अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबस्तिविधिध्यायः १९ ]
सूत्रस्थानम्
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यथा कुसुम्भादियुतातोषाद्वागं हरेत्यटः । तथा द्रवीकृताद्देहाद्बस्तिर्निर्हरंते मलान् ॥ ८४ ॥ बस्ति द्वारा दोषनिर्हरण—जिस प्रकार जल में घुले हुए कुसुम्भी रंग को पट ( वस्त्र ) ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार शरीर में द्रवीभूत मलों को बस्तिप्रयोग शरीर से बाहर निकाल देता है ॥ ८४ ॥
शाखागताः कोष्ठगताश्च रोगा मर्मोर्ध्वसर्वावयवाङ्गजाश्च ।
ये सन्ति तेषां न तु कश्चिदन्यो वायोः परं जन्मनि हेतुरस्ति ॥ ८५ ॥
विष्टलेष्मपित्तादिमलोच्चयानां विशेषसंहारकरः स यस्मात् ।
तस्यातिवृद्धस्य शमाय नान्यद् बस्तेर्विना भेषजमस्ति कञ्चित् ॥ ८६ ॥
तस्माच्चिकित्सादृष्टिं प्रविष्टः कृत्स्ना चिकित्साऽपि च बस्तिरेकैः ।
बस्ति-प्रयोग की प्रशंसा—जो रोग शाखागत ( लम्बा तथा रक्त आदि धातुओं ), कोष्ठगत तथा मर्मस्थानों की विकृति द्वारा शरीर के सभी सिर आदि अवयवों में व्याप्त हो जाते हैं अथवा अंग-विशेष में व्याप्त होते हैं, उन सबकी उत्पत्ति में वातदोष के अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं होता है। क्योंकि मल, सूत्र, कफ, पित्त आदि शरीर के अन्य मलों को इधर-उधर करना तथा संहार ( शमन ) करना—ये सब वातदोष के कार्य हैं। अतः बड़े हुए अथवा विकारयुक्त वातदोष की शान्ति के लिए बस्तिप्रयोग के अतिरिक्त और कोई चिकित्सा नहीं है। इसलिए बस्तिचिकित्सा को आधी चिकित्सा माना जाता है, कुछ आचार्य इसे सम्पूर्ण चिकित्सा स्वीकार करते हैं ॥ ८५-८६ ॥
तथा निजागन्तुविकारकारिरक्तोपधत्वेन शिराव्यधोऽपि ॥ ८७ ॥
इति श्रीवैद्यपतिं सिंहगुप्तसूत्रोत्तममहामहटवरिचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने बस्तिविधिनामिकोनविंशतितमोऽध्यायः ॥ १९ ॥
सिरावेध का महत्त्व—इसी प्रकार शारीरिक तथा आगन्तुज रोगों का उत्पादक होने के कारण विकृत रक्तधातु की प्रधान चिकित्सा सिरावेध है। शल्यतन्त्र में सिरावेध को आधी चिकित्सा अथवा दूसरे विद्वानों के मत में इसे सम्पूर्ण चिकित्सा भी कहा गया है ॥ ८७ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार शल्यतन्त्र में सिरावेध को जिस प्रकार आधी चिकित्सा कहा गया है, वैसा ही महत्त्व कार्यचिकित्सा में बस्तिचिकित्सा का है। देखें—सु.शा. ८।२३ और च.सि. १।४०।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
बस्तिविधि नामक उसीसर्वा अध्याय समाप्त ॥ १९ ॥