अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
मात्राबस्ति-सेवन —उक्त प्रकार की मात्राबस्ति का निम्नोक्त व्यक्तियों को सदा सेवन करने का निर्देश—बालक, वृद्ध, जो प्रतिदिन पैदल चलते हों, बोझ ढोते हों, स्त्री-सहवास करते हों, व्यायामशील व्यक्तियों को, विचारकों, वातरोगियों, अस्थिभंग से पीड़ितों, दुर्बलों, मन्दाग्रिवालों, राजाओं, धनवानों तथा सुख से जीवन बिताने वालों को इसका प्रतिदिन सेवन करना चाहिए। यह मात्राबस्ति सभी दोषों को शान्त करती है, इसमें किसी प्रकार का परहेज ( पथ्य-अपथ्य का विचार ) नहीं है। यह बलवर्धक है तथा मल-मूत्र को सरलता से निकालने वाली एवं सुखदायक होती है॥ ६८-६९॥
वक्तव्य —उक्त विषय का समर्थन देखें—च.सि. १।२७ में है। मात्राभेद से स्नेहपान तीन प्रकार का होता है—१. उत्तम मात्रा—१ पल = ४ तोला, २. मध्यम मात्रा—३ कर्ष = ३ तोला तथा ३. जघन्य मात्रा—आधा पल = २ तोला।
मात्राबस्ति की विशेषता —जिस प्रकार प्रतिदिन के भोजन में घृत आदि स्नेहों का सेवन किया जाता है, इसके लिए किसी प्रकार का परहेज नहीं किया जाता है, उसी प्रकार इस मात्राबस्ति के सेवन में भी किसी प्रकार के परीहार ( परहेज ) की आवश्यकता नहीं होती है। स्नेहपान की ह्रस्वमात्रा वह होती है, जो प्रातःकाल सेवन करने के बाद दोपहर के भोजन करने तक पच जाय। इसमें भी समाग्नि, मन्दाग्नि, विषमाग्नि एवं तीक्ष्माग्नि का विचार कर लेना चाहिए। ह्रस्वमात्रा में प्रयुक्त स्नेहपान से जो लाभ होते हैं वे समस्त मात्राबस्ति के सेवन से होते हैं।
बस्ती रोषेषु नारीणां योनिगर्भाशयेषु च। द्वित्रास्थापनशुद्धेभ्यो विदध्याद्वस्तिभुतरम्॥ ७०॥
उत्तरबस्ति का वर्णन —नर तथा नारियों के बस्तिगत रोगों में एवं विशेषकर नारियों के योनिगत तथा गर्भाशयगत रोगों में उत्तरबस्ति का प्रयोग तब करना चाहिए जब कि इसके पहले दो-तीन बार आस्थापन ( निरुहण ) बस्ति का प्रयोग कराकर मलाशय का भलीभाँति शोधन हो जाय॥ ७०॥
वक्तव्य —उत्तरबस्ति उसे कहते हैं जिसका प्रयोग नर एवं नारी के मूत्रमार्ग द्वारा किया जाता है। निरुहणबस्ति को शोधनबस्ति तथा अनुवासनबस्ति को स्नेहनबस्ति भी कहा जाता है।
आतुराङ्गुलमानेन तत्रेनैव द्वादशाङ्गुलम्। वृत्तं गोपुच्छवमूलमध्ययोः कृतकर्णिकम्॥ ७१॥
सिद्धार्थकप्रवेशाणं श्लक्षणं हेमादिसम्भवम्। कुन्दाश्चमारसुमनःपुष्पवृत्तोपमं वृद्धम्॥ ७२॥
उत्तरबस्ति में नेत्र का प्रमाण —मूत्रमार्ग में जो बस्ति दी जाती है, उसके नेत्र की लम्बाई रोगी की अँगुलियों से बारह अँगुल होती चाहिए। इस नेत्र का अगला भाग गोलाकार तथा शेष भाग गाय की पूँछ की भाँति अर्थात् आगे की ओर पतला और मूल ( जड़ ) की ओर क्रमशः मोटा होना चाहिए। उस नेत्र ( नलिका ) के मूल भाग में बस्तिपुट को बाँधने के लिए दो कर्णिकाएँ बनी हों। एक मूल में और दूसरी मध्य भाग की ओर। उसके नेत्र के अगले भाग का छिद्र इतना बड़ा हो जिसमें सरलता से सरसों का दाना प्रवेश कर सके। नेत्रनलिका का बाहरी भाग चिकना हो तथा सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं से बना हो। इसका अगला भाग कुन्द, कनेर अथवा चमेली के फूल के वृत्त के आकार का हो तथा उसे दृढ़ होना चाहिए॥ ७१-७२॥
तस्य बस्तिर्मृदुलघुमार्त्रा शुक्तिर्विकल्प्य वा।
स्नेहमात्रा का प्रमाण —उस उत्तरबस्ति का बस्तिपुट गुद में दी जाने वाली बस्ति की तुलना में छोटा तथा कोमल होना चाहिए। इसमें स्नेह की मात्रा एक शुक्ति ( २ कर्ष = २ तोला ) अथवा जिसे उत्तरबस्ति दी जा रही है उसके बल, अवस्था आदि का विचार कर तदनुसार कुछ कम या ज्यादा की जा सकती है।
वक्तव्य —स्त्री-पुरुष भेद से उत्तरबस्ति के विचारणीय विषयों के लिए आप देखें—सु.चि. ३७ श्लोक १०२ से १२१ तक; तभी इस प्रकरण में आवश्यक वय, मात्रा, काल आदि का स्पष्टीकरण हो सकता है, अतः आप उक्त सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य कर लें।