अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बस्तीननेन विधिना दद्यात् त्रींश्चतुरोऽपि वा ॥ ७६ ॥
अनुवासनवच्छेपं सर्वमेवास्य चिन्तयेत्।
उत्तरबस्ति की संख्या—ऊपर कही गयी विधि से तीन या चार बस्तियाँ नर-नारी के मूत्रमार्ग में दें। शेष सभी विषयों (सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग, आहार-विहार एवं चिकित्सा आदि) का विचार अनुवासनबस्ति की भाँति करें ॥ ७६ ॥
स्त्रीणामार्तवकाले तु योनिर्गुह्याल्पपावृतेः ॥ ७७ ॥
विदधीत तदा तस्मादनुतावपि चालयेत्। योनिर्विघ्नशूलेषु योनिव्यापद्यसुन्दरे ॥ ७८ ॥
स्त्रियों में उत्तरबस्ति—स्त्रियों की योनि का मुख्य आर्तवकाल (मासिकधर्म के दिनों) में खुला रहता है, अतः उस काल में उत्तरबस्ति का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि इन दिनों दी गयी बस्ति के स्नेह का वह ग्रहण कर लेती है। अत्यन्त आवश्यकता होने पर ऋतुकाल के वीत जाने पर भी उत्तरबस्ति का प्रयोग किया जा सकता है। जैसे—योनिघ्न (काँच की भाँति योनि = गर्भाशय के बाहर निकल आने पर), योनिशूल, योनिव्यापदों तथा रक्तप्रदररोग आदि रोगों के होने पर उत्तरबस्ति का प्रयोग करना चाहिए ॥ ७७-७८ ॥
नेत्रं दशाङ्गुलं मूत्रप्रवेशं चतुरङ्गुलम्। अपत्यमार्गे योज्यं स्याद् द्रघङ्गुलं मूत्रवर्त्तनम् ॥ ७९ ॥ मूत्रकृच्छ्रविकारेषु, बालानां त्वेकमङ्गुलम्।
बस्तिनेत्र का परिमाण—उत्तरबस्ति का नेत्र १० अंगुल लम्बा होना चाहिए। इसके अगले भाग का छिद्र मूंग के दाने के सरलता से आने-जाने योग्य हो, उसका प्रवेश भ्रममार्ग में चार अंगुल मात्र कराना चाहिए। मूत्रकृच्छ्र आदि रोगों में जब इसे मूत्रमार्ग में प्रवेश कराना हो तो दो अंगुल मात्र प्रवेश करायें। कन्याओं को यदि मूत्रमार्ग में बस्ति देनी हो तो एक अंगुल मात्र प्रवेश करायें ॥ ७९ ॥
प्रकुञ्चो मध्यमा मात्रा, बालानां शुक्तिरेव तु ॥ ८० ॥
स्नेहमात्रा-निर्देश—स्त्रियों में उत्तरबस्ति-प्रयोग के लिए स्नेह की मध्यम मात्रा १ प्रकुञ्च = ४ तोला होती है और बालिकाओं के लिए मध्यम मात्रा १ शुक्ति = २ तोला होती है ॥ ८० ॥
उत्तानायाः शयानायाः सम्यक् सङ्कोच्य सन्धिनी। ऊर्ध्वजान्वास्त्रिचतुरानहोरात्रेण योजयेत् ॥
बस्तींस्त्रिरात्रमेवं च स्नेहमात्रां विवर्द्धयन्। श्रृहमेव च विश्रम्य प्रणिदध्यात्युत्स्थ्यहम् ॥ ८१ ॥
उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि—स्त्री को चित लेटाकर उसकी जानुओं को भलीभाँति मोड़कर घुटनों को ऊपर की ओर उठाकर एक दिन-रात (२४ घण्टे) में तीन अथवा चार बार बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए। इस प्रकार स्नेह की मात्रा को क्रमशः बढ़ाता हुआ तीन दिन तक बस्तियों का प्रयोग कराता रहे। तीन दिन रुककर पहले की भाँति फिर तीन दिन तक बस्ति-प्रयोग करायें ॥ ८१-८२ ॥
बक्तव्य—स्त्रियों को उत्तरबस्ति का प्रयोग कराना केवल स्त्री-चिकित्सक का ही अधिकार है। यहाँ लोकाचार भी है और यही पक्ष न्यायसंहितासम्मत भी है। पुरुष-चिकित्सक इस कार्य को न करें।
इस सम्बन्ध में सुश्रुत ने मु.चि. ३७॥१४-११५ में उत्तरबस्ति-प्रयोगकर्ता को 'विचक्षणः' कहा है। यहाँ पर जो पाठभेद दिया है वह है 'समाहितः', जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य इल्लहण कहते हैं—'कामसङ्कल्परीहितेन अचलचितप्रकृतिना'। अर्थ स्पष्ट है। सुश्रुत एवं चरक ने प्रसवकाल में नारियों का अधिकार बतलाया है, यह बस्तिकर्म भी प्रायः उसी प्रकार की स्थिति है।
पक्षाद्विरेको वमिते ततः पक्षात्रिहृणम्। सद्यो निरुद्धश्चान्वास्यः सप्तरात्राद्विरेचितः ॥ ८३ ॥
वमन आदि में काल-निर्देश—वमन कराने के १५ दिन के बाद विरेचन करायें, तदनन्तर १५ दिन के बाद निरुहणबस्ति का प्रयोग करें और निरुहणबस्ति का प्रयोग करने के तत्काल बाद उसे अनुवासन-बस्ति दें और विरेचन कराने के एक सप्ताह बाद भी अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ८३ ॥