अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबस्तिविधिरध्यायः १९ ]
सूत्रस्थानम्
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अन्वासयेतुतीयेऽहि पञ्चमे वा पुनश्च तम् ॥ ३३ ॥
यथा वा स्नेहपक्तिः स्यादतोऽत्युल्लक्षणमास्तात् ।
व्यायामनित्यान् दीप्ताग्नीन् रूक्षांश्च प्रतिवासरम् ॥ ३४ ॥
पुनः अनुवासन-प्रयोग—तदनन्तर उस व्यक्ति को तीसरे अथवा पाँचवें दिन पुनः अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। अथवा जैसे-जैसे स्नेह का पाचन होता जाय वैसे-वैसे अनुवासनबस्ति देते रहना चाहिए। यही कारण है कि जिनके शरीरों में वातदोष की अधिकता हो, जो प्रतिदिन व्यायाम करते हों, जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हों तथा जो हृष्ट हों, उन्हें प्रतिदिन अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराया जा सकता है ॥ ३३-३४ ॥
इति स्नेहैस्त्रिचतुरैः स्निग्धे घ्रोतोविशुद्धये । निरुहं शोधनं युज्यादस्निग्धे स्नेहनं तनोः ॥ ३५ ॥
निरुहणबस्ति-प्रयोग—इस प्रकार तीन या चार बार दी गयी स्नेहबस्तियों द्वारा शरीर के स्निग्ध हो जाने पर घ्रोतों को शुद्ध करने के लिए शोधनकारक निरुहणबस्ति का उपयोग करना चाहिए। यदि उतने पर भी शरीर का भलीभाँति स्नेहन न हो पाया हो तो स्नेहपान आदि विधियों से शरीर को स्निग्ध कर लेना चाहिए ॥ ३५ ॥
पञ्चमेऽथ तृतीये वा दिवसे साधके शुभे । मध्याहे किञ्चिदावृते प्रयुक्ते बलिमङ्गले ॥ ३६ ॥
अभ्यरुस्वेदितोत्सुष्टमलं नातिबुभुक्षितम् । अवेक्ष्य पुरुषं दोषभेजदादीनि चादरात् ॥ ३७ ॥
बस्तिं प्रकल्पयेद्वैघस्तद्विर्बहुभिः सह ।
निरुहण-प्रयोगविधि—अनुवासनबस्ति का प्रयोग कर लेने के बाद तीसरे या पाँचवें दिन अथवा जो कार्य में सफलता दिलाने वाला ( ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ) दिन हो, मध्याह्नकाल जब कुछ दिन ढल जाय बलिदान तथा मंगलकार्य करके, उस व्यक्ति को अभ्यंग तथा स्वेदन कराकर जिसने मल-मूत्र का त्याग कर लिया हो, जो अधिक भूखा न हो तथा वात आदि दोषों एवं औषध-द्रव्यों का भलीभाँति विचार करके, बस्तिकर्मकुशल अन्य अनेक चिकित्सकों के साथ विचार-विमर्श करके बस्ति में प्रयुज्यमान द्रव का निर्माण ( कल्पना ) करें ॥ ३६-३७ ॥
क्वाथयेद्विशतिपलं द्रव्यस्याष्टो फलानि च ॥ ३८ ॥
ततः क्वाथाच्छतुर्थ्यां स्नेहं वाते प्रकल्पयेत् । पिते स्वस्थे च षष्ठांशमष्टमांशं कफेऽधिके ॥ ३९ ॥
सर्वत्र चाष्टमं भागं कल्काद्भवति वा यथा । नात्यच्छसान्द्रता बस्तेः पलमात्रं गुडस्य च ॥ ४० ॥
मधुपद्मादिशेषं च युक्त्या—
बस्तिद्रव-निर्माणविधि—( निरुहणोपयोगी द्रव्यों को आगे कल्पस्थान अध्याय ४ के प्रारम्भ में देखें, क्योंकि यहाँ द्रव्यों का उल्लेख श्रीवाग्भट ने नहीं किया है, केवल बस्तिद्रवकल्पनाविधि का निर्देश किया है। ) २० पल = ८० तोला परिमाण में यथोचित द्रव्यों को लेकर और उसमें ८ मैनफलों का चूर्ण करके ८ गुना जल में पकाकर अष्टमांश जल शेष रहने पर उतार कर छान लें। यदि वातदोष की अधिकता हो तो क्वाथ से चतुर्थ्या उसमें स्नेह ( एरुण्ड आदि का समुचित तेल ) मिलायें, पित्त की अधिकता होने पर और वात आदि दोषों की समान स्थिति होने पर छठा भाग स्नेह मिलायें और यदि कफदोष की अधिकता हो तो आठवें भाग स्नेह मिलायें। इसके अतिरिक्त सभी स्थितियों में कल्क का आठवों भाग अथवा उतना कल्क ( चटनी की भाँति पिसा हुआ द्रव्य ) मिलायें, जिससे ऊपर कहा गया क्वाथ न अधिक पतला हो जाय और न अधिक गाढ़ा। उसमें गुड़ एक पल, मधु तथा लवण आदि शेष द्रव्यों का युक्तिपूर्वक मिश्रण करना चाहिए ॥ ३८-४० ॥
—सर्वं तदेकतः । उष्णाम्बुकुम्भीबाष्पेण तत्पं खजसमाहतम् ॥ ४१ ॥
प्रक्षिप्य बस्तीं प्रणयेत्यायो नात्युष्णशीतलम् । नातिसिग्धं न वा रूक्षं नातितौक्षणं न वा मृदु ॥
नात्यच्छसान्द्रं नोनातिमात्रं नापटु नाति च । लवणं तद्द्वदमलं च—