भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281

नस्यविधिरध्यायः २० ]

सूत्रस्थानम्

२४५

में, कफज ग्रन्थिरोग में, कुष्ठरोग, अपस्माररोग तथा पीनस ( प्रतिष्प्याय ) रोग में इसका प्रयोग किया जाता है॥ २॥

बृह्णं वातजे शूलं सूर्यावर्ते स्वरक्षये॥ ३॥ नासास्यशोषे वाक्सङ्घे कृच्छ्रबोधेऽवबाहुके।

बृह्ण-नस्य का प्रयोग—वातजनित शूल में, सूर्यावर्तीरोग में, स्वरक्षयरोग में, नासिकाशोथ में, मुखशोथ में, वाणी की हकावट में, बड़े कष्ट से नींद के खुलने में तथा अवबाहुक नामक वातरोग में इसका प्रयोग करना चाहिए॥ ३॥

शमनं नीलिकाब्यङ्गकेशदोषाक्षिराजिषु॥ ४॥

शमन-नस्य का प्रयोग—नीलिका ( शुद्धरोग-विशेष ), ब्यंग, बालों का अकाल में पकना या झड़ना तथा आँखों में रेखा के आकार की सिराओं का उभर आना आदि रोगों में करना चाहिए॥ ४॥

यथास्वं यौगिकैः स्नेहैर्यथास्वं च प्रसाधितैः। कल्कव्याथादिभिश्चाष्टं मधुपद्मसवैरपि॥ ५॥

विरेचन-नस्य के द्रव्य—रोगों को ध्यान में रखकर सरसों आदि स्नेह ( तेल ) से सिद्ध किये गये स्नेहन-द्रव्यों द्वारा मधु, लवण तथा आसव आदि के संयोग से प्रथम विरेचन-नस्य का प्रयोग किया जाता है॥ ५॥

बृह्णं धन्वमांसोत्थरसासुक्खपूरैरपि। शमनं योजयेत्पूर्वैः क्षीरेण सलिलेन वा॥ ६॥

बृह्ण-नस्य के द्रव्य—धन्व ( जांगल ) देशीय पशु-पक्षियों के मांसरस से या उनके रक्त से अथवा राल तथा गुग्गुलु आदि द्रव्यों के प्रयोग से बृह्ण-नस्य देनी चाहिए।

शमन-नस्य के द्रव्य—घृत आदि मुटु स्नेहों से अथवा कोमल द्रव्यों के कल्क या क्वाथों से अथवा गाय या बकरी के दूध से अथवा जल से नस्य देनी चाहिए॥ ६॥

बक्तव्य—जल द्वारा जो नस्य-प्रयोग किया जाता है, उसे नासिका-छिद्र से जलपान करना भी कहते हैं। योगशास्त्र में इसे 'नेतित्रिया' कहते हैं। इसके प्रयोग से ऊर्ध्वजनुगत रोग कभी नहीं होते। इसका अभ्यास योग्य गुरु की देख-रेख में करना चाहिए।

मर्शश्च प्रतिमर्शश्च द्विधा स्नेहोऽत्र मात्रया। कल्काद्यैरवपीडस्तु स तीक्ष्णैर्मूर्दुरेचनः॥ ७॥

ध्यानं विरेचनश्चूर्णां—

नस्य के भेद—स्नेहन ( बृह्ण ) नस्य मात्राभेद से दो प्रकार का होता है—१. मर्श नस्य तथा २. प्रतिमर्श नस्य। शिरोविरेचन-नस्य भी दो प्रकार का होता है—१. अवपीड या अवपीडन नस्य और २. ध्यान या प्रधमन नस्य। अवपीड-नस्य उसे कहते हैं जो कल्क को निचोड़ कर उससे निकले हुए रस से दिया जाता है अथवा क्वाथ आदि के रस से दिया जाता है। ध्यान-नस्य उसे कहते हैं जिसमें शिरोविरेचक चूर्णों को नासिका-छिद्र के भीतर फूंककर प्रवेश कराया जाता है॥ ७॥

—युज्यतां मुखवायुना। षडङ्गुलद्विमुखा नाड्या भेषजगर्भया॥ ८॥ स हि भूरितरं दोषं चूर्णत्वादपकर्षति।

ध्यान ( प्रधमन ) नस्य की प्रयोग-विधि—कटफल आदि के कपडहन चूर्ण को ६ अंगुल लम्बी एक ऐसी नाली जिसके दोनों ओर छिद्र हों, उसमें मात्रानुसार औषधचूर्ण भरकर उस नाली को नासिकाछिद्र में डालकर दूसरी ओर से फूंककर भीतर प्रवेश करा दें। इस प्रकार वह चूर्ण नासिकाछिद्र के भीतर पहुँचकर सिर के अनेक वात-कफ आदि दोषों को बाहर की ओर निकाल देता है॥ ८॥

बक्तव्य—यह प्रधमन-नस्य की शास्त्रीय विधि है। इसी का एक भेद है—सुंधनी। इसका सामान्य प्रयोग इस प्रकार भी देखा जाता है—चूटकीभर चूर्ण को नाक के भीतर प्रवेश कराकर ऊपर की ओर को श्वास द्वारा खींच लिया जाता है। इससे कफ आदि विकार छींक के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।