अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
प्रदेशिन्यङ्गुलीपर्वहृद्यान्मप्रसमुद्भूतात्
॥११॥
यावत्पतत्यसौ बिन्दुर्देशाष्टौ षट्क्रमेण ते । मर्शस्योत्कृष्टमध्योना मात्रास्ता एव च क्रमात् ॥ १० ॥
बिन्दुद्वयोनाः कल्कादेः—
नस्य की मात्रा—नस्य के योग्य किसी द्रव में प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के दो पर्वों ( गॉठों ) को डुबाकर निकालने पर जो बूँदें गिरती हैं, उसे बिन्दु कहते हैं। उसके परिमाण से मर्श नामक नस्य की तीन मात्राएँ उत्तम, मध्यम, हीन भेद से इस प्रकार निर्धारित की गयी हैं—१. उत्तम मात्रा १० बूँदें अर्थात् दोनों नासिकाछिद्रों में ५-५ बूँदें, २. मध्यम मात्रा ८ बूँदें अर्थात् दोनों में ४-४ बूँदें और ३. हीन मात्रा ६ बूँदें अर्थात् दोनों में ३-३ बूँदें। ऊपर कहे गये विवेचन तथा शमन नामक नस्यों की मात्रा, जिनमें कल्क, ब्वाथ, जल आदि द्रव द्रव्यों का प्रयोग निर्दिष्ट है, उनकी मात्रा उक्त मात्राक्रम में से प्रत्येक में दो संख्या कम कर देने से इस प्रकार हो जायेगी। यथा—८ बूँदों की उत्तम मात्रा, ६ बूँदों की मध्यम मात्रा और ४ बूँदों की हीन मात्रा होती है ॥ १-१० ॥
वक्तव्य—प्रतिमर्शनस्य की मात्रा आदि का विस्तृत विवेचन मु. चि. ४०।५२-५३ में तथा च. सि. १।१३ में देखें। सामान्य रूप से प्रतिमर्श-नस्य की मात्रा एक-एक बूँद है। स्नान करने के पहले जो नासिकाछिद्र में तेल डाला या सूँघा जाता है, यही उक्त नस्य का वास्तविक स्वरूप है।
—योजयेन्न तु नावनम् । तोयमद्यगरस्नेहपीतानां पातुमिच्छताम् ॥ ११ ॥
भुक्तभक्तशिरःस्नातस्नातुकामसुतासुजाम् । नवपीनसवेगार्तसूतिकाश्चासकासिनाम् ॥ १२ ॥
शुद्धानां दत्तबस्तीनां तथाऽनार्तबदुर्दिने । अन्यत्रात्ययिकिदाव्याधेः—
नस्य के अयोग्य ब्यक्ति—इन्हें नस्यकर्म का प्रयोग न करायें—जिन्होंने तत्काल जलपान, मद्यपान तथा गर ( दूधोविष ) का पान किया हो अथवा जो इन्हें पीना चाहते हों, जिन्होंने भात आदि का भोजन किया हो, शिरःस्नान किया हो अथवा जो नहाने के लिए तैयार हों, जिन्होंने रक्तमोक्षण कराया हो, जिन्हें अभी-अभी प्रतिशय्य हुआ हो, जो मल-मूत्र के वेग से पीड़ित हों, जो सूतिकण हों, श्वास तथा काम रोग से पीड़ित हों, जिन्हें वमन तथा विवेचन का प्रयोग करकर शुद्ध किया गया हो, जिन्हें बस्तिप्रयोग कराया गया हो तथा वर्षा ऋतु के अतिरिक्त ऋतुओं में जब बादल छाये हों; इन स्थितियों में नस्य का प्रयोग न करायें। यदि आवश्यक हो तो नस्य-प्रयोग किया जा सकता है ॥ ११-१२ ॥
—अथ नस्यं प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥
प्रातः श्लेष्मणि, मध्याह्ने पिप्ते, सायंनिशोश्चल्ले । स्वस्थवृत्ते तु पूर्वहि शरत्कालबसन्तयोः ॥ १४ ॥
शीते मध्यन्दिने, ग्रीष्मे सायं वर्षासु सातपे । वाताभिभूते शिरसि हिम्भायामपतानके ॥ १५ ॥
मन्यास्तम्भे स्वरभ्रंशे सायंप्रातर्दिने दिने । एकाहान्तरमन्यत्र—
नस्य के योग्य काल—कफज रोगों में प्रातःकाल, पित्तज रोगों में दोपहर के समय तथा वातज रोगों में सायंकाल नस्य का सेवन करना चाहिए। यदि स्वस्थ ( नीरोग ) पुरुष को नस्य-प्रयोग कराना हो तो शरद तथा वसन्त ऋतुओं में प्रातःकाल, शीतकाल ( हेमन्त तथा शिशिर ऋतु ) में दोपहर के समय, ग्रीष्म ऋतु में सायंकाल और वर्षा ऋतु में जब या जिस दिन धूप निकली हुई हो नस्य-सेवन कराना चाहिए।
रोगानुसार नस्य-प्रयोग—शिरःप्रदेश में वातदोष का प्रकोप होने पर, हिनका ( हिनकी ) में, अपतानक ( देखें—माधवनिदान-वातव्याधि ), मन्यास्तम्भ एवं स्वरभ्रंश ( स्वरभेद ) आदि में प्रतिदिन प्रातः तथा सायंकाल नस्य-प्रयोग कराना चाहिए। इनके अतिरिक्त दूसरे रोगों में एक दिन का अन्तर देकर नस्य दें ॥ १३-१५ ॥
—सप्ताहं च तदाचरेत् ॥ १६ ॥
नस्य-सेवन की सीमा—और उस ( नस्य ) का सेवन एक सप्ताह तक करना चाहिए ॥ १६ ॥