्ति के लौट आने का अधिक-से-अधिक समय एक मुहूर्त ( २ घड़ी = ४८ मिनट ) है। इसके बाद भी यदि नहीं लौटता है तो इसके बाद मृत्यु हो सकती है। इस स्थिति में उन द्रव्यों का अनुलोमन ( विरंचन ) कराने वाली स्नेह, क्षार, गोमूत्र, अम्ल ( काँजी ) मिलाकर बनायी गयी स्निग्ध, तीक्ष्ण ( क्षार ) एवं गरमागरम दूसरी बस्ति का प्रयोग कर देना चाहिए अथवा मदनफलयुक्त फलवर्ति ( देखें—अ.हृ.चि. ८।१३७ ) का प्रयोग कराना चाहिए अथवा पेट के ऊपर स्वेदन करायें अथवा उसे डराने-धमकाने का प्रयत्न करें, इससे भी मल निकल आता है ॥ ४७-४८ ॥

स्वयमेव निवृत्ते तु द्वितीयो बस्तिरिष्यते ॥ ४९ ॥

तृतीयोऽपि चतुर्थोऽपि यावद्वा सुनिरुहता ।

अनेक बस्ति-प्रयोग—यदि स्वाभाविक रूप से समय के भीतर बस्तिद्रव लौटकर बाहर न आ जाय तब तक आवश्यकतानुसार दूसरी, तीसरी तथा चौथी बस्ति का प्रयोग करते रहना चाहिए, जब तक उसमें सम्यक् निरुहण के लक्षण न देख लिये जायें ॥ ४९ ॥