अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनस्यविधिर्ध्यायः २० ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य —बुद्धबाग्भट का कथन है कि तब तक नस्य का प्रयोग करता या करता रहे, जब तक उसके सम्यग्योग के लक्षण दिखलायों न दें, उसमें भले ही ५, ७ अथवा ९ दिन क्यों न लग जायें। यह निर्देश तर्कसंगत तथा व्यवहारोचित है। देखें—अ. सं. सू. २९।१७। इसी के आगे उसमें नस्य के सम्यग्योग आदि का भी वर्णन किया है। अष्टांगहृदय में उक्त विषय आगे श्लोक २४-२५ में दिया है।
स्निग्धस्विन्नोत्तामङ्गुस्य प्राकृतावशयकस्य च । निवातशयनस्यस्य जत्रुर्ध्वं स्वेदयेत् पुनः ॥ १७ ॥ अथोत्तानजुदेहस्य पाणिपादे प्रसारिते । किञ्चिदुन्नतपादस्य किञ्चिन्मृदूनि नाभिते ॥ १८ ॥ नासापुटं पिधायैकं पर्यायेण निषेचयेत् । उष्णाम्बुतत्पं शैषयं प्रणाडद्या पिचुताऽथवा ॥ १९ ॥ दत्ते पादतलस्कन्धहस्तकर्णदि मर्दयेत् । शनैरुच्छिद्य निष्ठोवेत्पार्श्वयोर्भयोस्ततः ॥ २० ॥ आभेषजक्षयादेवं द्विस्त्रिर्वा नस्यमाचरेत् ।
नस्य का पूर्वकर्म —नस्य का प्रयोग कराने के पहले शिरःप्रदेश का स्नेहन तथा स्वेदन कराना चाहिए, उसके बाद अन्य आवश्यक कार्य ( मल-मूत्र आदि का त्याग ) कर लेने चाहिए। फिर उस व्यक्ति को ऐसी शय्या पर लेटायें जहाँ सीधे हवा का प्रवेश न होता हो। जब वह भलीभाँति लेट जाय तो फिर उसके शिरःप्रदेश का स्वेदन करारक उसे निम्नलिखित विधि से नस्य-प्रयोग कराना चाहिए।
नस्य-प्रयोगविधि —नस्य देने के लिए उस व्यक्ति को चित ( सीधा ) लिटाकर उसके हाथ-पाँव फैला दें और कुछ पैरों को उठा दें तथा उसके सिर को झुका दें। पहले नासिका के एक छिद्र को ढककर दूसरे छिद्र में, फिर उस छिद्र को ढककर पहले वाले छिद्र में डालें। नासिका में डालने योग्य औषधद्रव को किसी पात्र में रखकर उसे गरम पानी वाले पात्र में रखकर गुनगुना कर लें, तदनन्तर नाली से या पिचु ( हर्द के फाहा ) से नाक में डालें। औषधद्रव को डाल देने के बाद पाँव के तलुओं को, कन्धों को, हथेलियों तथा कर्णपालियों को मसलते रहें। इसी बीच वह व्यक्ति उस औषधद्रव को ऊपर की ओर खींचे और दोनों नासापुटों के मल को दोनों ओर तब तक निकाले जब तक पूरा औषधद्रव निकल न जाय। इसी विधि से दो या तीन बार उक्त औषधद्रव को नासापुटों में लालें। यह मर्शनस्य की प्रयोगविधि है ॥ १७-२० ॥
मूर्च्छायां शीततोयेन सिञ्चेत्परिहरन् शिरः ॥ २१ ॥
मूर्च्छा-शान्ति की विधि —नस्य का प्रयोग कराते समय उस व्यक्ति को मूर्च्छा ( बेहोशी ) आ जाय तो उसके सिर को बचाकर शेष अंगों में शीतल जल का छिड़काव कराना चाहिए। इस उपचार से वह होश में आ जाता है ॥ २१ ॥
स्नेहं विरेचनस्यान्ते दद्याद्वोषाद्यपेक्षया ।
स्नेहतस्य-प्रयोग —शिरोंविरेचन-नस्यप्रयोग के अन्त में वात आदि दोष तथा देश एवं काल का विचार करके किसी स्नेह नस्य का प्रयोग कराना चाहिए ( दोष एवं देश-काल का विवेचन पीछे १३ से १५ पद्यों में देखें )।
नस्यान्ते वाक्शतं तिष्ठेदुत्तानः—
नस्य-प्रयोग की प्रतीक्षा —नस्य का प्रयोग कर लेने के बाद वह व्यक्ति वाक्शतपरिमित ( ३-४ मिनट ) समय तक चित लेटकर उसकी प्रतीक्षा करे।
—धारयेत्ततः ॥ २२ ॥
धूमं पीत्वा कबोष्णाम्बुकवलान् कण्ठशुद्धये ।
धूमपान-प्रयोग —उसके बाद विधिवत् धूमपान करके गला को शुद्ध करने के लिए गुनगुने जल से कुल्ला करें ॥ २२ ॥