भारतकोश
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अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

सोलहवें वर्ष में ९ अंगुल तथा बीस वर्ष पूरा होने से लेकर अगले वर्षों में भी नेत्र का प्रमाण १२ अंगुल होना चाहिए। इनके अतिरिक्त जिन वर्षों का उल्लेख ऊपर नहीं किया गया उन (९, १०, ११ आदि) वर्षों में वयस (अवस्था), शारीरिक बल तथा शरीर की स्थिति (नाटा, लम्बा, दुबला, मोटा आदि) का विचार कर उक्त नेत्र के परिमाण को बढ़ाया भी जा सकता है॥ १०-११॥

वक्तव्य —श्रीवाग्भट ने 'वयोबलशरीराणि' का जो निर्देश दिया है, वह चिकित्सक के लिए है, वह देखे कि जिसे बस्ति-प्रयोग कराना है उसकी अवस्था, बल तथा शारीरिक स्थिति कैसी है, तदनुसार नेत्र की लम्बाई का निर्धारण करे। ऊपर जो नेत्र की लम्बाई के प्रमाण दिये हैं, वे सामान्य हैं। 'आसप्तभ्यः'—यहाँ पर 'आहू' उपसर्ग का प्रयोग 'मर्यादा' अर्थ में किया गया है, न कि 'अभिविधि' अर्थ में। वयस, बल और शरीर की अनुकूल स्थिति को देखकर नेत्र का प्रमाण बढ़ाया जा सकता है, तो विपरीत स्थिति में वह घटाया भी जा सकता है।

स्वाङ्गुष्ठेन समं मूले स्थौल्येनाग्रे कनिष्ठया॥ १२॥

नेत्र की मोटाई—बस्तिनेत्र के मूल भाग की मोटाई जिसे बस्तिप्रयोग कराया जा रहा हो उसके अँगूठा के समान मोटी और उसके अगले भाग की मोटाई उसके कनिष्ठिका अंगुली के समान पतली होनी चाहिए॥ १२॥

पूर्णेऽब्देऽङ्गुलमादाय तददर्शद्विप्रवर्द्धितम्। श्यङ्गुलं परमं छिद्रं मूलेऽग्रे वहते तु यत्॥ १३॥ मुद्रं माषं कलायं च किल्लं कर्कन्धुकं क्रमात्।

बस्तिनेत्र का छिद्र—बस्तिनेत्र का छेद (जिससे बस्ति में रक्ता हुआ द्रव भीतर प्रवेश कराया जाता है) एक वर्ष की अवस्था पूरी हो जाने पर १ अंगुल से लेकर उसके आधे का आधा अर्थात् चौथाई अंगुल के क्रम से क्रमशः अवस्थानुसार बढ़ाया गया परम (बड़े से भी बड़ा) तीन अंगुल प्रमाण का होना चाहिए। नेत्रछिद्र का यह परिमाण मूल भाग (जो बस्ति के साथ जुटा रहता है, उस) में होना चाहिए। ऊपर कहे गये विषय को इस प्रकार समझें—१ वर्ष से ६ वर्ष तक १ अंगुल छिद्र, ७ से ११ वर्ष तक १ १/२ (सवा) अंगुल, १२ से १५ वर्ष तक १ १/३ (डेढ़) अंगुल, १६ वर्ष में १ ३/४ (पौने दो) अंगुल, १७ वर्ष में २ अंगुल, १८ वर्ष में २ १/४ (सवा दो) अंगुल, १९ वर्ष में २ १/२ (अर्दाई) अंगुल, २० वर्ष में २ ३/४ (पौने तीन) अंगुल, तदनन्तर ३ अंगुल का छिद्र होना चाहिए।

बस्तिनेत्र के अगले भाग का छिद्र क्रमशः मूँग के बराबर (१ वर्ष से ६ वर्ष तक के लिए), उड़द के बराबर (७ वर्ष से ११ वर्ष तक के लिए), कलाय (मटर) के बराबर (१६ वर्ष से २० वर्ष तक के लिए) और कर्कन्धु (झडवेर) के बराबर (२० वर्ष से अन्त तक के लिए) होना चाहिए, जिससे गीले, कच्चे या हरे मूँग आदि आसानी से निकल सकें॥ १३॥

वक्तव्य —'स्वाङ्गुष्ठेन'-'श्यङ्गुलं परमं छिद्रम्'। उपर्युक्त पद्यभाग पर आप विचार करें, इसके लिए सु.चि. ३५।७, ८, ९ उद्धरणों में जो कुछ कहा गया है उससे सहायता लें।

मूलच्छिद्रप्रमाणेन प्रान्ते घटितकर्णिकम्॥ १४॥

वर्त्याऽग्रे पिहितं, मूले यथास्वं दृष्टङ्गुलान्तरम्। कर्णिकाद्वितयं नेत्रे कुर्यात्—

कर्णिका का वर्णन—बस्तिनेत्र के मूल छिद्र के प्रमाण से उसके प्रान्त (अन्तिम) भाग में कर्णिका (कैंगनी) बनानी चाहिए। नेत्र के मूल में दो अंगुल की दूरी पर दो-दो कर्णिकाएँ बनायें। इस समय नेत्र के अगले छिद्र में वस्त्र या रूई की बत्ती डालकर उस छिद्र को बन्द कर लें॥ १४॥

—तत्र च योजयेत्॥ १५॥

अजाविमहिषादीनां बस्तिं सुमुदितं दृढम्। कषायरक्तं निश्छिद्रग्रन्थिगन्धशिरं तनुम्॥ १६॥

ग्रथितं साधु सूत्रेण सुखसंस्थाप्यभेषजम्।

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

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बस्तिपुट का वर्णन—नेत्र के अन्तिम भाग में जहाँ कर्णिका बनायी गयी थी, वहाँ बस्तिपुट को बाँधें। यह बस्तिपुट बकरा, भेड़ा, भैंसा आदि के मूत्राशय की जो बस्ति होती है उसे भलीभाँति मलकर बना लिया जाता है, यह मजबूत होती है। बबूल आदि कषायरस-प्रधान द्रव्यों के रस से रंगा गया हो, उसमें कोई छिद्र न हो, कोई गीठ न हो, दुर्गन्ध न हो, सिराओं से रहित हो, वह चर्म पतला हो तथा वह इतना बड़ा हो जिसमें औषध द्रव भलीभाँति रखे जा सकें, तदनन्तर वह अच्छी तरह से मजबूत धागे से सिली गयी हो ॥ १५-१६ ॥

बस्यभावेऽङ्गुपादे वा न्यसेद्वासोऽथवा घनम् ॥ १७ ॥

अन्य-बस्तिपुट-विधान—यदि ऊपर कहे गये बकरा आदि के मूत्राशय उपलब्ध न हो सकें तो बकरे के ऊरुचर्म या पादचर्म या ऐसा वस्त्र जिसमें से पानी न चूता हो अथवा वस्त्र में मोम धिसकर उससे बस्तिपुट का निर्माण कर लें ॥ १७ ॥

निरुहमात्रा प्रथमे प्रकुञ्चो वत्सरे परम्। प्रकुञ्चवृद्धिः प्रत्यब्दं यावत्यस्पृसुतास्ततः ॥ १८ ॥

प्रसृतं बर्द्धयेदूर्ध्वं द्वादशाष्टादशस्य तु। आसप्ततेरिदं मानं, दक्षैव प्रसुताः परम् ॥ १९ ॥

निरुहणबस्ति की मात्रा—निरुहण (आस्थापन) बस्ति में दिये जाने वाले औषध द्रव की मात्रा प्रथम वर्ष में १ प्रकुञ्च (१ पल = ४ कर्ष = ४ तोला) होनी चाहिए। एक वर्ष के बाद प्रतिवर्ष १-१ प्रकुञ्च के अनुपात से मात्रा तब तक बढ़ानी चाहिए जब तक वह ६ प्रसृत (११ प्रकुञ्च = ४८ तोला) न हो जाय। तदनन्तर १-१ प्रसृत के प्रमाण से मात्रा बढ़ानी चाहिए। इस प्रकार १८ वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के लिए यह मात्रा १२ प्रसृत (२४ प्रकुञ्च = ९६ तोला) हो जाती है। इसके बाद ७० वर्ष की अवस्था तक यही मात्रा उचित होती है। उसके बाद १० प्रसृत (२० प्रकुञ्च = २० पल = ८० तोला) की मात्रा होनी चाहिए ॥ १८-१९ ॥

यथायथं निरुहस्य पादो मात्राऽनुवासने।

अनुवासनबस्ति की मात्रा—उक्त निरुहणबस्ति के क्रम से बढ़ाते हुए अनुवासनबस्ति में दिये जाने वाले स्नेहन-द्रव्यों की मात्रा चौथाई भाग होनी चाहिए। अर्थात् निरुहणबस्ति में जहाँ द्रव मात्रा एक पल कही गयी है, वहाँ उस अवस्था में अनुवासन द्रव की मात्रा १ कर्ष होनी चाहिए।

आस्थाप्यं स्नेहितं स्विन्नं शुद्धं लब्धबलं पुनः ॥ २० ॥

अन्वासानर्हं विज्ञाय पूर्वमेवानुवासयेत्। शीते वसन्ते च दिवा रात्रौ केचित्ततोऽन्यदा ॥ २१ ॥

अस्यक्तस्नातमुचितात्पादहीनं हितं लघु। अस्मिन्धरुक्षमशितं सानुपानं द्रवादि च ॥ २२ ॥

कृतचङ्क्रमणं मुरुविमृन्नं शयने सुखे। नात्युच्छिन्ने न चोच्छीर्षं संविष्टं वामपार्श्वतः ॥ २३ ॥

सङ्कोच्च्य दक्षिणं सक्रियं प्रसारय च ततोऽपरम्।

बस्ति देने की विधि—निरुहणबस्ति देने योग्य पुरुष को पञ्चकर्मविधि के अनुसार स्नेहन-स्वेदन कराने के बाद वमन तथा निरेचन कराकर उसे शुद्ध करें। जब वह भलीभाँति स्वाभाविक रूप से बलवान् हो जाय तब उसे देखे कि यह अनुवासनबस्ति देने योग्य है, तब उसे पहले अनुवासनबस्ति देनी चाहिए। कुछ आचार्यों का मत है कि यह अनुवासनबस्ति शीतकाल (हेमन्त तथा शिशिर काल) में एवं वसन्त ऋतु में दिन में देनी चाहिए। इनके अतिरिक्त कालों (ग्रीष्म, प्रावृद्द, शरद् ऋतुओं) में रात्रि के समय बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए।

इस प्रकार काल तथा दिन-रात्रि का निर्णय कर लेने पर जिस दिन बस्ति-प्रयोग कराना हो, उस दिन अश्व्यंग कराकर उस व्यक्त को स्नान कराये। आहारमात्रा से चतुर्थांश, हितकर, लघु (सुपच), न अतिसिन्ध, न अतिरुक्ष तथा उचित अनुपान के साथ द्रव आदि दें। भोजन करने के बाद वह थोड़ा भ्रमण करे। मल-मूत्र का त्याग करके सुखद शय्या पर, जो न अधिक ऊँची हो और न उसमें अधिक ऊँचा सिरहाना ही हो, ऐसी शय्या पर उसे बायीं करवट लेटा दें। उसकी दाहिनी टाँग को मोड़कर तथा बायीं टाँग को सीधी करा दें ॥ २०-२३ ॥

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अष्टाङ्गहृदये

अथास्य नेत्रं प्रणयेत्तिनग्धे स्निग्धमुखं गुदे॥ २४॥

उच्छ्वास्य बस्तेर्वदेन बद्धे हस्तमकम्पयन्। पृच्छवंशं प्रति ततो नातिदूतविलम्बितम्॥ २५॥

नातिवेगं न वा मन्दं सकृदेव प्रपीडयेत्। सावशेषं च कुर्वीत वायुः शेषे हि तिष्ठति॥ २६॥

बस्तिनेत्र के प्रवेश की विधि—उसके बाद औषधद्रव से भरी हुई बस्ति के मुख को चिकना करके चिकना किये गये गुदद्वार में इसका प्रवेश कराना चाहिए। औषधद्रव भरने के पहले बस्तिपुट को दबाकर उसके भीतर जो हवा भरी हुई थी उसे निकाल कर तब उसमें औषधद्रव भरे। बस्तिनेत्र का प्रवेश पीठ की ओर न अधिक शीघ्रता से और न अधिक विलम्ब से करे और औषधद्रव को भीतर प्रवेश कराने की इच्छा से बस्तिपुट को न अधिक वेग से और न अधिक धीरे से दबाये अर्थात् उसे एक बार दबाकर औषधद्रव को भीतर प्रवेश करा दें। यदि कुछ औषधद्रव रह गया हो तो पुनः उसे भीतर प्रवेश न कराये, क्योंकि जो शेष बच जाता है उसमें वायु का प्रवेश हो जाता है। अतः उस बस्तिनेत्र को धीरे-धीरे गुद से बाहर निकाल लें॥ २४-२६॥

दत्ते तूतानदेहस्य पाणिना ताडयेत्स्फिजौ। तत्यार्णिभ्यां तथा शय्यां पादतश्च ब्रिहत्स्फिपेत्॥ २७॥

ततः प्रसारिताङ्गस्य सोपधानस्य पार्णिके। आह्वान्मृष्टिनाङ्गं च स्नेहोऽतिष्ठन्कार्यकृत॥

वेदनातीर्मिति स्नेहो न हि शीघ्रं निवर्तते। योज्यः शीघ्रं निवृत्तेऽस्यः स्नेहोऽतिष्ठन्कार्यकृत॥

बस्ति के पश्चात् कर्म—इस प्रकार बस्तिकर्म कर लेने के बाद उस व्यक्ति को पीठ के बल से चित लिटा दें। उसके बाद उसके स्फिजों (चूतड़ों) को थपथपाये अथवा उससे कहें कि वह अपनी एड़ियों से स्वयं चूतड़ों को थपथपाये तथा उसकी शय्या (पलंग या चारपायी) को धीरे-धीरे तीन बार ऊपर की ओर उठा-उठाकर पटके। तदनन्तर जब वह व्यक्ति तर्किया लगाकर और हाथ-पैर फैलाकर लेटा हो तब उसकी एड़ियों को और पसलियों को मुड़ी से थपथपाये, शरीर पर तेल लगाकर उसके वेदना वाले अंग को विशेष करके मले, ऐसा करने से बस्ति द्वारा दिया गया स्नेह जल्दी नहीं लौट आता। यदि स्नेह लौटकर बाहर निकल आया हो तो शीघ्र ही दूसरी स्नेहबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। क्योंकि बस्ति द्वारा भीतर प्रवेश कराया गया स्नेह यदि कुछ समय तक मलाशय के भीतर नहीं रुकता तो वह अपना कार्य (लाभ) नहीं करता है॥ २७-२९॥

दीप्ताग्निं त्वागतस्नेहं सायाहे भोजयेत्प्लु।

स्नेह के लौट आने पर आहार—स्नेहद्रव के लौट आने पर यदि उस व्यक्ति की जठराग्नि प्रदीप्त हो तो उसे लघु (सुपच) आहार खाने के लिए देना चाहिए।

निवृत्तिकालः परमस्वयो यामास्ततः परम्॥ ३०॥

अहोरात्रमुपेक्षेत, परतः फलवर्तिभिः। तीक्ष्णेर्वा बस्तिभिः कुर्याद्यत्नं स्नेहनिवृत्तये॥ ३१॥

स्नेह के न लौटने पर चिकित्सा—स्नेह के स्वाभाविक रूप से लौट आने का समय तीन प्रहर (९ घण्टे) होते हैं, किन्तु आप एक दिन एक रात अर्थात् ८ प्रहर (२४ घण्टे) प्रतीक्षा कर लें। इतने समय तक भी यदि वह स्नेह नहीं लौटता है, तब उसे फलवर्तियों के प्रयोग से अथवा तीक्ष्ण (निरुहण) बस्तियों द्वारा लौटाने का प्रयत्न करें॥ ३०-३१॥

अतिरीक्ष्यादनागच्छन्न चेन्नान्द्र्यादिवोषकृत। उपेक्षेतैव हि ततोऽध्युपितश्च निशां पिबेत्॥

प्रातर्नागरधान्याम्भः कोष्णं, केवलमेव वा।

बिशेष चिकित्सा—यदि मलाशय की अत्यन्त रुक्षता के कारण स्नेह लौटकर न आ रहा हो और उसके न आने से शरीर पर जड़ता आदि दोष भी नहीं दिखलाये दे रहे हों तो उसकी उपेक्षा करें अर्थात् उस स्नेह को लौटाने का प्रयत्न ही न करें। अपितु रात्रिभर विराम कर लेने के बाद प्रातःकाल सोठ तथा धनियां डालकर उबाला हुआ जल अथवा केवल गुनगुना जल वह पीये॥ ३२॥

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

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अन्वासयेतुतीयेऽहि पञ्चमे वा पुनश्च तम् ॥ ३३ ॥

यथा वा स्नेहपक्तिः स्यादतोऽत्युल्लक्षणमास्तात् ।

व्यायामनित्यान् दीप्ताग्नीन् रूक्षांश्च प्रतिवासरम् ॥ ३४ ॥

पुनः अनुवासन-प्रयोग—तदनन्तर उस व्यक्ति को तीसरे अथवा पाँचवें दिन पुनः अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। अथवा जैसे-जैसे स्नेह का पाचन होता जाय वैसे-वैसे अनुवासनबस्ति देते रहना चाहिए। यही कारण है कि जिनके शरीरों में वातदोष की अधिकता हो, जो प्रतिदिन व्यायाम करते हों, जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हों तथा जो हृष्ट हों, उन्हें प्रतिदिन अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराया जा सकता है ॥ ३३-३४ ॥

इति स्नेहैस्त्रिचतुरैः स्निग्धे घ्रोतोविशुद्धये । निरुहं शोधनं युज्यादस्निग्धे स्नेहनं तनोः ॥ ३५ ॥

निरुहणबस्ति-प्रयोग—इस प्रकार तीन या चार बार दी गयी स्नेहबस्तियों द्वारा शरीर के स्निग्ध हो जाने पर घ्रोतों को शुद्ध करने के लिए शोधनकारक निरुहणबस्ति का उपयोग करना चाहिए। यदि उतने पर भी शरीर का भलीभाँति स्नेहन न हो पाया हो तो स्नेहपान आदि विधियों से शरीर को स्निग्ध कर लेना चाहिए ॥ ३५ ॥

पञ्चमेऽथ तृतीये वा दिवसे साधके शुभे । मध्याहे किञ्चिदावृते प्रयुक्ते बलिमङ्गले ॥ ३६ ॥

अभ्यरुस्वेदितोत्सुष्टमलं नातिबुभुक्षितम् । अवेक्ष्य पुरुषं दोषभेजदादीनि चादरात् ॥ ३७ ॥

बस्तिं प्रकल्पयेद्वैघस्तद्विर्बहुभिः सह ।

निरुहण-प्रयोगविधि—अनुवासनबस्ति का प्रयोग कर लेने के बाद तीसरे या पाँचवें दिन अथवा जो कार्य में सफलता दिलाने वाला ( ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ) दिन हो, मध्याह्नकाल जब कुछ दिन ढल जाय बलिदान तथा मंगलकार्य करके, उस व्यक्ति को अभ्यंग तथा स्वेदन कराकर जिसने मल-मूत्र का त्याग कर लिया हो, जो अधिक भूखा न हो तथा वात आदि दोषों एवं औषध-द्रव्यों का भलीभाँति विचार करके, बस्तिकर्मकुशल अन्य अनेक चिकित्सकों के साथ विचार-विमर्श करके बस्ति में प्रयुज्यमान द्रव का निर्माण ( कल्पना ) करें ॥ ३६-३७ ॥

क्वाथयेद्विशतिपलं द्रव्यस्याष्टो फलानि च ॥ ३८ ॥

ततः क्वाथाच्छतुर्थ्यां स्नेहं वाते प्रकल्पयेत् । पिते स्वस्थे च षष्ठांशमष्टमांशं कफेऽधिके ॥ ३९ ॥

सर्वत्र चाष्टमं भागं कल्काद्भवति वा यथा । नात्यच्छसान्द्रता बस्तेः पलमात्रं गुडस्य च ॥ ४० ॥

मधुपद्मादिशेषं च युक्त्या—

बस्तिद्रव-निर्माणविधि—( निरुहणोपयोगी द्रव्यों को आगे कल्पस्थान अध्याय ४ के प्रारम्भ में देखें, क्योंकि यहाँ द्रव्यों का उल्लेख श्रीवाग्भट ने नहीं किया है, केवल बस्तिद्रवकल्पनाविधि का निर्देश किया है। ) २० पल = ८० तोला परिमाण में यथोचित द्रव्यों को लेकर और उसमें ८ मैनफलों का चूर्ण करके ८ गुना जल में पकाकर अष्टमांश जल शेष रहने पर उतार कर छान लें। यदि वातदोष की अधिकता हो तो क्वाथ से चतुर्थ्या उसमें स्नेह ( एरुण्ड आदि का समुचित तेल ) मिलायें, पित्त की अधिकता होने पर और वात आदि दोषों की समान स्थिति होने पर छठा भाग स्नेह मिलायें और यदि कफदोष की अधिकता हो तो आठवें भाग स्नेह मिलायें। इसके अतिरिक्त सभी स्थितियों में कल्क का आठवों भाग अथवा उतना कल्क ( चटनी की भाँति पिसा हुआ द्रव्य ) मिलायें, जिससे ऊपर कहा गया क्वाथ न अधिक पतला हो जाय और न अधिक गाढ़ा। उसमें गुड़ एक पल, मधु तथा लवण आदि शेष द्रव्यों का युक्तिपूर्वक मिश्रण करना चाहिए ॥ ३८-४० ॥

—सर्वं तदेकतः । उष्णाम्बुकुम्भीबाष्पेण तत्पं खजसमाहतम् ॥ ४१ ॥

प्रक्षिप्य बस्तीं प्रणयेत्यायो नात्युष्णशीतलम् । नातिसिग्धं न वा रूक्षं नातितौक्षणं न वा मृदु ॥

नात्यच्छसान्द्रं नोनातिमात्रं नापटु नाति च । लवणं तद्द्वदमलं च—

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अष्टाङ्गहृदये

उक्त सभी द्रव्यों को एक पात्र ( बर्तन ) में मिलाकर खोलते हुए जल में डालकर उसे भलीभाँति मथानी से मथें। तैयार हो जाने पर तथा गुनगुना होने पर इसे बस्तिपुट में भरें। भरने के पहले इस द्रव को देख लें—यह न अधिक स्निग्ध हो, न अधिक रूक्ष हो, न अधिक तीक्ष्ण हो, न अधिक मृदु हो, न अधिक अच्छ ( स्वच्छ द्रव के आकार का ) हो, न अधिक गाढ़ा हो, न मात्रा में कम हो, न अधिक हो, न अधिक लवण युक्त हो, न लवण से सर्वथा रहित हो, न अधिक अम्ल ( खट्टा ) हो और न अम्लरहित हो हो; ऐसे गुनगुने द्रव पदार्थ द्वारा बस्ति दें ॥ ४१-४२ ॥

—पठन्त्यप्ये तु तद्विदः ॥ ४३ ॥

मात्रां त्रिपलिकां कुर्यात्स्नेहमाक्षिकयोः पृथक् । कर्पाई माणमन्यस्य स्वस्ये कल्कपलद्रवम् ॥

सर्वद्रवणां शेषाणां पलानि दश कल्पयेत् ।

अन्य आचार्यों का मत—इस सम्बन्ध में बस्तिविशेषज्ञ दूसरे आचार्यों का मत इस प्रकार है—इसमें स्नेह तथा मधु की मात्रा ३-३ पल ( १२-१२ तोला ), माणिमन्य ( संघानमक ) आधा कर्ष, कल्क २ पल ( ८ तोला ), इनके अतिरिक्त ऊपर जो-जो द्रव पदार्थ कहे गये हैं, उन्हें तथा क्वाथद्रव सहित १० पल ( ४० तोला ) लें। यह प्रमाण स्वस्थ ( पूर्ण ) पुरुष के लिए कहा गया है ॥ ४३-४४ ॥

माक्षिकं लवणं स्नेहं कल्कं क्वाथमिति क्रमात् ॥ ४५ ॥

आवपेत निरुहाणामेष संयोजने विधिः ।

बस्तिद्रव्य-मिश्रणविधि—बस्ति में प्रयोग किये जाने वाले द्रव्यों को मिलाने की विधि—पात्र-विशेष में सबसे पहले क्रमशः मधु, लवण ( नमक ), स्नेह, कल्क, क्वाथ किया हुआ द्रव आदि डालते जाय और मथानी से इन्हें मथता जाय। यह बस्ति में डालने से पहले द्रव्यों को मिलाने की विधि है ॥ ४५ ॥

उत्तानो दत्तमात्रे तु निरुहे तन्मना भवेत् ॥ ४६ ॥

कृतोपधानः सज्जातवेगश्लोक्तकः सूजेत् ।

निरुहण का पश्चात् कर्म—जिसे निरुहणबस्ति दी गयी हो, वह बस्ति-प्रयोग के तत्काल बाद तफिया लगाकर कब निरुह द्रव्यों का वेग लौट आता है, इसका ध्यान रखता हुआ लेटा रहे और वेग की प्रतीति होते ही पाँवों के बल बैठकर ( इसी को उल्कट आसन = उकड़ूँ बैठना कहते हैं ) मल का त्याग कर दें ॥ ४६ ॥

आगतौ परमः कालो मुहूर्तो मृत्यवे परम् ॥ ४७ ॥

तत्रानुलोकिकं स्नेहक्षारमूत्रास्मलकल्पितम् । त्वरितं स्निग्धतीक्ष्णोष्णं बस्तिमन्यं प्रपीडयेत् ॥ ४८ ॥

विदद्यात्फलवर्ति वा स्वेदनोत्पासनादि च ।

बस्ति के लौटने की अवधि—निरुहणबस्ति के लौट आने का अधिक-से-अधिक समय एक मुहूर्त ( २ घड़ी = ४८ मिनट ) है। इसके बाद भी यदि नहीं लौटता है तो इसके बाद मृत्यु हो सकती है। इस स्थिति में उन द्रव्यों का अनुलोमन ( विरंचन ) कराने वाली स्नेह, क्षार, गोमूत्र, अम्ल ( काँजी ) मिलाकर बनायी गयी स्निग्ध, तीक्ष्ण ( क्षार ) एवं गरमागरम दूसरी बस्ति का प्रयोग कर देना चाहिए अथवा मदनफलयुक्त फलवर्ति ( देखें—अ.हृ.चि. ८।१३७ ) का प्रयोग कराना चाहिए अथवा पेट के ऊपर स्वेदन करायें अथवा उसे डराने-धमकाने का प्रयत्न करें, इससे भी मल निकल आता है ॥ ४७-४८ ॥

स्वयमेव निवृत्ते तु द्वितीयो बस्तिरिष्यते ॥ ४९ ॥

तृतीयोऽपि चतुर्थोऽपि यावद्वा सुनिरुहता ।

अनेक बस्ति-प्रयोग—यदि स्वाभाविक रूप से समय के भीतर बस्तिद्रव लौटकर बाहर न आ जाय तब तक आवश्यकतानुसार दूसरी, तीसरी तथा चौथी बस्ति का प्रयोग करते रहना चाहिए, जब तक उसमें सम्यक् निरुहण के लक्षण न देख लिये जायें ॥ ४९ ॥

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३७

विरिक्तवन्व योगादीन्विद्यात्—

सम्यग्योग आदि का संकेत—निरुहणबस्ति के सम्यग्योग, हीनयोग, अतियोग के लक्षणों को विरेचन के समान ही समझें। इनके लक्षण अ.हू.सू. १८।३८-४१ में कहे गये हैं।

—योगे तु भोजयेत् ॥५०॥

कोष्णेन वारिणा स्नातं तनुधन्वरसीदनम्।

सम्यग्योग में पश्चात् कर्म—निरुहणबस्ति का सम्यग्योग हो जाने के बाद उस व्यक्ति को गुनगुने जल से स्नान कराकर धन्व ( जांगल ) देश में उत्पन्न पशु-पक्षियों के मांसरस के साथ भात खिलाना चाहिए ॥५०॥

विकारा ये निरुद्धस्य भवन्ति प्रचलैर्मलेः ॥५१॥

ते सुखोष्णाम्बुसिक्तस्य यास्ति भुक्तवतः शमसु।

विकारों का शमन—निरुहणबस्ति का प्रयोग कराने से मलों के अपने स्थान से इधर-उधर हो जाने के कारण जो तात्कालिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, वे सब गुनगुने जल द्वारा स्नान करने तथा मांसरस के साथ भोजन कर लेने पर शांत हो जाते हैं ॥५१॥

अथ वातादिर्दितं भूयः सद्य एवानुवासयेत् ॥५२॥

पुनः अनुवासन-प्रयोग—वातरोग से पीड़ित व्यक्ति को निरुहणबस्ति देने के बाद तत्काल ही अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥५२॥

वक्तव्य—‘सद्य एवानुवासयेत्’—यहाँ ‘सद्यः’ शब्द का अर्थ ‘तत्क्षण = तत्काल’ ही है, न कि ‘सद्योमरणीयमिन्द्रिय’ अध्याय में कहे गये ‘सद्यः’ के समान समझें। वहाँ तो श्रीचक्रपाणि के अनुसार सात रात या तीन रात तक का समय स्वीकार किया गया है। देखें—च.इ. १०।१-२। यहाँ भी सामान्य रूप से विरेचन के सात दिन बाद अनुवासनबस्ति देने की अनुमति चरक तथा सुश्रुत ने दी है। देखें—सु.चि. ३७।३ तथा च.सू. १५।१६। आवश्यक विधियों में सामान्य वचनों का उपयोग कहीं भी नहीं होता है।

सम्यग्धीनातियोगाश्च तस्य स्युः स्नेहपीतवत्।

अनुवासन के विविध योग—अनुवासनबस्ति के सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग स्नेहपान के सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग के समान होते हैं। देखें—अ.हू.सू. १६।३०-३१।

किञ्चित्कालं स्थितो यश्च सपुरीषो निवर्तते ॥५३॥

सानुलोमानिलः स्नेहस्तस्मिद्वमनुवासनम्।

सम्यग्योग का वर्णन—अनुवासनबस्ति द्वारा दिया गया जो स्नेह कुछ समय तक मलाशय में एककर पुरीष ( मल ) के साथ लौट आता है और जो वायु का अनुलोमन कर देता है, उसे अनुवासनबस्ति का सम्यग्योग कहा जाता है ॥५३॥

एकं त्रीन् वा बलासे तु स्नेहबस्तीन् प्रकल्पयेत् ॥५४॥

पञ्च वा सप्त वा पित्तै, नवैकादश वाऽनिलै। पुनस्ततोऽप्ययुग्मास्तु पुनरास्थापनं ततः ॥५५॥

दोषानुसार बस्तिसंख्या—कफदोष में १ अथवा ३, पित्तदोष में ५ या ७ तथा वातदोष में ९ या ११ स्नेहबस्तियाँ देनी चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो इसके आगे भी अयुग्म ( विषम ) संख्या में ( पहले कहीं हुई संख्याओं से बढ़ाकर बस्तियाँ देनी चाहिए। उसके बाद फिर आस्थापन ( निरुहण ) बस्तियों का प्रयोग कराना चाहिए। यह आस्थापनबस्ति स्नेहबस्तियों के साथ-साथ भी दी जाती है ॥५४-५५॥

कफपित्तानिलेच्छव्रं यूषधीररसैः क्रमात्।

२३८

अष्टाङ्गहृदये

आहार-विधान—बस्ति-प्रयोग के दिनों में आहारविधि का शास्त्रीय निर्देश—कफदोष में यूष (जूस) के साथ, पित्तदोष में दूध के साथ और वातदोष में मांसरस के साथ सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

वातन्मोषधनिष्प्रायत्रिवृतासैन्धवैयुतः ॥ ५६ ॥

बस्तिरेकोऽनिले स्निग्धः स्वाद्व्रन्मोष्णो रसान्वितः।

वातदोष में बस्ति-प्रयोग—वातनाशक (भद्रदारु अथवा दशमूल आदि) द्रव्यों का क्वाथ बनाकर उसमें निशोथ, संधानमक, मधुर तथा अम्लरस एवं उष्णवीर्य पदार्थों को मिलाकर एक बस्ति देनी चाहिए। ॥ ५६ ॥

न्यग्राधादिगणक्वाथपञ्चकादिसितायुतो ॥ ५७ ॥

पित्ते स्वादुहिमौ साज्यक्षीरेक्षुरसमाधिकौ।

पित्तदोष में बस्ति-प्रयोग—न्यग्राधादि गण के क्वाथ में पञ्चकादि गणोक्त द्रव्यों का कल्क, मिश्री, घी, दूध, ईख का रस तथा मधु आदि मधुर एवं शीतल द्रव्यों को मिलाकर एक बस्ति देनी चाहिए। ॥ ५७ ॥

आरग्वधादिनिष्प्रायवत्सकादियुतास्त्रयः ॥ ५८ ॥

रूक्षाः सक्षौद्रगोमूत्रास्तीक्ष्णोष्णकटुकाः कफे।

कफदोष में बस्ति-प्रयोग—आरग्वधादि गणोक्त द्रव्यों के क्वाथ में वत्सकादि गणोक्त द्रव्यों का कल्क, रूक्षाकारक मधु, गोमूत्र, तीक्ष्ण, उष्ण एवं कटु द्रव्यों को मिलाकर तीन बस्तियाँ देनी चाहिए। ॥ ५८ ॥

वत्सक्यु—ऊपर कथित गणों के नाम आये हैं, उन्हें अ.हृ.सू. १५ में इस प्रकार देखें—वातनाशक गण श्लोक ५, न्यग्राधादि गण श्लोक ४१-४२, पञ्चकादि गण श्लोक १२, आरग्वधादि गण श्लोक ७ तथा १७-१८ तथा वत्सकादि गण श्लोक ३३-३४।

वयस्ते सन्निपातेऽपि दोषान् ध्वन्ति यतः क्रमात् ॥ ५९ ॥

सन्निपात में बस्ति-प्रयोग—सन्निपात में भी ऊपर कही गयी तीनों वात, पित्त तथा कफ नाशक बस्तियाँ क्रमानुसार दी जाती हैं। इस क्रम को कुशल चिकित्सक जानते हैं, अतएव ये तीनों दोषों का शोधन करती हैं। ॥ ५९ ॥

त्रिष्यः परं बस्तिमतो नेच्छन्त्यन्ये चिकित्सकाः। न हि दोषश्चतुर्थोऽस्ति पुनर्दीयते यं प्रति ॥ ६० ॥

तीन ही बस्तियाँ—इस दृष्टिकोण से कुछ चिकित्सक केवल तीन ही बस्तियाँ होती हैं, ऐसा कहते हैं; क्योंकि दोष भी तीन ही होते हैं, चौथा दोष भी नहीं होता, जिसके लिए अन्य बस्ति की कल्पना की जाय। ॥ ६० ॥

उत्कलेशनं शुद्धिकरं दोषाणां शमनं क्रमात्। त्रिधेव कल्पयेद्वस्तिमित्यन्येऽपि प्रचक्षते ॥ ६१ ॥

बस्तिनाम-भेद—दूसरे आचार्यों का कथन है कि विधिभेद से बस्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं—१. उत्कलेशन, जो भीतर जाकर जमे हुए दोषों को उभार देती है। २. शुद्धिकर, विरेचन द्वारा बाहर निकाल देने वाली तथा ३. शमन, उपस्थित दोषों का शमन करने वाली। ॥ ६१ ॥

दोषौषधादिवलतः सर्वभेदेत् प्रमाणयेत्।

उक्त मतों की प्रामाणिकता—उक्त सभी मत प्रामाणिक हैं, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि वात आदि दोषों का, विविध गुणवाले औषध-द्रव्यों का तथा देश-काल आदि के बल का विचार करने से इनकी प्रामाणिकता स्वयं सिद्ध है। वास्तव में जो भेद दृष्टिगोचर होता है, वह केवल विधिभेद ही है।

सम्यङ्निरूढलिङ्गं तु नासम्भ्राव्य निवर्तयेत् ॥ ६२ ॥

बस्तिकर्म की अवधि—जब तक इसी अध्याय में कथित सम्यक् निरूहण के लक्षण दिखलायी न दें तब तक बस्तिकर्म के प्रयोगक्रम को रोकना नहीं चाहिए। ॥ ६२ ॥

बस्तिविधिध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३९

बत्क्य—निरुहणबस्ति के सम्यग्योग का वर्णन इसी अध्याय के ५०वें पद्य में मूलरूप से कहा गया है, अतः वमन एवं विरचन के सम्यग्योग के समान इसके लक्षणों का भी विचार कर लेना चाहिए।

प्राक्स्नेह एकः पञ्चान्ते द्वादशास्थापनानि च । सान्वासनानि कर्मैव बस्तयश्चिंशदीरिताः ॥ ६३ ॥

बस्तिकर्म का वर्णन—प्रस्तुत बस्तिकर्म के आरम्भ में १ स्नेहबस्ति दी जाती है तथा अन्त में ५ स्नेहबस्तियाँ और बीच में १२ आस्थापन ( निरुहण ) बस्तियाँ तथा १२ अनुवासनबस्तियाँ दी जाती हैं। इस प्रकार इन बस्तियों की कुल संख्या ३० हो जाती है। इस क्रम से प्रयुक्त विधि को 'बस्तिकर्म' कहते हैं॥ ६३ ॥

कालः पञ्चदशैकोऽत्र प्राक् स्नेहोऽन्ते त्रयस्तथा । षट् पञ्चबस्त्यन्तरिताः—

बस्तिकाल का वर्णन—बस्तिकाल में सर्वप्रथम १ स्नेहबस्ति का प्रयोग किया जाता है और अन्त में ३ स्नेहबस्तियाँ दी जाती हैं, मध्य में ६ स्नेहबस्तियाँ तथा इनके बीच-बीच में ५ निरुहणबस्तियाँ दी जाती हैं। इस प्रकार इन कुल बस्तियों की संख्या १५ हो जाती है। इस क्रम से प्रयुक्त विधि को 'बस्तिकाल' कहते हैं।

—योगोऽष्टौ बस्तयोऽत्र तु ॥ ६४ ॥

त्रयो निरुहाः स्नेहाश्च स्नेहावाद्यन्त्योरुभौ ।

बस्तियोग का वर्णन—बस्तियोग में सर्वप्रथम १ स्नेहबस्ति और अन्त में १ स्नेहबस्ति दी जाती है। इन दोनों के बीच में ३ निरुहणबस्तियाँ एवं इन्हीं के बीच-बीच में ३ अनुवासनबस्तियाँ दी जाती हैं। इस प्रकार इन कुल बस्तियों की संख्या ८ हो जाती है। इस क्रम से प्रयुक्त विधि को 'बस्तियोग' कहते हैं॥ ६४ ॥

स्नेहबस्तिं निरुहं वा नैकमेवाति शीलयेत् ॥ ६५ ॥

उत्कलेशाश्विबधी स्नेहाश्विरुहान्मरुतो भयम् ।

स्नेह एवं निरुहण प्रयोग—केवल स्नेहबस्तियों अथवा केवल निरुहणबस्तियों का निरन्तर सेवन करना उचित नहीं है, क्योंकि केवल स्नेहबस्तियों का प्रयोग करने से दोनों का उत्कलेश ( पित्त एवं कफ दोनों की वृद्धि तथा मल का उमर आना ) हो जाता है और मन्दाश्वि हो जाती है। केवल निरुहणबस्तियों का निरन्तर अधिक सेवन करने से वातदोष की वृद्धि का भय हो सकता है॥ ६५ ॥

तस्माश्विरुढः स्नेहाः स्याश्विरुहृत्थानुवासितः ॥ ६६ ॥

बस्तियों का प्रयोगक्रम—इसलिए निरुहणबस्ति-प्रयोग के बाद स्नेहबस्ति का और स्नेहबस्ति के बाद निरुहणबस्ति का प्रयोग अवश्य करना चाहिए॥ ६६ ॥

स्नेहशोधनयुक्त्यैव बस्तिकर्म त्रिदोषजित् ।

बस्ति की त्रिदोषनाशकता—उक्त विधि के अनुसार स्नेहबस्ति द्वारा स्नेहन तथा निरुहण बस्ति द्वारा शोधन करने से यह बस्ति-प्रयोग त्रिदोषनाशक होता है।

हृस्वया स्नेहपानस्य मात्रया योजितः समः ॥ ६७ ॥

मात्राबस्तिः स्मृतः स्नेहः—

मात्राबस्ति का वर्णन—स्नेहपान की हृस्वमात्रा ( १ कर्ष = १ तोला ) के बराबर स्नेह को अनुवासनबस्ति द्वारा जो प्रयुक्त किया जाता है, उसका नाम 'मात्राबस्ति' है॥ ६७ ॥

—शीलनीयः सदा च सः । बालवृद्धाद्यभारस्त्रीव्यायामासक्तचित्तकैः ॥ ६८ ॥

वातभग्नाबलालाप्यिनुपेश्वरसुवालम्भिः । दोषज्ज्ञो निष्परीहारो बल्यः सुष्ठमलः सुखः ॥ ६९ ॥

२४०

अष्टाङ्गहृदये

मात्राबस्ति-सेवन —उक्त प्रकार की मात्राबस्ति का निम्नोक्त व्यक्तियों को सदा सेवन करने का निर्देश—बालक, वृद्ध, जो प्रतिदिन पैदल चलते हों, बोझ ढोते हों, स्त्री-सहवास करते हों, व्यायामशील व्यक्तियों को, विचारकों, वातरोगियों, अस्थिभंग से पीड़ितों, दुर्बलों, मन्दाग्रिवालों, राजाओं, धनवानों तथा सुख से जीवन बिताने वालों को इसका प्रतिदिन सेवन करना चाहिए। यह मात्राबस्ति सभी दोषों को शान्त करती है, इसमें किसी प्रकार का परहेज ( पथ्य-अपथ्य का विचार ) नहीं है। यह बलवर्धक है तथा मल-मूत्र को सरलता से निकालने वाली एवं सुखदायक होती है॥ ६८-६९॥

वक्तव्य —उक्त विषय का समर्थन देखें—च.सि. १।२७ में है। मात्राभेद से स्नेहपान तीन प्रकार का होता है—१. उत्तम मात्रा—१ पल = ४ तोला, २. मध्यम मात्रा—३ कर्ष = ३ तोला तथा ३. जघन्य मात्रा—आधा पल = २ तोला।

मात्राबस्ति की विशेषता —जिस प्रकार प्रतिदिन के भोजन में घृत आदि स्नेहों का सेवन किया जाता है, इसके लिए किसी प्रकार का परहेज नहीं किया जाता है, उसी प्रकार इस मात्राबस्ति के सेवन में भी किसी प्रकार के परीहार ( परहेज ) की आवश्यकता नहीं होती है। स्नेहपान की ह्रस्वमात्रा वह होती है, जो प्रातःकाल सेवन करने के बाद दोपहर के भोजन करने तक पच जाय। इसमें भी समाग्नि, मन्दाग्नि, विषमाग्नि एवं तीक्ष्माग्नि का विचार कर लेना चाहिए। ह्रस्वमात्रा में प्रयुक्त स्नेहपान से जो लाभ होते हैं वे समस्त मात्राबस्ति के सेवन से होते हैं।

बस्ती रोषेषु नारीणां योनिगर्भाशयेषु च। द्वित्रास्थापनशुद्धेभ्यो विदध्याद्वस्तिभुतरम्॥ ७०॥

उत्तरबस्ति का वर्णन —नर तथा नारियों के बस्तिगत रोगों में एवं विशेषकर नारियों के योनिगत तथा गर्भाशयगत रोगों में उत्तरबस्ति का प्रयोग तब करना चाहिए जब कि इसके पहले दो-तीन बार आस्थापन ( निरुहण ) बस्ति का प्रयोग कराकर मलाशय का भलीभाँति शोधन हो जाय॥ ७०॥

वक्तव्य —उत्तरबस्ति उसे कहते हैं जिसका प्रयोग नर एवं नारी के मूत्रमार्ग द्वारा किया जाता है। निरुहणबस्ति को शोधनबस्ति तथा अनुवासनबस्ति को स्नेहनबस्ति भी कहा जाता है।

आतुराङ्गुलमानेन तत्रेनैव द्वादशाङ्गुलम्। वृत्तं गोपुच्छवमूलमध्ययोः कृतकर्णिकम्॥ ७१॥

सिद्धार्थकप्रवेशाणं श्लक्षणं हेमादिसम्भवम्। कुन्दाश्चमारसुमनःपुष्पवृत्तोपमं वृद्धम्॥ ७२॥

उत्तरबस्ति में नेत्र का प्रमाण —मूत्रमार्ग में जो बस्ति दी जाती है, उसके नेत्र की लम्बाई रोगी की अँगुलियों से बारह अँगुल होती चाहिए। इस नेत्र का अगला भाग गोलाकार तथा शेष भाग गाय की पूँछ की भाँति अर्थात् आगे की ओर पतला और मूल ( जड़ ) की ओर क्रमशः मोटा होना चाहिए। उस नेत्र ( नलिका ) के मूल भाग में बस्तिपुट को बाँधने के लिए दो कर्णिकाएँ बनी हों। एक मूल में और दूसरी मध्य भाग की ओर। उसके नेत्र के अगले भाग का छिद्र इतना बड़ा हो जिसमें सरलता से सरसों का दाना प्रवेश कर सके। नेत्रनलिका का बाहरी भाग चिकना हो तथा सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं से बना हो। इसका अगला भाग कुन्द, कनेर अथवा चमेली के फूल के वृत्त के आकार का हो तथा उसे दृढ़ होना चाहिए॥ ७१-७२॥

तस्य बस्तिर्मृदुलघुमार्त्रा शुक्तिर्विकल्प्य वा।

स्नेहमात्रा का प्रमाण —उस उत्तरबस्ति का बस्तिपुट गुद में दी जाने वाली बस्ति की तुलना में छोटा तथा कोमल होना चाहिए। इसमें स्नेह की मात्रा एक शुक्ति ( २ कर्ष = २ तोला ) अथवा जिसे उत्तरबस्ति दी जा रही है उसके बल, अवस्था आदि का विचार कर तदनुसार कुछ कम या ज्यादा की जा सकती है।

वक्तव्य —स्त्री-पुरुष भेद से उत्तरबस्ति के विचारणीय विषयों के लिए आप देखें—सु.चि. ३७ श्लोक १०२ से १२१ तक; तभी इस प्रकरण में आवश्यक वय, मात्रा, काल आदि का स्पष्टीकरण हो सकता है, अतः आप उक्त सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य कर लें।

बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२४१

अथ स्नाताशितस्यास्य स्नेहबस्तिविधानतः ॥७३॥

ऋजोः सुखोपविष्टस्य पीठे जानुसमे मूर्दो। हृष्टे मेद्रे स्थिते चर्जा शनैः श्रोतोविशुद्धये ॥७४॥ सूक्ष्मां शलाकां प्रणयेतया शुद्धेऽनुसेवि। आमेहनान्तं नेत्रं च निष्कम्पं गुदवत्ततः ॥७५॥ पीडितेऽन्तर्गति स्नेहे स्नेहबस्तिक्रमो हितः।

उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि—उत्तरबस्ति का प्रयोग करने के पहले स्नेहबस्ति की विधि से उस व्यक्ति को गुनगुने जल से स्नान कराकर पथ्य भोजन खिलाकर, जानु (घुटने) भर ऊँचे मुलायम पीठ (आसन) पर सीधा तथा आराम से बैठे हुए पुरुष के हृष्ट एवं सीधे लिंग के मूत्र निकलने वाले छिद्र में श्रोतस् को शुद्ध करने के लिए सूक्ष्म (उस छिद्र में प्रवेश करने योग्य) शलाका (कैथीटर नामक आधुनिक यन्त्र) का धीरे-धीरे प्रवेश कराये। उस उत्तरबस्ति के नेत्र द्वारा मार्ग शुद्ध हो गया है, ऐसा अनुमान हो जाने पर सेवनी की सीध में मूत्रमार्ग के अन्त तक नेत्र का प्रवेश करता जाय। इसमें भी गुदबस्ति की भाँति नेत्र प्रवेश कराते समय चिकित्सक का हाथ हिलना नहीं चाहिए। तदनन्तर बस्तिपुट को दवाना चाहिए। जब स्नेहबस्ति (मूत्राशय) में पहुँच जाय तब बस्तिनेत्र को धीरे-धीरे निकालें। इस प्रकार उत्तरबस्ति-विधि से दिया गया स्नेह हितकर होता है ॥७३-७५॥

वक्तव्य—इसके बाद जब वह स्नेह लौट आता है, तो उस व्यक्ति को भूख लगने पर इसी अध्याय में कहे गये श्लोक ३० की भाँति उचित भोजन करायें। शंका—‘हृष्टे मेद्रे’ (अ.सं.सू. २८।६६); सुश्रुत में—‘ततः समं स्थापयित्वा नालमस्य प्रहर्षितम्’ । (सु.चि. ३७।११०) तथा चरक में—‘ऋजोः सुखोपविष्टस्य हृष्टे मेद्रे घृताक्तया। शलाकयाऽन्विष्य गतिं यद्यप्रतिहता ब्रजेत्’ ॥ (च.सि. ९।५४) इस प्रकार सभी आचार्यों का पुरुष की मूत्रेन्द्रिय में उत्तरबस्ति देने का एक ही दृष्टिकोण है और होना भी चाहिए। किन्तु चरक को छोड़कर अन्य सभी के वचन इस दृष्टि से तब तक निवादास्पद कहे जा सकते हैं जब तक हम निम्न समाधान पक्ष को प्रस्तुत नहीं करते। क्योंकि हृष्टमेद्रे (स्त्री-सहवास के लिए उघात पुरुष की मूत्रेन्द्रिय अर्थात् लिंग) इतना तन जाता है कि उसमें द्रवरूप मूत्र तो निकल ही नहीं पाता, बला उस स्थिति में उसके भीतर बस्तिनेत्र का प्रवेश बाधारहित कैसे किया या कराया जा सकता है?

समाधान—प्राचीन आचार्य-परम्परा पर अपना अज्ञान नहीं लादना चाहिए, अतएव सुश्रुत ने कहा है—‘एक ही शास्त्र को पढ़ता हुआ व्यक्ति शास्त्र के रहस्य को नहीं जान सकता, इसलिये जिसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया है वही शास्त्र के रहस्य को जान सकता है’। देखें—सु.सू. ४।७। जब हम व्याकरण की दृष्टि से विचार करते हैं, तो उक्त स्थलों में कहीं भी शंका नहीं रह जाती। ‘हृष तृष्णो’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने पर ‘हृष्ट’ रूप बनता है। जिसका अर्थ होता है—तृष्णित, हर्ष, विस्मित तथा प्रतिघात या प्रतिहत; इसी को मनोहृत भी कहते हैं। ‘धातूनाम् अनेकार्थत्वात्’ उनके प्रसंगवश अनेक अर्थ कर लिए जाते हैं, किन्तु हम उक्त अर्थों को कोश एवं व्याकरण की सहायता से ले रहे हैं। देखें—पाणिनीय सूत्र ‘हृषेर्लोमसु’ (७।२।२९) ‘विस्मितः प्रतिघातयोश्च’ (वार्तिक) के तथा ‘मनोहृतः प्रतिहतः प्रतिबद्धो हतश्च सः’ । (अमरकोश) आप ध्यान दें—हृष धातु से हृष्ट एवं हृषित दो ही रूप निष्पन्न होते हैं, न कि हर्षित या प्रहर्षित, जिसका प्रयोग सुश्रुत ने किया है। किन्तु ‘ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमभ्योऽनुधावति’ के अनुसार जब हम ‘हर्षित’ रूप को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, तो हमें ‘हर्षः सज्जातः अस्य’ इस प्रकार विग्रह करके ‘तदस्य सज्जातं तारकादिभ्य इतच्’ । (५।२।३६) सूत्र से इतच् प्रत्यय करना होगा, क्योंकि ‘तारकादिगण’ में हर्ष शब्द का पाठ है। इस दृष्टि से हर्ष शब्द का एक अर्थ प्रतिघात या प्रतिहत भी होता है, अतः लिंग की ‘प्रतिहत’ स्थिति में नेत्रप्रणयन सरल, स्वाभाविक एवं शास्त्रसम्मत है ही। चरक ने पहले ही कहा है—शलाका का प्रवेश करके देखें कि उसकी गति में कहीं रुकावट तो नहीं आ रही है? यदि आ रही हो तो बस्तिनेत्र का प्रवेश न करायें। क्या सुबोध भाषा है आचार्य चरक की!

इसी प्रसंग में आप आचार्य शार्ङ्गधर के विचारों को देखें—शा.उ.ख. ७।३-५। इन्होंने पुरुषों की उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि में इस प्रकार का उलझाने वाला पाठ नहीं दिया है।

१६ अ० ह०

२४९

अष्टाङ्गहृदये

बस्तीननेन विधिना दद्यात् त्रींश्चतुरोऽपि वा ॥ ७६ ॥

अनुवासनवच्छेपं सर्वमेवास्य चिन्तयेत्।

उत्तरबस्ति की संख्या—ऊपर कही गयी विधि से तीन या चार बस्तियाँ नर-नारी के मूत्रमार्ग में दें। शेष सभी विषयों (सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग, आहार-विहार एवं चिकित्सा आदि) का विचार अनुवासनबस्ति की भाँति करें ॥ ७६ ॥

स्त्रीणामार्तवकाले तु योनिर्गुह्याल्पपावृतेः ॥ ७७ ॥

विदधीत तदा तस्मादनुतावपि चालयेत्। योनिर्विघ्नशूलेषु योनिव्यापद्यसुन्दरे ॥ ७८ ॥

स्त्रियों में उत्तरबस्ति—स्त्रियों की योनि का मुख्य आर्तवकाल (मासिकधर्म के दिनों) में खुला रहता है, अतः उस काल में उत्तरबस्ति का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि इन दिनों दी गयी बस्ति के स्नेह का वह ग्रहण कर लेती है। अत्यन्त आवश्यकता होने पर ऋतुकाल के वीत जाने पर भी उत्तरबस्ति का प्रयोग किया जा सकता है। जैसे—योनिघ्न (काँच की भाँति योनि = गर्भाशय के बाहर निकल आने पर), योनिशूल, योनिव्यापदों तथा रक्तप्रदररोग आदि रोगों के होने पर उत्तरबस्ति का प्रयोग करना चाहिए ॥ ७७-७८ ॥

नेत्रं दशाङ्गुलं मूत्रप्रवेशं चतुरङ्गुलम्। अपत्यमार्गे योज्यं स्याद् द्रघङ्गुलं मूत्रवर्त्तनम् ॥ ७९ ॥ मूत्रकृच्छ्रविकारेषु, बालानां त्वेकमङ्गुलम्।

बस्तिनेत्र का परिमाण—उत्तरबस्ति का नेत्र १० अंगुल लम्बा होना चाहिए। इसके अगले भाग का छिद्र मूंग के दाने के सरलता से आने-जाने योग्य हो, उसका प्रवेश भ्रममार्ग में चार अंगुल मात्र कराना चाहिए। मूत्रकृच्छ्र आदि रोगों में जब इसे मूत्रमार्ग में प्रवेश कराना हो तो दो अंगुल मात्र प्रवेश करायें। कन्याओं को यदि मूत्रमार्ग में बस्ति देनी हो तो एक अंगुल मात्र प्रवेश करायें ॥ ७९ ॥

प्रकुञ्चो मध्यमा मात्रा, बालानां शुक्तिरेव तु ॥ ८० ॥

स्नेहमात्रा-निर्देश—स्त्रियों में उत्तरबस्ति-प्रयोग के लिए स्नेह की मध्यम मात्रा १ प्रकुञ्च = ४ तोला होती है और बालिकाओं के लिए मध्यम मात्रा १ शुक्ति = २ तोला होती है ॥ ८० ॥

उत्तानायाः शयानायाः सम्यक् सङ्कोच्य सन्धिनी। ऊर्ध्वजान्वास्त्रिचतुरानहोरात्रेण योजयेत् ॥

बस्तींस्त्रिरात्रमेवं च स्नेहमात्रां विवर्द्धयन्। श्रृहमेव च विश्रम्य प्रणिदध्यात्युत्स्थ्यहम् ॥ ८१ ॥

उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि—स्त्री को चित लेटाकर उसकी जानुओं को भलीभाँति मोड़कर घुटनों को ऊपर की ओर उठाकर एक दिन-रात (२४ घण्टे) में तीन अथवा चार बार बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। इस प्रकार स्नेह की मात्रा को क्रमशः बढ़ाता हुआ तीन दिन तक बस्तियों का प्रयोग कराता रहे। तीन दिन रुककर पहले की भाँति फिर तीन दिन तक बस्ति-प्रयोग करायें ॥ ८१-८२ ॥

बक्तव्य—स्त्रियों को उत्तरबस्ति का प्रयोग कराना केवल स्त्री-चिकित्सक का ही अधिकार है। यहाँ लोकाचार भी है और यही पक्ष न्यायसंहितासम्मत भी है। पुरुष-चिकित्सक इस कार्य को न करें।

इस सम्बन्ध में सुश्रुत ने मु.चि. ३७॥१४-११५ में उत्तरबस्ति-प्रयोगकर्ता को 'विचक्षणः' कहा है। यहाँ पर जो पाठभेद दिया है वह है 'समाहितः', जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य इल्लहण कहते हैं—'कामसङ्कल्परीहितेन अचलचितप्रकृतिना'। अर्थ स्पष्ट है। सुश्रुत एवं चरक ने प्रसवकाल में नारियों का अधिकार बतलाया है, यह बस्तिकर्म भी प्रायः उसी प्रकार की स्थिति है।

पक्षाद्विरेको वमिते ततः पक्षात्रिहृणम्। सद्यो निरुद्धश्चान्वास्यः सप्तरात्राद्विरेचितः ॥ ८३ ॥

वमन आदि में काल-निर्देश—वमन कराने के १५ दिन के बाद विरेचन करायें, तदनन्तर १५ दिन के बाद निरुहणबस्ति का प्रयोग करें और निरुहणबस्ति का प्रयोग करने के तत्काल बाद उसे अनुवासन-बस्ति दें और विरेचन कराने के एक सप्ताह बाद भी अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ८३ ॥

बस्तिविधिध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२४३

यथा कुसुम्भादियुतातोषाद्वागं हरेत्यटः । तथा द्रवीकृताद्देहाद्बस्तिर्निर्हरंते मलान् ॥ ८४ ॥ बस्ति द्वारा दोषनिर्हरण—जिस प्रकार जल में घुले हुए कुसुम्भी रंग को पट ( वस्त्र ) ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार शरीर में द्रवीभूत मलों को बस्तिप्रयोग शरीर से बाहर निकाल देता है ॥ ८४ ॥

शाखागताः कोष्ठगताश्च रोगा मर्मोर्ध्वसर्वावयवाङ्गजाश्च ।

ये सन्ति तेषां न तु कश्चिदन्यो वायोः परं जन्मनि हेतुरस्ति ॥ ८५ ॥

विष्टलेष्मपित्तादिमलोच्चयानां विशेषसंहारकरः स यस्मात् ।

तस्यातिवृद्धस्य शमाय नान्यद् बस्तेर्विना भेषजमस्ति कञ्चित् ॥ ८६ ॥

तस्माच्चिकित्सादृष्टिं प्रविष्टः कृत्स्ना चिकित्साऽपि च बस्तिरेकैः ।

बस्ति-प्रयोग की प्रशंसा—जो रोग शाखागत ( लम्बा तथा रक्त आदि धातुओं ), कोष्ठगत तथा मर्मस्थानों की विकृति द्वारा शरीर के सभी सिर आदि अवयवों में व्याप्त हो जाते हैं अथवा अंग-विशेष में व्याप्त होते हैं, उन सबकी उत्पत्ति में वातदोष के अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं होता है। क्योंकि मल, सूत्र, कफ, पित्त आदि शरीर के अन्य मलों को इधर-उधर करना तथा संहार ( शमन ) करना—ये सब वातदोष के कार्य हैं। अतः बड़े हुए अथवा विकारयुक्त वातदोष की शान्ति के लिए बस्तिप्रयोग के अतिरिक्त और कोई चिकित्सा नहीं है। इसलिए बस्तिचिकित्सा को आधी चिकित्सा माना जाता है, कुछ आचार्य इसे सम्पूर्ण चिकित्सा स्वीकार करते हैं ॥ ८५-८६ ॥

तथा निजागन्तुविकारकारिरक्तोपधत्वेन शिराव्यधोऽपि ॥ ८७ ॥

इति श्रीवैद्यपतिं सिंहगुप्तसूत्रोत्तममहामहटवरिचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने बस्तिविधिनामिकोनविंशतितमोऽध्यायः ॥ १९ ॥


सिरावेध का महत्त्व—इसी प्रकार शारीरिक तथा आगन्तुज रोगों का उत्पादक होने के कारण विकृत रक्तधातु की प्रधान चिकित्सा सिरावेध है। शल्यतन्त्र में सिरावेध को आधी चिकित्सा अथवा दूसरे विद्वानों के मत में इसे सम्पूर्ण चिकित्सा भी कहा गया है ॥ ८७ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार शल्यतन्त्र में सिरावेध को जिस प्रकार आधी चिकित्सा कहा गया है, वैसा ही महत्त्व कार्यचिकित्सा में बस्तिचिकित्सा का है। देखें—सु.शा. ८।२३ और च.सि. १।४०।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

बस्तिविधि नामक उसीसर्वा अध्याय समाप्त ॥ १९ ॥


विंशोऽध्यायः

अथातो नस्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से नस्यविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —पञ्चकर्मों के वर्णन-प्रसंग में क्रमशः वमन, विरेचन, अनुवासनबस्ति तथा निरुहणबस्तियों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ नस्यविधि का वर्णन किया जा रहा है। इन्हीं पाँच कर्मों को पंचकर्म कहा जाता है। वमन-विरेचन के पूर्व किये जाने वाले स्नेहन तथा स्वेदन कर्म इन्हीं के उपांग अथवा पुष्पपोषक अंग हैं। यह पञ्चकर्म-विधान एक ऐसा उपक्रम है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम ही कही जायेगी। आज चिकित्सक इसे भूल चुके हैं अथवा चिकित्सकों ने इस विधि की प्रायः उपेक्षा कर दी है; अथवा ऐसा कहें—इस कल-युग में इसके प्रयोग का किसी के पास समय ही नहीं है। जब समाज नहीं चाहता तो चिकित्सकों ने भी इसे भुला-सा दिया है।

नस्य —नासिका शब्द को 'नस्' आदेश तथा यत् प्रत्यय करने से 'नस्य' शब्द की निष्पत्ति होती है। उक्त 'यत्' प्रत्यय 'हित' अर्थ में प्रयुक्त है। इसके पर्याय हैं—नावन तथा नस्त। नासा को सिर का दरवाजा कहा गया है; अतएव नासिकाछिद्र द्वारा भीतर प्रवेश करायी गयी औषधि शृंगटक नामक मर्म में पहुँचकर और वहाँ अपना प्रभाव दिखाकर सिर, नेत्र, श्रोत्र, कण्ठ आदि की सिराओं से दोषों को शीघ्र निकालती है। देखें शृंगटक मर्म—अ. हू. शा. ४।३४ तथा सु. शा. ६।७। यह शृंगटक सिरामर्म है। यही कारण है कि नस्य के प्रयोग से नेत्र, कर्ण, नासा, मुख एवं शिरो रोगों में शीघ्र लाभ होता है। सुश्रुत के अनुसार—'औषधमौषधसिद्धो वा स्नेहो नासिकाभ्यां दीयत इति नस्यम्' (सु.चि. ४०।२१)।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च. सि. १, २, ९; सु. चि. ४० तथा अ. सं. सू. २९ में देखें।

ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु विशेषात्रस्यमिष्यते। नासा हि शिरसो द्वारं तेन तद्व्याप्य हन्ति तान् ॥ १ ॥

नस्य का वर्णन —जत्रु अस्थि (Collar bone) के ऊपरी भाग अर्थात् गरदन से लेकर ऊपर सिर तक के रोगों में नस्यकर्म विशेषरूप से लाभदायक होता है, क्योंकि नासिका के छिद्रों को शिरःप्रदेश का द्वार (दरवाजा) कहते हैं। अतः उस द्वार से दी गयी नस्य भीतरी अवयवों में व्याप्त होकर उन-उन अवयवों में होने वाले रोगों का विनाश कर देती है ॥ १ ॥

विरेचनं बृंहणं च शमनं च त्रिधाऽपि तत्।

नस्यकर्म के भेद —उक्त नस्यकर्म विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. विरेचन —जो सिर में स्थित कफ आदि दोषों को नासिका के छिद्रों से बाहर निकाल देता है, इसे आप वमन कहें अथवा विरेचन। २. बृंहण —जो शिरःप्रदेश में स्थित समस्त अवयवों को पुष्ट करता है। ३. शमन —जो वात आदि दोषों का शमन (शान्ति) करता है।

विरेचनं शिरःशूलजाडयस्यन्दगलामये ॥ २ ॥

शोफगण्डकुमिप्रस्थिकुष्ठापसारपीनसे ।

विरेचन-नस्य का प्रयोग —शिरःशूल, बुद्धि, मन तथा नासिका आदि की जड़ता (अकर्मण्यता) में, अभिष्यन्द नामक नेत्ररोग में, गल्लरोगों (शोय, स्वरभेद आदि) में, सूजन में, गलगण्ड में, क्रिमिरोगों

नस्यविधिरध्यायः २० ]

सूत्रस्थानम्

२४५

में, कफज ग्रन्थिरोग में, कुष्ठरोग, अपस्माररोग तथा पीनस ( प्रतिष्प्याय ) रोग में इसका प्रयोग किया जाता है॥ २॥

बृह्णं वातजे शूलं सूर्यावर्ते स्वरक्षये॥ ३॥ नासास्यशोषे वाक्सङ्घे कृच्छ्रबोधेऽवबाहुके।

बृह्ण-नस्य का प्रयोग—वातजनित शूल में, सूर्यावर्तीरोग में, स्वरक्षयरोग में, नासिकाशोथ में, मुखशोथ में, वाणी की हकावट में, बड़े कष्ट से नींद के खुलने में तथा अवबाहुक नामक वातरोग में इसका प्रयोग करना चाहिए॥ ३॥

शमनं नीलिकाब्यङ्गकेशदोषाक्षिराजिषु॥ ४॥

शमन-नस्य का प्रयोग—नीलिका ( शुद्धरोग-विशेष ), ब्यंग, बालों का अकाल में पकना या झड़ना तथा आँखों में रेखा के आकार की सिराओं का उभर आना आदि रोगों में करना चाहिए॥ ४॥

यथास्वं यौगिकैः स्नेहैर्यथास्वं च प्रसाधितैः। कल्कव्याथादिभिश्चाष्टं मधुपद्मसवैरपि॥ ५॥

विरेचन-नस्य के द्रव्य—रोगों को ध्यान में रखकर सरसों आदि स्नेह ( तेल ) से सिद्ध किये गये स्नेहन-द्रव्यों द्वारा मधु, लवण तथा आसव आदि के संयोग से प्रथम विरेचन-नस्य का प्रयोग किया जाता है॥ ५॥

बृह्णं धन्वमांसोत्थरसासुक्खपूरैरपि। शमनं योजयेत्पूर्वैः क्षीरेण सलिलेन वा॥ ६॥

बृह्ण-नस्य के द्रव्य—धन्व ( जांगल ) देशीय पशु-पक्षियों के मांसरस से या उनके रक्त से अथवा राल तथा गुग्गुलु आदि द्रव्यों के प्रयोग से बृह्ण-नस्य देनी चाहिए।

शमन-नस्य के द्रव्य—घृत आदि मुटु स्नेहों से अथवा कोमल द्रव्यों के कल्क या क्वाथों से अथवा गाय या बकरी के दूध से अथवा जल से नस्य देनी चाहिए॥ ६॥

बक्तव्य—जल द्वारा जो नस्य-प्रयोग किया जाता है, उसे नासिका-छिद्र से जलपान करना भी कहते हैं। योगशास्त्र में इसे 'नेतित्रिया' कहते हैं। इसके प्रयोग से ऊर्ध्वजनुगत रोग कभी नहीं होते। इसका अभ्यास योग्य गुरु की देख-रेख में करना चाहिए।

मर्शश्च प्रतिमर्शश्च द्विधा स्नेहोऽत्र मात्रया। कल्काद्यैरवपीडस्तु स तीक्ष्णैर्मूर्दुरेचनः॥ ७॥

ध्यानं विरेचनश्चूर्णां—

नस्य के भेद—स्नेहन ( बृह्ण ) नस्य मात्राभेद से दो प्रकार का होता है—१. मर्श नस्य तथा २. प्रतिमर्श नस्य। शिरोविरेचन-नस्य भी दो प्रकार का होता है—१. अवपीड या अवपीडन नस्य और २. ध्यान या प्रधमन नस्य। अवपीड-नस्य उसे कहते हैं जो कल्क को निचोड़ कर उससे निकले हुए रस से दिया जाता है अथवा क्वाथ आदि के रस से दिया जाता है। ध्यान-नस्य उसे कहते हैं जिसमें शिरोविरेचक चूर्णों को नासिका-छिद्र के भीतर फूंककर प्रवेश कराया जाता है॥ ७॥

—युज्यतां मुखवायुना। षडङ्गुलद्विमुखा नाड्या भेषजगर्भया॥ ८॥ स हि भूरितरं दोषं चूर्णत्वादपकर्षति।

ध्यान ( प्रधमन ) नस्य की प्रयोग-विधि—कटफल आदि के कपडहन चूर्ण को ६ अंगुल लम्बी एक ऐसी नाली जिसके दोनों ओर छिद्र हों, उसमें मात्रानुसार औषधचूर्ण भरकर उस नाली को नासिकाछिद्र में डालकर दूसरी ओर से फूंककर भीतर प्रवेश करा दें। इस प्रकार वह चूर्ण नासिकाछिद्र के भीतर पहुँचकर सिर के अनेक वात-कफ आदि दोषों को बाहर की ओर निकाल देता है॥ ८॥

बक्तव्य—यह प्रधमन-नस्य की शास्त्रीय विधि है। इसी का एक भेद है—सुंधनी। इसका सामान्य प्रयोग इस प्रकार भी देखा जाता है—चूटकीभर चूर्ण को नाक के भीतर प्रवेश कराकर ऊपर की ओर को श्वास द्वारा खींच लिया जाता है। इससे कफ आदि विकार छींक के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।

१४६

अष्टाङ्गहृदये

प्रदेशिन्यङ्गुलीपर्वहृद्यान्मप्रसमुद्भूतात्

॥११॥

यावत्पतत्यसौ बिन्दुर्देशाष्टौ षट्क्रमेण ते । मर्शस्योत्कृष्टमध्योना मात्रास्ता एव च क्रमात् ॥ १० ॥

बिन्दुद्वयोनाः कल्कादेः—

नस्य की मात्रा—नस्य के योग्य किसी द्रव में प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के दो पर्वों ( गॉठों ) को डुबाकर निकालने पर जो बूँदें गिरती हैं, उसे बिन्दु कहते हैं। उसके परिमाण से मर्श नामक नस्य की तीन मात्राएँ उत्तम, मध्यम, हीन भेद से इस प्रकार निर्धारित की गयी हैं—१. उत्तम मात्रा १० बूँदें अर्थात् दोनों नासिकाछिद्रों में ५-५ बूँदें, २. मध्यम मात्रा ८ बूँदें अर्थात् दोनों में ४-४ बूँदें और ३. हीन मात्रा ६ बूँदें अर्थात् दोनों में ३-३ बूँदें। ऊपर कहे गये विवेचन तथा शमन नामक नस्यों की मात्रा, जिनमें कल्क, ब्वाथ, जल आदि द्रव द्रव्यों का प्रयोग निर्दिष्ट है, उनकी मात्रा उक्त मात्राक्रम में से प्रत्येक में दो संख्या कम कर देने से इस प्रकार हो जायेगी। यथा—८ बूँदों की उत्तम मात्रा, ६ बूँदों की मध्यम मात्रा और ४ बूँदों की हीन मात्रा होती है ॥ १-१० ॥

वक्तव्य—प्रतिमर्शनस्य की मात्रा आदि का विस्तृत विवेचन मु. चि. ४०।५२-५३ में तथा च. सि. १।१३ में देखें। सामान्य रूप से प्रतिमर्श-नस्य की मात्रा एक-एक बूँद है। स्नान करने के पहले जो नासिकाछिद्र में तेल डाला या सूँघा जाता है, यही उक्त नस्य का वास्तविक स्वरूप है।

—योजयेन्न तु नावनम् । तोयमद्यगरस्नेहपीतानां पातुमिच्छताम् ॥ ११ ॥

भुक्तभक्तशिरःस्नातस्नातुकामसुतासुजाम् । नवपीनसवेगार्तसूतिकाश्चासकासिनाम् ॥ १२ ॥

शुद्धानां दत्तबस्तीनां तथाऽनार्तबदुर्दिने । अन्यत्रात्ययिकिदाव्याधेः—

नस्य के अयोग्य ब्यक्ति—इन्हें नस्यकर्म का प्रयोग न करायें—जिन्होंने तत्काल जलपान, मद्यपान तथा गर ( दूधोविष ) का पान किया हो अथवा जो इन्हें पीना चाहते हों, जिन्होंने भात आदि का भोजन किया हो, शिरःस्नान किया हो अथवा जो नहाने के लिए तैयार हों, जिन्होंने रक्तमोक्षण कराया हो, जिन्हें अभी-अभी प्रतिशय्य हुआ हो, जो मल-मूत्र के वेग से पीड़ित हों, जो सूतिकण हों, श्वास तथा काम रोग से पीड़ित हों, जिन्हें वमन तथा विवेचन का प्रयोग करकर शुद्ध किया गया हो, जिन्हें बस्तिप्रयोग कराया गया हो तथा वर्षा ऋतु के अतिरिक्त ऋतुओं में जब बादल छाये हों; इन स्थितियों में नस्य का प्रयोग न करायें। यदि आवश्यक हो तो नस्य-प्रयोग किया जा सकता है ॥ ११-१२ ॥

—अथ नस्यं प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥

प्रातः श्लेष्मणि, मध्याह्ने पिप्ते, सायंनिशोश्चल्ले । स्वस्थवृत्ते तु पूर्वहि शरत्कालबसन्तयोः ॥ १४ ॥

शीते मध्यन्दिने, ग्रीष्मे सायं वर्षासु सातपे । वाताभिभूते शिरसि हिम्भायामपतानके ॥ १५ ॥

मन्यास्तम्भे स्वरभ्रंशे सायंप्रातर्दिने दिने । एकाहान्तरमन्यत्र—

नस्य के योग्य काल—कफज रोगों में प्रातःकाल, पित्तज रोगों में दोपहर के समय तथा वातज रोगों में सायंकाल नस्य का सेवन करना चाहिए। यदि स्वस्थ ( नीरोग ) पुरुष को नस्य-प्रयोग कराना हो तो शरद तथा वसन्त ऋतुओं में प्रातःकाल, शीतकाल ( हेमन्त तथा शिशिर ऋतु ) में दोपहर के समय, ग्रीष्म ऋतु में सायंकाल और वर्षा ऋतु में जब या जिस दिन धूप निकली हुई हो नस्य-सेवन कराना चाहिए।

रोगानुसार नस्य-प्रयोग—शिरःप्रदेश में वातदोष का प्रकोप होने पर, हिनका ( हिनकी ) में, अपतानक ( देखें—माधवनिदान-वातव्याधि ), मन्यास्तम्भ एवं स्वरभ्रंश ( स्वरभेद ) आदि में प्रतिदिन प्रातः तथा सायंकाल नस्य-प्रयोग कराना चाहिए। इनके अतिरिक्त दूसरे रोगों में एक दिन का अन्तर देकर नस्य दें ॥ १३-१५ ॥

—सप्ताहं च तदाचरेत् ॥ १६ ॥

नस्य-सेवन की सीमा—और उस ( नस्य ) का सेवन एक सप्ताह तक करना चाहिए ॥ १६ ॥

नस्यविधिर्ध्यायः २० ]

सूत्रस्थानम्

२४७

वक्तव्य —बुद्धबाग्भट का कथन है कि तब तक नस्य का प्रयोग करता या करता रहे, जब तक उसके सम्यग्योग के लक्षण दिखलायों न दें, उसमें भले ही ५, ७ अथवा ९ दिन क्यों न लग जायें। यह निर्देश तर्कसंगत तथा व्यवहारोचित है। देखें—अ. सं. सू. २९।१७। इसी के आगे उसमें नस्य के सम्यग्योग आदि का भी वर्णन किया है। अष्टांगहृदय में उक्त विषय आगे श्लोक २४-२५ में दिया है।

स्निग्धस्विन्नोत्तामङ्गुस्य प्राकृतावशयकस्य च । निवातशयनस्यस्य जत्रुर्ध्वं स्वेदयेत् पुनः ॥ १७ ॥ अथोत्तानजुदेहस्य पाणिपादे प्रसारिते । किञ्चिदुन्नतपादस्य किञ्चिन्मृदूनि नाभिते ॥ १८ ॥ नासापुटं पिधायैकं पर्यायेण निषेचयेत् । उष्णाम्बुतत्पं शैषयं प्रणाडद्या पिचुताऽथवा ॥ १९ ॥ दत्ते पादतलस्कन्धहस्तकर्णदि मर्दयेत् । शनैरुच्छिद्य निष्ठोवेत्पार्श्वयोर्भयोस्ततः ॥ २० ॥ आभेषजक्षयादेवं द्विस्त्रिर्वा नस्यमाचरेत् ।

नस्य का पूर्वकर्म —नस्य का प्रयोग कराने के पहले शिरःप्रदेश का स्नेहन तथा स्वेदन कराना चाहिए, उसके बाद अन्य आवश्यक कार्य ( मल-मूत्र आदि का त्याग ) कर लेने चाहिए। फिर उस व्यक्ति को ऐसी शय्या पर लेटायें जहाँ सीधे हवा का प्रवेश न होता हो। जब वह भलीभाँति लेट जाय तो फिर उसके शिरःप्रदेश का स्वेदन करारक उसे निम्नलिखित विधि से नस्य-प्रयोग कराना चाहिए।

नस्य-प्रयोगविधि —नस्य देने के लिए उस व्यक्ति को चित ( सीधा ) लिटाकर उसके हाथ-पाँव फैला दें और कुछ पैरों को उठा दें तथा उसके सिर को झुका दें। पहले नासिका के एक छिद्र को ढककर दूसरे छिद्र में, फिर उस छिद्र को ढककर पहले वाले छिद्र में डालें। नासिका में डालने योग्य औषधद्रव को किसी पात्र में रखकर उसे गरम पानी वाले पात्र में रखकर गुनगुना कर लें, तदनन्तर नाली से या पिचु ( हर्द के फाहा ) से नाक में डालें। औषधद्रव को डाल देने के बाद पाँव के तलुओं को, कन्धों को, हथेलियों तथा कर्णपालियों को मसलते रहें। इसी बीच वह व्यक्ति उस औषधद्रव को ऊपर की ओर खींचे और दोनों नासापुटों के मल को दोनों ओर तब तक निकाले जब तक पूरा औषधद्रव निकल न जाय। इसी विधि से दो या तीन बार उक्त औषधद्रव को नासापुटों में लालें। यह मर्शनस्य की प्रयोगविधि है ॥ १७-२० ॥

मूर्च्छायां शीततोयेन सिञ्चेत्परिहरन् शिरः ॥ २१ ॥

मूर्च्छा-शान्ति की विधि —नस्य का प्रयोग कराते समय उस व्यक्ति को मूर्च्छा ( बेहोशी ) आ जाय तो उसके सिर को बचाकर शेष अंगों में शीतल जल का छिड़काव कराना चाहिए। इस उपचार से वह होश में आ जाता है ॥ २१ ॥

स्नेहं विरेचनस्यान्ते दद्याद्वोषाद्यपेक्षया ।

स्नेहतस्य-प्रयोग —शिरोंविरेचन-नस्यप्रयोग के अन्त में वात आदि दोष तथा देश एवं काल का विचार करके किसी स्नेह नस्य का प्रयोग कराना चाहिए ( दोष एवं देश-काल का विवेचन पीछे १३ से १५ पद्यों में देखें )।

नस्यान्ते वाक्शतं तिष्ठेदुत्तानः—

नस्य-प्रयोग की प्रतीक्षा —नस्य का प्रयोग कर लेने के बाद वह व्यक्ति वाक्शतपरिमित ( ३-४ मिनट ) समय तक चित लेटकर उसकी प्रतीक्षा करे।

—धारयेत्ततः ॥ २२ ॥

धूमं पीत्वा कबोष्णाम्बुकवलान् कण्ठशुद्धये ।

धूमपान-प्रयोग —उसके बाद विधिवत् धूमपान करके गला को शुद्ध करने के लिए गुनगुने जल से कुल्ला करें ॥ २२ ॥

२४८

अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि ने विशेष करके नस्य शब्द का प्रयोग कहीं किया है, इसके लिए देखें—सू. चि. ४०।२१। वृद्धवाग्भट ने नस्य-प्रयोगकाल में क्रोध, हँसना, बोलना, शरीर के अवयवों को हिलाना आदि न करे, ऐसा निर्देश दिया है। देखें—अ. सं. सू. २९।१६।

सम्यक्स्निग्धे सुखोच्छ्वासस्वप्नबोधाक्षपाटवम् ॥ २३ ॥

स्नेहन-नस्य का समयोग—स्नेहन-नस्य का सम्यग्योग होने पर ये लक्षण होते हैं—श्वास-प्रश्वास की गति का सुखपूर्वक होना, निद्रा का भलीभाँति आना, सुख से जागना और श्रोत्र आदि सभी ज्ञानेन्द्रियों में अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने की शक्ति का होना ॥ २३ ॥

रुक्षेऽक्षितस्थता शोषो नासास्ये मूर्द्धशून्यता।

रुक्ष-नस्य का हीनयोग—रुक्ष-नस्य के हीनयोग होने पर ये लक्षण होते हैं—आँखों में जकड़न, नासिका के छिद्रों तथा मुखप्रदेश में सूखापन तथा शिरःप्रदेश में सुनपन का अनुभव होना।

स्निग्धेऽति कण्ठगुह्यताप्रसेकाहृषीनीसाः ॥ २४ ॥

स्नेहन-नस्य का अतियोग—स्नेहन-नस्य के अतियोग होने पर ये लक्षण होते हैं—नासिका में खुजली का होना, भारीपन, नासिका से तथा नेत्रों से लगातार स्नाव का निकलना, भोजन के प्रति अहर्नि तथा पीनस (प्रतिशय) का होना ॥ २४ ॥

सुविरिक्तेऽक्षिलघुतावक्त्रस्वरविशुद्धयः ।

विरेचन-नस्य का सम्यग्योग—विरेचन-नस्य के सम्यग्योग होने पर ये लक्षण होते हैं—आँखों में हल्कापन, मुख की शुद्धि तथा स्वर में स्पष्टता की प्रतीति होना।

दुर्विरिक्ते गदोद्रेकः, क्षामताऽतिविरेचिते ॥ २५ ॥

मिथ्यायोग, हीनयोग के लक्षण—विरेचन-नस्य के मिथ्यायोग होने पर रोगों की वृद्धि तथा विरेचन के हीनयोग होने पर शरीर में कृशता तथा दुर्बलता ये लक्षण होते हैं ॥ २५ ॥

बक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने कहा है कि स्नेहविधि का सभी कार्य पूरा हो जाने पर उस व्यक्ति को स्नेहोक्त आचार के पालन का आदेश दें। देखें—अ. सं. सू. २९।१७। इसका विस्तार से वर्णन अ. सं. सू. २५।४१ से ४४ तक के श्लोकों में दिया गया है।

प्रतिमर्शः क्षतक्षामबालवृद्धसुखात्मसु । प्रयोज्योऽकालवर्षेऽपि—

प्रतिमर्शनस्य-प्रयोग—उरःक्षत, कृशता, बालक, वृद्ध तथा सुकुमार व्यक्तियों में अकाल में अर्थात् निर्दिष्ट समय के आगे-पीछे भी और वर्षाकाल में भी कराया जा सकता है।

—न त्विष्टो दुष्प्रपीनसे ॥ २६ ॥

मद्यपीतेऽबलश्रोत्रे कृमिदूषितमूर्द्धनि । उत्कृष्टोत्तिलिष्टदोषे च, हीनमात्रतया हि सः ॥ २७ ॥

प्रतिमर्श-नस्य का निषेध—दुष्ट पीनस (प्रतिशय) में, मद्यपान करने के बाद या मदात्यरोग में, कर्णविकारों में, शिरःप्रदेश में क्रमियों के उत्पन्न हो जाने पर, बड़े हुए दोषों में तथा उभड़े हुए दोषों में इस प्रतिमर्श-नस्य का प्रयोग न करे। क्योंकि इसकी मात्रा कम होती है, अतः वह रोगों को दूर नहीं कर सकती ॥ २६-२७ ॥

निशाहर्भुक्तवाताहःस्वप्नाव्ध्रमरेतसाम् । शिरोऽभ्यअनगण्डूषप्रप्तावाजनवर्चसाम् ॥ २८ ॥

दन्तकाष्ठस्य हासस्य योज्योऽन्तेऽसौ द्विबिन्दुकः ।

प्रतिमर्श-नस्य के पन्द्रह काल—१. रात्रि के अन्त में (प्रातः उठते ही), २. दिन के अन्त में, ३. भोजन करने के अन्त में, ४. वमन करने के अन्त में, ५. दिन में सोकर उठने के बाद, ६. मार्ग चलने के अन्त में, ७. परिश्रम करने के अन्त में, ८. स्त्री-सहवास के अन्त में, ९. सिर में अभ्यंग कराने के अन्त

नस्यविधिरध्यायः २० ]

सूत्रस्थानम्

२४९

में, १०. कवलधारण के अन्त में, ११. प्रसाव ( पेशाब करने ) के अन्त में, १२. अंजन लगाने के बाद, १३. मलत्याग करने के बाद, १४. दातीन करने के बाद तथा १५. हँसी-मजाक करने के बाद २ बूँद की मात्रा में प्रतिमर्श की एक नस्य लें ॥ २८ ॥

पञ्चसु स्रोतसां शुद्धिः, कलमानशस्त्रिषु क्रमात् ॥ २९ ॥

दूषलं पञ्चसु, ततो दन्तदाढर्यं मरुच्छमः ।

प्रतिमर्श-नस्य के लाभ—ऊपर कहे गये प्रथम पाँच कालों में नस्य लेने से स्रोतों की शुद्धि होती है। क्रमशः अगले तीन कालों में नस्य का प्रयोग करने से कम्म ( थकावट ) का नाश, उसके आगे पुनः पाँच कालों में नस्य का सेवन करने से दृष्टि की शक्ति बढ़ती है, इसके आगे शेष दो ( १४ तथा १५ ) कालों में नस्य लेने से क्रमशः दांतों में स्थिरता एवं वातदोष की शान्ति होती है। वृद्धवाम्भट ने इसकी मात्रा १ या २ बूँद स्वीकार की है ॥ २९ ॥

न नस्यमूनसप्ताब्दे नातीताशीतिवत्सरे ॥ ३० ॥

न चोनाष्टादशे धूमः, कबलो नोतपञ्चमे । न शुद्धिरूनदशमे न चातिक्रान्तसप्ततौ ॥ ३१ ॥

अवस्था का विचार—प्रायः सात वर्ष की अवस्था के पहले तथा अस्सी वर्ष की अवस्था के बाद मर्श नस्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए। १८ वर्ष की अवस्था के पहले धूमपान का प्रयोग, ५ वर्ष की अवस्था के पहले कवल का प्रयोग न करे। १० वर्ष की अवस्था के पहले तथा ७० वर्ष की अवस्था के बाद शोधन ( वमन, विरेचन तथा सिरावेध ) का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३०-३१ ॥

बक्तव्य—उक्त अवस्था की सीमा स्वस्थ पुरुष को चिर-स्वस्थ रखने के दृष्टिकोण से कही गयी है। रुग्णावस्था में इन नियमों का पालन हो पाना सम्भव नहीं होता, अपितु आवश्यकता पड़ने पर उक्त सभी कर्म करने ही पड़ते हैं।

आजन्ममरणं शस्तः प्रतिमर्शस्तु बस्तिवत् । मर्शवच्च गुणान् कुर्यात्स हि नित्योपसेवनात् ॥ ३२ ॥

न चात्र यन्त्रणा नापि व्यापद्भ्यो मर्शवद्भ्यम् ।

प्रतिमर्श-नस्य का प्रयोग जन्म से लेकर मरण के पूर्व तक किया जाना श्रेयस्कर होता है। इसी प्रकार मात्राबस्ति का प्रयोग भी जीवनभर किया जाता है। प्रतिमर्श-नस्य का यदि प्रतिदिन सेवन किया जाता है, तो वह मर्श नस्य के समान ही गुणदायक होती है। इसमें किसी प्रकार की यन्त्रणा ( आहार-विहार आदि का बन्धन ) नहीं है और इससे मर्श नस्य के समान रोगों की उत्पत्ति होने का भय भी नहीं है ॥ ३२ ॥

तैलमेव च नस्यार्थे नित्याभ्यासेन शस्यते ॥ ३३ ॥

शिरसः श्लेष्मधामत्वात्तन्नेहाः स्वस्यस्य नेतरे ।

नस्य में तेल का प्रयोग—स्वस्थ पुरुष को प्रतिदिन नस्य ( प्रतिमर्श ) करने के लिए तेल ( सरसों का तेल ) की ही प्रशंसा की गयी है, क्योंकि सिर कफ का घर है। अतः दूसरे स्नेह कफकारक होते हैं, अतएव उनका प्रयोग उचित नहीं माना गया ॥ ३३ ॥

आशुक्कुचिरकारित्वं गुणोत्कर्षापकृष्टता ॥ ३४ ॥

मर्शे च प्रतिमर्शे च विशेषो न भवेद्यदि । को मर्श सपरीहारं सापदं च भजेत्ततः ॥ ३५ ॥

अच्छपानविचाराख्यां कुटीवातातपस्थितौ । अन्वासमात्राबस्ती च तद्वदेव विनिर्दिशेत् ॥ ३६ ॥

मर्श-प्रतिमर्श में फलभेद—मर्श नस्य शीघ्र अपना फल देती है, अधिक काल तक गुणकारक होती है और प्रतिमर्श नस्य विलम्ब से फल देती है तथा उससे कम गुणकारक होती है। यदि मर्श तथा प्रतिमर्श नस्य में इस प्रकार का परस्पर फलभेद न होता, तो कौन आहार-विहार के परिहार ( नियन्त्रण ) वाले मर्श नस्य का सेवन करता। क्योंकि मर्श नस्य के प्रयोग में हीनयोग तथा अतियोग होने का भय बना

२५०

अष्टाङ्गहृदय

रहता है। इसी प्रकार स्नेहपान के अच्छपान तथा विचारणा में, रसायन-विधान के कुटीप्रावेशिक तथा वातातपिक के प्रयोगों में और बस्ति-विधान के अनुवासनबस्ति एवं मात्राबस्ति के प्रयोगों में परस्पर भेद का कारण तथा उनके लाभों पर ध्यान देना चाहिए। शास्त्रकारों ने जो प्रत्येक विधि के भेदों का वर्णन किया है वे सब सहेतुक हैं, लाभदायक हैं, भले ही उनमें पथ्य-परहेज अनिवार्य होता है ॥ ३४-३६ ॥

जीवन्तीजलदेवदारुजलदत्वकसेव्योगपीहिमं

दार्वीत्वइमधुकफलागुस्वरीपुण्ड्राहबिल्वोत्पलम् ।

धावन्वी सुरभिं स्थिरे कुमिहरं पत्रं वृष्टि रेणुकां

किञ्जल्कं कमलाद्वलां शतगुणे विव्येऽम्मसि क्वाथयेत् ॥ ३७ ॥

तैलाद्वसं दशगुणं परिशेष्य तेन तैलं पत्रेन सलिलेन दशैव वारान् ।

पाके क्षिपेच्च दशमे सममाजदुग्धं नस्यं महागुणमुशन्त्यणुतैलमेतत् ॥ ३८ ॥

अणुतैल-निर्माणविधि—जीवन्ती, नेत्रबाला, देवदारु, केवटीमोथा, दालचीनी, खस, सारिवा, चन्दन, दाहहल्दी, मुलेठी, नागरमोथा, अगह, त्रिफला, पुण्डेरिया, बेलगिरी, कमल, कण्टकारी, वनभण्टा, रासना, शालपर्णी, पुष्पपर्णी, वायविडंग, तेजपत्ता, छोटी इलायची, रेणुका, कमल का केसर तथा बला—उक्त सभी द्रव्यों को समान भाग लेकर जौकट कर लें। द्रव्यों के परिमाण से सौ गुना वर्षा के जल में क्वाथ करें। जब पकते-पकते दसवाँ हिस्सा जल शेष रह जाय तो इसे छान लें। तदनन्तर क्वाथ से दशमांश तेल लें और बराबर का क्वाथजल उस तैल में डालकर पाक करें। इसी प्रकार और आठ बार समान भाग क्वाथ जल डाल-डालकर कुल मिलाकर नौ बार उस तैल का पाक करें। दसवाँ बार पाक करते समय क्वाथ के साथ समान भाग बकरी का दूध भी उसमें डाल कर पाक करें। यह 'अणुतैल' है। इसका नस्य अत्यन्त गुणकारी होता है ॥ ३७-३८ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान २९।९ तथा १० में दो अणुतैलों का वर्णन है। उक्त योग दूसरे योग से मिलता-जुलता है। यही पाठ चरक के अनुकूल भी है। देखें—च. सू. ५।६३-७०। चरकोक्त योग तथा दोनों वाग्भटों के योग नस्य के प्रयोग में आते हैं। ऊपर दिये गये 'बला' शब्द से 'बरियारा' का ग्रहण करना चाहिए।

घनोन्नतप्रसन्नत्वकस्कन्धग्रीवास्यवक्षसः । दृढेन्द्रियास्तपलिता भवेयुर्नस्यशीलिनः ॥ ३९ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने नस्यविधिर्नाम विशोऽध्यायः ॥ २० ॥


स्नेहन-नस्य से लाभ—जो प्रतिदिन स्नेहन-नस्य का प्रयोग करते हैं, उनकी त्वचा, कन्धे, गरदन, मुखमण्डल तथा वक्षस ( छाती ) घन ( ठोस ), उन्नत ( ऊँचे ), प्रसन्न ( प्रसादगुणयुक्त ) हो जाते हैं। इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो जाती हैं और उनके बाल समय से पहले सफेद नहीं होते हैं ॥ ३९ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

नस्यविधि नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २० ॥


एकविंशोऽध्यायः

अथातो धूमपानविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से धूमपानविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —ऊर्ध्वजनुविकारों के प्रशमन ( चिकित्सा ) के लिए २०वें अध्याय में नस्य के भेद-उपभेदों का वर्णन, उनकी सेवन-विधि तथा उससे होने वाले लाभ-हानियों का वर्णन किया गया है। उसके बाद वर्णन किया जाने वाला यह धूमपान भी उक्त विकारों में हितकर होता है, इसका वर्णन इस अध्याय में किया जायेगा। यह धूमपान बीड़ी, सिगरेट, सिगार तथा चरस आदि विकारकारक धूमपानों से सर्वथा भिन्न एवं उपयोगी है। इसके पर्याय हैं—धूम्र, धूमल।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५; सु.चि. ४० तथा अ.सं.सू. ३०। सभी संहिताकारों ने अपनी-अपनी संहिताओं में कुछ-कुछ विशेषताओं का वर्णन किया है, अतः उक्त स्थलों का आप अवश्य अवलोकन करें।

जत्रुर्ध्वकफवातोत्यविकाराणामजन्मने। उच्छेदाय च जातानां पिबेद्भूमं सदाऽऽत्मवान् ॥ १ ॥

धूमपान-विधि का वर्णन —आत्मवान् ( मानसिक बल से परिपूर्ण ) मानव को जनुअस्थि के ऊपरी भाग में होने वाले कफज तथा वातज रोगों की उत्पत्ति ही न हो इसलिए और यदि उक्त प्रकार के रोग हो गये हों तो उन्हें उखाड़ कर फैकने के लिए सदा धूमपान करना चाहिए ॥ १ ॥

बक्तव्य —महर्षि बागभट ने नस्य, गण्डूष के साथ-साथ धूमपान आदि का वर्णन अ. ह. सु. २।६ में किया है, यहाँ उसी धूम का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है। धूमपान स्वयं में एक दुर्ब्यसन है, किन्तु दुर्ब्यसनों का प्रभाव आत्मवान् पुरुषों पर नहीं पड़ता, अस्तु। अष्टांगसंग्रह सू. ३०।३ में इस बात का स्पष्ट निर्देश दिया है कि इसका सेवन कब, किन्हें करना चाहिए और कब, किन्हें नहीं करना चाहिए।

स्निग्धो मध्यः स तीक्ष्णश्च, वाते वातकफे कफे। योज्यः—

धूम के भेद तथा प्रयोग—धूमपान विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. स्निग्ध, २. मध्य तथा ३. तीक्ष्ण। दोषभेद से इनका प्रयोग—स्निग्ध धूम वातविकारों में, मध्य धूम वातकफज विकारों में तथा केवल कफज विकारों में तीक्ष्ण धूम का प्रयोग विहित है।

बक्तव्य —बुद्धबागभट ने अ. सं. सू. ३०।४ में धूमभेदों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. शमन, २. बृंहण, ३. शोधन। पुनः इनके पर्याय—१. शमन, प्रायोगिक, मध्यम। २. बृंहण, स्नेहन, मृदु। ३. शोधन, विरेचन, तीक्ष्ण। तीन अन्य भेदों की चर्चा—१. कासघ्न, २. वामक, ३. ब्रणधूमन। इसी विषय को सुश्रुत ने चि. ४०।१४ में इस प्रकार कहा है—धूमपान पाँच प्रकार का होता है—१. प्रायोगिक, २. स्नेहिक, ३. वैरेचनिक, ४. कासघ्न तथा ५. वामनीय।

—न रक्तपित्तातिविरिक्तोदरमेहिषु ॥ २ ॥

तिमिरोर्ध्वानिल्लाध्यानरोहिणीदत्तबस्तिषु । मत्स्यमध्यदधिश्चौरक्षौद्रस्नेहविषाशिषु ॥ ३ ॥

शिरस्यभिहते पाण्डुरोगे जागरिते निशि।