भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 270

२३४

अष्टाङ्गहृदये

अथास्य नेत्रं प्रणयेत्तिनग्धे स्निग्धमुखं गुदे॥ २४॥

उच्छ्वास्य बस्तेर्वदेन बद्धे हस्तमकम्पयन्। पृच्छवंशं प्रति ततो नातिदूतविलम्बितम्॥ २५॥

नातिवेगं न वा मन्दं सकृदेव प्रपीडयेत्। सावशेषं च कुर्वीत वायुः शेषे हि तिष्ठति॥ २६॥

बस्तिनेत्र के प्रवेश की विधि—उसके बाद औषधद्रव से भरी हुई बस्ति के मुख को चिकना करके चिकना किये गये गुदद्वार में इसका प्रवेश कराना चाहिए। औषधद्रव भरने के पहले बस्तिपुट को दबाकर उसके भीतर जो हवा भरी हुई थी उसे निकाल कर तब उसमें औषधद्रव भरे। बस्तिनेत्र का प्रवेश पीठ की ओर न अधिक शीघ्रता से और न अधिक विलम्ब से करे और औषधद्रव को भीतर प्रवेश कराने की इच्छा से बस्तिपुट को न अधिक वेग से और न अधिक धीरे से दबाये अर्थात् उसे एक बार दबाकर औषधद्रव को भीतर प्रवेश करा दें। यदि कुछ औषधद्रव रह गया हो तो पुनः उसे भीतर प्रवेश न कराये, क्योंकि जो शेष बच जाता है उसमें वायु का प्रवेश हो जाता है। अतः उस बस्तिनेत्र को धीरे-धीरे गुद से बाहर निकाल लें॥ २४-२६॥

दत्ते तूतानदेहस्य पाणिना ताडयेत्स्फिजौ। तत्यार्णिभ्यां तथा शय्यां पादतश्च ब्रिहत्स्फिपेत्॥ २७॥

ततः प्रसारिताङ्गस्य सोपधानस्य पार्णिके। आह्वान्मृष्टिनाङ्गं च स्नेहोऽतिष्ठन्कार्यकृत॥

वेदनातीर्मिति स्नेहो न हि शीघ्रं निवर्तते। योज्यः शीघ्रं निवृत्तेऽस्यः स्नेहोऽतिष्ठन्कार्यकृत॥

बस्ति के पश्चात् कर्म—इस प्रकार बस्तिकर्म कर लेने के बाद उस व्यक्ति को पीठ के बल से चित लिटा दें। उसके बाद उसके स्फिजों (चूतड़ों) को थपथपाये अथवा उससे कहें कि वह अपनी एड़ियों से स्वयं चूतड़ों को थपथपाये तथा उसकी शय्या (पलंग या चारपायी) को धीरे-धीरे तीन बार ऊपर की ओर उठा-उठाकर पटके। तदनन्तर जब वह व्यक्ति तर्किया लगाकर और हाथ-पैर फैलाकर लेटा हो तब उसकी एड़ियों को और पसलियों को मुड़ी से थपथपाये, शरीर पर तेल लगाकर उसके वेदना वाले अंग को विशेष करके मले, ऐसा करने से बस्ति द्वारा दिया गया स्नेह जल्दी नहीं लौट आता। यदि स्नेह लौटकर बाहर निकल आया हो तो शीघ्र ही दूसरी स्नेहबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। क्योंकि बस्ति द्वारा भीतर प्रवेश कराया गया स्नेह यदि कुछ समय तक मलाशय के भीतर नहीं रुकता तो वह अपना कार्य (लाभ) नहीं करता है॥ २७-२९॥

दीप्ताग्निं त्वागतस्नेहं सायाहे भोजयेत्प्लु।

स्नेह के लौट आने पर आहार—स्नेहद्रव के लौट आने पर यदि उस व्यक्ति की जठराग्नि प्रदीप्त हो तो उसे लघु (सुपच) आहार खाने के लिए देना चाहिए।

निवृत्तिकालः परमस्वयो यामास्ततः परम्॥ ३०॥

अहोरात्रमुपेक्षेत, परतः फलवर्तिभिः। तीक्ष्णेर्वा बस्तिभिः कुर्याद्यत्नं स्नेहनिवृत्तये॥ ३१॥

स्नेह के न लौटने पर चिकित्सा—स्नेह के स्वाभाविक रूप से लौट आने का समय तीन प्रहर (९ घण्टे) होते हैं, किन्तु आप एक दिन एक रात अर्थात् ८ प्रहर (२४ घण्टे) प्रतीक्षा कर लें। इतने समय तक भी यदि वह स्नेह नहीं लौटता है, तब उसे फलवर्तियों के प्रयोग से अथवा तीक्ष्ण (निरुहण) बस्तियों द्वारा लौटाने का प्रयत्न करें॥ ३०-३१॥

अतिरीक्ष्यादनागच्छन्न चेन्नान्द्र्यादिवोषकृत। उपेक्षेतैव हि ततोऽध्युपितश्च निशां पिबेत्॥

प्रातर्नागरधान्याम्भः कोष्णं, केवलमेव वा।

बिशेष चिकित्सा—यदि मलाशय की अत्यन्त रुक्षता के कारण स्नेह लौटकर न आ रहा हो और उसके न आने से शरीर पर जड़ता आदि दोष भी नहीं दिखलाये दे रहे हों तो उसकी उपेक्षा करें अर्थात् उस स्नेह को लौटाने का प्रयत्न ही न करें। अपितु रात्रिभर विराम कर लेने के बाद प्रातःकाल सोठ तथा धनियां डालकर उबाला हुआ जल अथवा केवल गुनगुना जल वह पीये॥ ३२॥