भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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बस्तिविधिध्यायः १९ ]

सूत्रस्थानम्

२३९

बत्क्य—निरुहणबस्ति के सम्यग्योग का वर्णन इसी अध्याय के ५०वें पद्य में मूलरूप से कहा गया है, अतः वमन एवं विरचन के सम्यग्योग के समान इसके लक्षणों का भी विचार कर लेना चाहिए।

प्राक्स्नेह एकः पञ्चान्ते द्वादशास्थापनानि च । सान्वासनानि कर्मैव बस्तयश्चिंशदीरिताः ॥ ६३ ॥

बस्तिकर्म का वर्णन—प्रस्तुत बस्तिकर्म के आरम्भ में १ स्नेहबस्ति दी जाती है तथा अन्त में ५ स्नेहबस्तियाँ और बीच में १२ आस्थापन ( निरुहण ) बस्तियाँ तथा १२ अनुवासनबस्तियाँ दी जाती हैं। इस प्रकार इन बस्तियों की कुल संख्या ३० हो जाती है। इस क्रम से प्रयुक्त विधि को 'बस्तिकर्म' कहते हैं॥ ६३ ॥

कालः पञ्चदशैकोऽत्र प्राक् स्नेहोऽन्ते त्रयस्तथा । षट् पञ्चबस्त्यन्तरिताः—

बस्तिकाल का वर्णन—बस्तिकाल में सर्वप्रथम १ स्नेहबस्ति का प्रयोग किया जाता है और अन्त में ३ स्नेहबस्तियाँ दी जाती हैं, मध्य में ६ स्नेहबस्तियाँ तथा इनके बीच-बीच में ५ निरुहणबस्तियाँ दी जाती हैं। इस प्रकार इन कुल बस्तियों की संख्या १५ हो जाती है। इस क्रम से प्रयुक्त विधि को 'बस्तिकाल' कहते हैं।

—योगोऽष्टौ बस्तयोऽत्र तु ॥ ६४ ॥

त्रयो निरुहाः स्नेहाश्च स्नेहावाद्यन्त्योरुभौ ।

बस्तियोग का वर्णन—बस्तियोग में सर्वप्रथम १ स्नेहबस्ति और अन्त में १ स्नेहबस्ति दी जाती है। इन दोनों के बीच में ३ निरुहणबस्तियाँ एवं इन्हीं के बीच-बीच में ३ अनुवासनबस्तियाँ दी जाती हैं। इस प्रकार इन कुल बस्तियों की संख्या ८ हो जाती है। इस क्रम से प्रयुक्त विधि को 'बस्तियोग' कहते हैं॥ ६४ ॥

स्नेहबस्तिं निरुहं वा नैकमेवाति शीलयेत् ॥ ६५ ॥

उत्कलेशाश्विबधी स्नेहाश्विरुहान्मरुतो भयम् ।

स्नेह एवं निरुहण प्रयोग—केवल स्नेहबस्तियों अथवा केवल निरुहणबस्तियों का निरन्तर सेवन करना उचित नहीं है, क्योंकि केवल स्नेहबस्तियों का प्रयोग करने से दोनों का उत्कलेश ( पित्त एवं कफ दोनों की वृद्धि तथा मल का उमर आना ) हो जाता है और मन्दाश्वि हो जाती है। केवल निरुहणबस्तियों का निरन्तर अधिक सेवन करने से वातदोष की वृद्धि का भय हो सकता है॥ ६५ ॥

तस्माश्विरुढः स्नेहाः स्याश्विरुहृत्थानुवासितः ॥ ६६ ॥

बस्तियों का प्रयोगक्रम—इसलिए निरुहणबस्ति-प्रयोग के बाद स्नेहबस्ति का और स्नेहबस्ति के बाद निरुहणबस्ति का प्रयोग अवश्य करना चाहिए॥ ६६ ॥

स्नेहशोधनयुक्त्यैव बस्तिकर्म त्रिदोषजित् ।

बस्ति की त्रिदोषनाशकता—उक्त विधि के अनुसार स्नेहबस्ति द्वारा स्नेहन तथा निरुहण बस्ति द्वारा शोधन करने से यह बस्ति-प्रयोग त्रिदोषनाशक होता है।

हृस्वया स्नेहपानस्य मात्रया योजितः समः ॥ ६७ ॥

मात्राबस्तिः स्मृतः स्नेहः—

मात्राबस्ति का वर्णन—स्नेहपान की हृस्वमात्रा ( १ कर्ष = १ तोला ) के बराबर स्नेह को अनुवासनबस्ति द्वारा जो प्रयुक्त किया जाता है, उसका नाम 'मात्राबस्ति' है॥ ६७ ॥

—शीलनीयः सदा च सः । बालवृद्धाद्यभारस्त्रीव्यायामासक्तचित्तकैः ॥ ६८ ॥

वातभग्नाबलालाप्यिनुपेश्वरसुवालम्भिः । दोषज्ज्ञो निष्परीहारो बल्यः सुष्ठमलः सुखः ॥ ६९ ॥

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