भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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बस्तिविधिरध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२४१

अथ स्नाताशितस्यास्य स्नेहबस्तिविधानतः ॥७३॥

ऋजोः सुखोपविष्टस्य पीठे जानुसमे मूर्दो। हृष्टे मेद्रे स्थिते चर्जा शनैः श्रोतोविशुद्धये ॥७४॥ सूक्ष्मां शलाकां प्रणयेतया शुद्धेऽनुसेवि। आमेहनान्तं नेत्रं च निष्कम्पं गुदवत्ततः ॥७५॥ पीडितेऽन्तर्गति स्नेहे स्नेहबस्तिक्रमो हितः।

उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि—उत्तरबस्ति का प्रयोग करने के पहले स्नेहबस्ति की विधि से उस व्यक्ति को गुनगुने जल से स्नान कराकर पथ्य भोजन खिलाकर, जानु (घुटने) भर ऊँचे मुलायम पीठ (आसन) पर सीधा तथा आराम से बैठे हुए पुरुष के हृष्ट एवं सीधे लिंग के मूत्र निकलने वाले छिद्र में श्रोतस् को शुद्ध करने के लिए सूक्ष्म (उस छिद्र में प्रवेश करने योग्य) शलाका (कैथीटर नामक आधुनिक यन्त्र) का धीरे-धीरे प्रवेश कराये। उस उत्तरबस्ति के नेत्र द्वारा मार्ग शुद्ध हो गया है, ऐसा अनुमान हो जाने पर सेवनी की सीध में मूत्रमार्ग के अन्त तक नेत्र का प्रवेश करता जाय। इसमें भी गुदबस्ति की भाँति नेत्र प्रवेश कराते समय चिकित्सक का हाथ हिलना नहीं चाहिए। तदनन्तर बस्तिपुट को दवाना चाहिए। जब स्नेहबस्ति (मूत्राशय) में पहुँच जाय तब बस्तिनेत्र को धीरे-धीरे निकालें। इस प्रकार उत्तरबस्ति-विधि से दिया गया स्नेह हितकर होता है ॥७३-७५॥

वक्तव्य—इसके बाद जब वह स्नेह लौट आता है, तो उस व्यक्ति को भूख लगने पर इसी अध्याय में कहे गये श्लोक ३० की भाँति उचित भोजन करायें। शंका—‘हृष्टे मेद्रे’ (अ.सं.सू. २८।६६); सुश्रुत में—‘ततः समं स्थापयित्वा नालमस्य प्रहर्षितम्’ । (सु.चि. ३७।११०) तथा चरक में—‘ऋजोः सुखोपविष्टस्य हृष्टे मेद्रे घृताक्तया। शलाकयाऽन्विष्य गतिं यद्यप्रतिहता ब्रजेत्’ ॥ (च.सि. ९।५४) इस प्रकार सभी आचार्यों का पुरुष की मूत्रेन्द्रिय में उत्तरबस्ति देने का एक ही दृष्टिकोण है और होना भी चाहिए। किन्तु चरक को छोड़कर अन्य सभी के वचन इस दृष्टि से तब तक निवादास्पद कहे जा सकते हैं जब तक हम निम्न समाधान पक्ष को प्रस्तुत नहीं करते। क्योंकि हृष्टमेद्रे (स्त्री-सहवास के लिए उघात पुरुष की मूत्रेन्द्रिय अर्थात् लिंग) इतना तन जाता है कि उसमें द्रवरूप मूत्र तो निकल ही नहीं पाता, बला उस स्थिति में उसके भीतर बस्तिनेत्र का प्रवेश बाधारहित कैसे किया या कराया जा सकता है?

समाधान—प्राचीन आचार्य-परम्परा पर अपना अज्ञान नहीं लादना चाहिए, अतएव सुश्रुत ने कहा है—‘एक ही शास्त्र को पढ़ता हुआ व्यक्ति शास्त्र के रहस्य को नहीं जान सकता, इसलिये जिसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया है वही शास्त्र के रहस्य को जान सकता है’। देखें—सु.सू. ४।७। जब हम व्याकरण की दृष्टि से विचार करते हैं, तो उक्त स्थलों में कहीं भी शंका नहीं रह जाती। ‘हृष तृष्णो’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करने पर ‘हृष्ट’ रूप बनता है। जिसका अर्थ होता है—तृष्णित, हर्ष, विस्मित तथा प्रतिघात या प्रतिहत; इसी को मनोहृत भी कहते हैं। ‘धातूनाम् अनेकार्थत्वात्’ उनके प्रसंगवश अनेक अर्थ कर लिए जाते हैं, किन्तु हम उक्त अर्थों को कोश एवं व्याकरण की सहायता से ले रहे हैं। देखें—पाणिनीय सूत्र ‘हृषेर्लोमसु’ (७।२।२९) ‘विस्मितः प्रतिघातयोश्च’ (वार्तिक) के तथा ‘मनोहृतः प्रतिहतः प्रतिबद्धो हतश्च सः’ । (अमरकोश) आप ध्यान दें—हृष धातु से हृष्ट एवं हृषित दो ही रूप निष्पन्न होते हैं, न कि हर्षित या प्रहर्षित, जिसका प्रयोग सुश्रुत ने किया है। किन्तु ‘ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमभ्योऽनुधावति’ के अनुसार जब हम ‘हर्षित’ रूप को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, तो हमें ‘हर्षः सज्जातः अस्य’ इस प्रकार विग्रह करके ‘तदस्य सज्जातं तारकादिभ्य इतच्’ । (५।२।३६) सूत्र से इतच् प्रत्यय करना होगा, क्योंकि ‘तारकादिगण’ में हर्ष शब्द का पाठ है। इस दृष्टि से हर्ष शब्द का एक अर्थ प्रतिघात या प्रतिहत भी होता है, अतः लिंग की ‘प्रतिहत’ स्थिति में नेत्रप्रणयन सरल, स्वाभाविक एवं शास्त्रसम्मत है ही। चरक ने पहले ही कहा है—शलाका का प्रवेश करके देखें कि उसकी गति में कहीं रुकावट तो नहीं आ रही है? यदि आ रही हो तो बस्तिनेत्र का प्रवेश न करायें। क्या सुबोध भाषा है आचार्य चरक की!

इसी प्रसंग में आप आचार्य शार्ङ्गधर के विचारों को देखें—शा.उ.ख. ७।३-५। इन्होंने पुरुषों की उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि में इस प्रकार का उलझाने वाला पाठ नहीं दिया है।

१६ अ० ह०