भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 269

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३२

बस्तिपुट का वर्णन—नेत्र के अन्तिम भाग में जहाँ कर्णिका बनायी गयी थी, वहाँ बस्तिपुट को बाँधें। यह बस्तिपुट बकरा, भेड़ा, भैंसा आदि के मूत्राशय की जो बस्ति होती है उसे भलीभाँति मलकर बना लिया जाता है, यह मजबूत होती है। बबूल आदि कषायरस-प्रधान द्रव्यों के रस से रंगा गया हो, उसमें कोई छिद्र न हो, कोई गीठ न हो, दुर्गन्ध न हो, सिराओं से रहित हो, वह चर्म पतला हो तथा वह इतना बड़ा हो जिसमें औषध द्रव भलीभाँति रखे जा सकें, तदनन्तर वह अच्छी तरह से मजबूत धागे से सिली गयी हो ॥ १५-१६ ॥

बस्यभावेऽङ्गुपादे वा न्यसेद्वासोऽथवा घनम् ॥ १७ ॥

अन्य-बस्तिपुट-विधान—यदि ऊपर कहे गये बकरा आदि के मूत्राशय उपलब्ध न हो सकें तो बकरे के ऊरुचर्म या पादचर्म या ऐसा वस्त्र जिसमें से पानी न चूता हो अथवा वस्त्र में मोम धिसकर उससे बस्तिपुट का निर्माण कर लें ॥ १७ ॥

निरुहमात्रा प्रथमे प्रकुञ्चो वत्सरे परम्। प्रकुञ्चवृद्धिः प्रत्यब्दं यावत्यस्पृसुतास्ततः ॥ १८ ॥

प्रसृतं बर्द्धयेदूर्ध्वं द्वादशाष्टादशस्य तु। आसप्ततेरिदं मानं, दक्षैव प्रसुताः परम् ॥ १९ ॥

निरुहणबस्ति की मात्रा—निरुहण (आस्थापन) बस्ति में दिये जाने वाले औषध द्रव की मात्रा प्रथम वर्ष में १ प्रकुञ्च (१ पल = ४ कर्ष = ४ तोला) होनी चाहिए। एक वर्ष के बाद प्रतिवर्ष १-१ प्रकुञ्च के अनुपात से मात्रा तब तक बढ़ानी चाहिए जब तक वह ६ प्रसृत (११ प्रकुञ्च = ४८ तोला) न हो जाय। तदनन्तर १-१ प्रसृत के प्रमाण से मात्रा बढ़ानी चाहिए। इस प्रकार १८ वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के लिए यह मात्रा १२ प्रसृत (२४ प्रकुञ्च = ९६ तोला) हो जाती है। इसके बाद ७० वर्ष की अवस्था तक यही मात्रा उचित होती है। उसके बाद १० प्रसृत (२० प्रकुञ्च = २० पल = ८० तोला) की मात्रा होनी चाहिए ॥ १८-१९ ॥

यथायथं निरुहस्य पादो मात्राऽनुवासने।

अनुवासनबस्ति की मात्रा—उक्त निरुहणबस्ति के क्रम से बढ़ाते हुए अनुवासनबस्ति में दिये जाने वाले स्नेहन-द्रव्यों की मात्रा चौथाई भाग होनी चाहिए। अर्थात् निरुहणबस्ति में जहाँ द्रव मात्रा एक पल कही गयी है, वहाँ उस अवस्था में अनुवासन द्रव की मात्रा १ कर्ष होनी चाहिए।

आस्थाप्यं स्नेहितं स्विन्नं शुद्धं लब्धबलं पुनः ॥ २० ॥

अन्वासानर्हं विज्ञाय पूर्वमेवानुवासयेत्। शीते वसन्ते च दिवा रात्रौ केचित्ततोऽन्यदा ॥ २१ ॥

अस्यक्तस्नातमुचितात्पादहीनं हितं लघु। अस्मिन्धरुक्षमशितं सानुपानं द्रवादि च ॥ २२ ॥

कृतचङ्क्रमणं मुरुविमृन्नं शयने सुखे। नात्युच्छिन्ने न चोच्छीर्षं संविष्टं वामपार्श्वतः ॥ २३ ॥

सङ्कोच्च्य दक्षिणं सक्रियं प्रसारय च ततोऽपरम्।

बस्ति देने की विधि—निरुहणबस्ति देने योग्य पुरुष को पञ्चकर्मविधि के अनुसार स्नेहन-स्वेदन कराने के बाद वमन तथा निरेचन कराकर उसे शुद्ध करें। जब वह भलीभाँति स्वाभाविक रूप से बलवान् हो जाय तब उसे देखे कि यह अनुवासनबस्ति देने योग्य है, तब उसे पहले अनुवासनबस्ति देनी चाहिए। कुछ आचार्यों का मत है कि यह अनुवासनबस्ति शीतकाल (हेमन्त तथा शिशिर काल) में एवं वसन्त ऋतु में दिन में देनी चाहिए। इनके अतिरिक्त कालों (ग्रीष्म, प्रावृद्द, शरद् ऋतुओं) में रात्रि के समय बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए।

इस प्रकार काल तथा दिन-रात्रि का निर्णय कर लेने पर जिस दिन बस्ति-प्रयोग कराना हो, उस दिन अश्व्यंग कराकर उस व्यक्त को स्नान कराये। आहारमात्रा से चतुर्थांश, हितकर, लघु (सुपच), न अतिसिन्ध, न अतिरुक्ष तथा उचित अनुपान के साथ द्रव आदि दें। भोजन करने के बाद वह थोड़ा भ्रमण करे। मल-मूत्र का त्याग करके सुखद शय्या पर, जो न अधिक ऊँची हो और न उसमें अधिक ऊँचा सिरहाना ही हो, ऐसी शय्या पर उसे बायीं करवट लेटा दें। उसकी दाहिनी टाँग को मोड़कर तथा बायीं टाँग को सीधी करा दें ॥ २०-२३ ॥