अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः
अथातो नस्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब हम यहाँ से नस्यविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —पञ्चकर्मों के वर्णन-प्रसंग में क्रमशः वमन, विरेचन, अनुवासनबस्ति तथा निरुहणबस्तियों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ नस्यविधि का वर्णन किया जा रहा है। इन्हीं पाँच कर्मों को पंचकर्म कहा जाता है। वमन-विरेचन के पूर्व किये जाने वाले स्नेहन तथा स्वेदन कर्म इन्हीं के उपांग अथवा पुष्पपोषक अंग हैं। यह पञ्चकर्म-विधान एक ऐसा उपक्रम है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम ही कही जायेगी। आज चिकित्सक इसे भूल चुके हैं अथवा चिकित्सकों ने इस विधि की प्रायः उपेक्षा कर दी है; अथवा ऐसा कहें—इस कल-युग में इसके प्रयोग का किसी के पास समय ही नहीं है। जब समाज नहीं चाहता तो चिकित्सकों ने भी इसे भुला-सा दिया है।
नस्य —नासिका शब्द को 'नस्' आदेश तथा यत् प्रत्यय करने से 'नस्य' शब्द की निष्पत्ति होती है। उक्त 'यत्' प्रत्यय 'हित' अर्थ में प्रयुक्त है। इसके पर्याय हैं—नावन तथा नस्त। नासा को सिर का दरवाजा कहा गया है; अतएव नासिकाछिद्र द्वारा भीतर प्रवेश करायी गयी औषधि शृंगटक नामक मर्म में पहुँचकर और वहाँ अपना प्रभाव दिखाकर सिर, नेत्र, श्रोत्र, कण्ठ आदि की सिराओं से दोषों को शीघ्र निकालती है। देखें शृंगटक मर्म—अ. हू. शा. ४।३४ तथा सु. शा. ६।७। यह शृंगटक सिरामर्म है। यही कारण है कि नस्य के प्रयोग से नेत्र, कर्ण, नासा, मुख एवं शिरो रोगों में शीघ्र लाभ होता है। सुश्रुत के अनुसार—'औषधमौषधसिद्धो वा स्नेहो नासिकाभ्यां दीयत इति नस्यम्' (सु.चि. ४०।२१)।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च. सि. १, २, ९; सु. चि. ४० तथा अ. सं. सू. २९ में देखें।
ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु विशेषात्रस्यमिष्यते। नासा हि शिरसो द्वारं तेन तद्व्याप्य हन्ति तान् ॥ १ ॥
नस्य का वर्णन —जत्रु अस्थि (Collar bone) के ऊपरी भाग अर्थात् गरदन से लेकर ऊपर सिर तक के रोगों में नस्यकर्म विशेषरूप से लाभदायक होता है, क्योंकि नासिका के छिद्रों को शिरःप्रदेश का द्वार (दरवाजा) कहते हैं। अतः उस द्वार से दी गयी नस्य भीतरी अवयवों में व्याप्त होकर उन-उन अवयवों में होने वाले रोगों का विनाश कर देती है ॥ १ ॥
विरेचनं बृंहणं च शमनं च त्रिधाऽपि तत्।
नस्यकर्म के भेद —उक्त नस्यकर्म विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. विरेचन —जो सिर में स्थित कफ आदि दोषों को नासिका के छिद्रों से बाहर निकाल देता है, इसे आप वमन कहें अथवा विरेचन। २. बृंहण —जो शिरःप्रदेश में स्थित समस्त अवयवों को पुष्ट करता है। ३. शमन —जो वात आदि दोषों का शमन (शान्ति) करता है।
विरेचनं शिरःशूलजाडयस्यन्दगलामये ॥ २ ॥
शोफगण्डकुमिप्रस्थिकुष्ठापसारपीनसे ।
विरेचन-नस्य का प्रयोग —शिरःशूल, बुद्धि, मन तथा नासिका आदि की जड़ता (अकर्मण्यता) में, अभिष्यन्द नामक नेत्ररोग में, गल्लरोगों (शोय, स्वरभेद आदि) में, सूजन में, गलगण्ड में, क्रिमिरोगों