भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

सोलहवें वर्ष में ९ अंगुल तथा बीस वर्ष पूरा होने से लेकर अगले वर्षों में भी नेत्र का प्रमाण १२ अंगुल होना चाहिए। इनके अतिरिक्त जिन वर्षों का उल्लेख ऊपर नहीं किया गया उन (९, १०, ११ आदि) वर्षों में वयस (अवस्था), शारीरिक बल तथा शरीर की स्थिति (नाटा, लम्बा, दुबला, मोटा आदि) का विचार कर उक्त नेत्र के परिमाण को बढ़ाया भी जा सकता है॥ १०-११॥

वक्तव्य —श्रीवाग्भट ने 'वयोबलशरीराणि' का जो निर्देश दिया है, वह चिकित्सक के लिए है, वह देखे कि जिसे बस्ति-प्रयोग कराना है उसकी अवस्था, बल तथा शारीरिक स्थिति कैसी है, तदनुसार नेत्र की लम्बाई का निर्धारण करे। ऊपर जो नेत्र की लम्बाई के प्रमाण दिये हैं, वे सामान्य हैं। 'आसप्तभ्यः'—यहाँ पर 'आहू' उपसर्ग का प्रयोग 'मर्यादा' अर्थ में किया गया है, न कि 'अभिविधि' अर्थ में। वयस, बल और शरीर की अनुकूल स्थिति को देखकर नेत्र का प्रमाण बढ़ाया जा सकता है, तो विपरीत स्थिति में वह घटाया भी जा सकता है।

स्वाङ्गुष्ठेन समं मूले स्थौल्येनाग्रे कनिष्ठया॥ १२॥

नेत्र की मोटाई—बस्तिनेत्र के मूल भाग की मोटाई जिसे बस्तिप्रयोग कराया जा रहा हो उसके अँगूठा के समान मोटी और उसके अगले भाग की मोटाई उसके कनिष्ठिका अंगुली के समान पतली होनी चाहिए॥ १२॥

पूर्णेऽब्देऽङ्गुलमादाय तददर्शद्विप्रवर्द्धितम्। श्यङ्गुलं परमं छिद्रं मूलेऽग्रे वहते तु यत्॥ १३॥ मुद्रं माषं कलायं च किल्लं कर्कन्धुकं क्रमात्।

बस्तिनेत्र का छिद्र—बस्तिनेत्र का छेद (जिससे बस्ति में रक्ता हुआ द्रव भीतर प्रवेश कराया जाता है) एक वर्ष की अवस्था पूरी हो जाने पर १ अंगुल से लेकर उसके आधे का आधा अर्थात् चौथाई अंगुल के क्रम से क्रमशः अवस्थानुसार बढ़ाया गया परम (बड़े से भी बड़ा) तीन अंगुल प्रमाण का होना चाहिए। नेत्रछिद्र का यह परिमाण मूल भाग (जो बस्ति के साथ जुटा रहता है, उस) में होना चाहिए। ऊपर कहे गये विषय को इस प्रकार समझें—१ वर्ष से ६ वर्ष तक १ अंगुल छिद्र, ७ से ११ वर्ष तक १ १/२ (सवा) अंगुल, १२ से १५ वर्ष तक १ १/३ (डेढ़) अंगुल, १६ वर्ष में १ ३/४ (पौने दो) अंगुल, १७ वर्ष में २ अंगुल, १८ वर्ष में २ १/४ (सवा दो) अंगुल, १९ वर्ष में २ १/२ (अर्दाई) अंगुल, २० वर्ष में २ ३/४ (पौने तीन) अंगुल, तदनन्तर ३ अंगुल का छिद्र होना चाहिए।

बस्तिनेत्र के अगले भाग का छिद्र क्रमशः मूँग के बराबर (१ वर्ष से ६ वर्ष तक के लिए), उड़द के बराबर (७ वर्ष से ११ वर्ष तक के लिए), कलाय (मटर) के बराबर (१६ वर्ष से २० वर्ष तक के लिए) और कर्कन्धु (झडवेर) के बराबर (२० वर्ष से अन्त तक के लिए) होना चाहिए, जिससे गीले, कच्चे या हरे मूँग आदि आसानी से निकल सकें॥ १३॥

वक्तव्य —'स्वाङ्गुष्ठेन'-'श्यङ्गुलं परमं छिद्रम्'। उपर्युक्त पद्यभाग पर आप विचार करें, इसके लिए सु.चि. ३५।७, ८, ९ उद्धरणों में जो कुछ कहा गया है उससे सहायता लें।

मूलच्छिद्रप्रमाणेन प्रान्ते घटितकर्णिकम्॥ १४॥

वर्त्याऽग्रे पिहितं, मूले यथास्वं दृष्टङ्गुलान्तरम्। कर्णिकाद्वितयं नेत्रे कुर्यात्—

कर्णिका का वर्णन—बस्तिनेत्र के मूल छिद्र के प्रमाण से उसके प्रान्त (अन्तिम) भाग में कर्णिका (कैंगनी) बनानी चाहिए। नेत्र के मूल में दो अंगुल की दूरी पर दो-दो कर्णिकाएँ बनायें। इस समय नेत्र के अगले छिद्र में वस्त्र या रूई की बत्ती डालकर उस छिद्र को बन्द कर लें॥ १४॥

—तत्र च योजयेत्॥ १५॥

अजाविमहिषादीनां बस्तिं सुमुदितं दृढम्। कषायरक्तं निश्छिद्रग्रन्थिगन्धशिरं तनुम्॥ १६॥

ग्रथितं साधु सूत्रेण सुखसंस्थाप्यभेषजम्।